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ब्लॉग

शब्दों की सियासत और कानून की हद

शहजादे से शुरू होकर मौत के सौदागर तक की जुमलेबाजी भारत में चुनावी अखाड़े की पहचान बन गई है. चुनाव जीतने के लिए कड़वे बोल और झूठ को सच बताने वाली नेताओं की बाजीगरी ने कानून की लक्ष्मणरेखा को क्षीण बना दिया है.

चुनाव दुनिया में कहीं भी हों, इसे जीतने का मकसद ही चुनावी जंग का सार्वभौमिक गुण है. भारत में चुनावी अखाड़े की तस्वीर न सिर्फ समय के साथ विकृत हो रही है बल्कि चुनाव जीतने के लिए नेताओं का मूलमंत्र बन चुकी साम दाम दंड भेद की नीति के आगे कानून भी लाचार नजर आता है. सियासी फायदे के लिए एक दूसरे पर कीचड़ उछालते नेताओं की बयानबाजी का स्तर लगातार गिर रहा है. इसके कारण नई बहस शुरू हुई है जिसका मकसद कानून की उस सीमा को खोजना है, जिसका अहसास करा कर नेताओं की जुबान पर नकेल कसी जा सके.

बेलगाम होती जुबान

दरअसल जहर उगलते बयानों का मकसद विकास के मुख्य मुद्दे से ध्यान भटकाना है. खास कर वे नेता इस मजबूरी के सबसे बड़े शिकार हैं जिनकी अब तक की राजनीति का आधार ही जाति और मजहब के नाम पर वोट का ध्रुवीकरण रहा है. ऐसे में चुनावी नूराकुश्ती का सबसे बड़ा अखाड़ा बन चुके उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे पिछड़े राज्यों में आए दिन नेताओं की जुबान जहर उगल रही है. अपनी सियासी जमीन बचाने की जद्दोजेहद ने नेताओं के मन से कानून का भय पूरी तरह से खत्म कर दिया है. कानून की कमजोरी और मजबूरी दोनों से वाकिफ नेता बेखौफ होकर हर दिन अपना उल्लू सीधा करने में जुटे हैं और इन पर निगरानी रखने वाला चुनाव आयोग सिर्फ एफआईआर दर्ज करने या नोटिस भेजने तक ही सीमित है.

आरोप प्रत्यारोप चुनावी राजनीति का अहम हिस्सा हैं. तथ्यों पर आधारित आरोप राजनीति को धारदार बनाते हैं. मगर भारतीय राजनीति में जुबानी जंग के गिरते स्तर ने इशारों में ही सब कुछ कह देने वाली सियासी जुबान को इतिहास के पन्नों में समेट दिया है. 1952 में हुए पहले चुनाव की बात हो या आपातकाल के बाद हुए चुनाव की, आरोप पहले भी लगते थे, मगर तथ्यों के साथ. विरोधियों पर तंज तब भी कसे जाते थे मगर सियासी मर्यादा की नथ उतारे बिना.

देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे और उनके अपने ही दामाद फिरोज गांधी ने कांग्रेस सरकार के खिलाफ पहले बड़े घोटाले का पर्दाफाश किया था. मगर तब आज जैसी हायतौबा नहीं मचाई जाती थी. आज आलम यह है कि पप्पू और फेंकू जैसे बचकाने जुमले नेहरू और गोलवलकर के वारिसों का सियासी हथियार बन गए हैं.

कानून की सीमा

ऐसा नहीं है कि चुनाव में बोलने की आजादी स्वच्छंदता की सीमा तक विस्तृत है. चुनावी संचालन के लिए बने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 और 124 अपमानजनक और असत्य बयानबाजी को सख्ती से रोकने का प्रावधान करती है. एक ओर यह किसी भी उम्मीदवार को विपक्षी उम्मीदवारों के खिलाफ अपमानजनक आरोप लगाने से रोकती है तो दूसरी ओर गलत आरोपों को चुनाव जीतने का भ्रष्ट तरीका घोषित करती है.

अदालत में इसका दोषी पाए जाने वाले उम्मीदवार का चुनाव किसी भी स्तर पर रद्द किया जा सकता है. इस कानून के तहत किसी उम्मीदवार का चुनाव रद्द करने का सबसे मजबूत आधार उक्त उम्मीदवार को भ्रष्ट तरीके अपनाने का दोषी ठहराना मात्र है. इससे साफ है कि अपमानजनक बयानबाजी और झूठे आरोप लगाना किसी भी उम्मीदवार के लिए बेहद जोखिम भरे स्टंट साबित हो सकते हैं.

ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि कानून सख्त होने के बावजूद नेताओं की जुबान तल्ख, अमर्यादित और बेलगाम क्यों हो रही है. इसका जवाब खुद सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही फैसलों में दिया है. जीके राव बनाम बालासाहिब विखे पाटिल के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव में उम्मीदवारों के बयान मतदाताओं को अन्य उम्मीदवारों के निजी और सार्वजनिक जीवन के भेद को जानने का मौका देते हैं. इसलिए अपराध कानून के तहत मानहानि की तर्ज पर जनप्रतिनिधित्व कानून के दायरे में अपमानजनक बयानों को समतुल्य नहीं कहा जा सकता.

इतना ही नहीं देश की सर्वोच्च अदालत ने अपने इस नरम रवैये का कारण बताते हुए शिवकृपाल सिंह बनाम वीवी गिरि के मामले में कहा कि बोलने की आजादी और उम्मीदवारों के बारे में जानने के जनता के अधिकार के बीच संतुलन कायम करना बेहद जरूरी है. अदालत ने कहा कि अगर इन आरोपों की भाषा और लहजे को चुनाव का भ्रष्ट तरीका मान लिया जाए तब फिर अदालतों में ऐसे मामलों की बाढ़ आ जाएगी और चुनाव संपन्न कराना व्यवहारिक ही नहीं रहेगा.

कानून की सख्ती मगर इनका सख्ती से पालन न कराए जा सकने की मजबूरी के कारण व्यावहारिकता का तकाजा नेताओं के लिए रामबाण साबित हो रहा है. ऐसे में इस जमीनी हकीकत को देखते हुए कानून की सामान्य अपेक्षा जनता से ही है कि उसे उम्मीदवारों की हर अच्छी बुरी बात को ध्यान से सुन कर अपना फैसला करना होगा और इनमें से उन बेहतरीन रहनुमाओं को चुनना होगा जो विधायिका की उजली तस्वीर पर काला धब्बा साबित न हों.

ब्लॉगः निर्मल यादव

संपादनः अनवर जे अशरफ

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