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मंथन

व्हीलचेयर हुआ पुराना, अब एक्सोस्केलेटन का है जमाना

रीढ़ की हड्डी को दुरस्त करने का उपाय अब तक नहीं मिला है. लेकिन एक्सोस्केलेटन की मदद से व्हीलचेयर में बंधे लोग अपनी जंदगी में छोटा सा चमत्कार ला सकते हैं.

नॉर्बर्ट हॉर्शमन को कार की एक गंभीर दुर्घटना के बाद शरीर के निचले हिस्से में लकवा मार गया. सारी जिंदगी व्हीलचेयर में गुजारने की सोच उनके लिए बहुत बड़ा सदमा थी. वह बताते हैं, "बहुत लंबा समय लगा, शायद महीनों जब मैंने सचमुच मान लिया कि अब मैं लकवाग्रस्त हूं. डॉक्टर के साथ पहली मुलाकात में मुझे बताया गया कि मुझे एक अच्छा व्हीलचेयर ड्राइवर बना दिया जाएगा लेकिन मैं फिर से चलने की बात भूल जाऊं."

20 साल तक लकवे की जिंदगी गुजारने के बाद वे एक बार फिर चलना सीख रहे हैं, एक्सोस्केलेटन की मदद से. इसके चलने के लिए पांवों में कुछ न्यूरोलॉजिकल फंक्शन होना चाहिए. त्वचा पर लगे इलेक्ट्रोड नस में मौजूद कंपन को पिक करते हैं. फिर उसे कंप्यूटर में प्रोसेस किया जाता है. नॉर्बर्ट बताते हैं, "सबसे मजेदार बात थी करीब करीब सही कदम उठाना, हालांकि यह कहना मुश्किल है कि कहां मेरे कदम रुके और कहां मशीन ने अपना काम शुरू किया."

शुरुआती शोध दिखाते हैं कि तीन महीने की ट्रेनिंग के बाद मरीज की हरकत, ताकत और कोऑर्डिनेशन में बेहतरी आती है. आने वाले समय में लक्ष्य है कि रोजमर्रा की जिंदगी में ज्यादा आत्मनिर्भरता आए. नॉर्बर्ट हॉर्शमन के लिए यह एक प्रोत्साहक शुरुआत है, "मेरी इच्छा है कि मैं अपनी जिंदगी में छोटी दूरियां फिर से पैदल चलकर तय कर सकूं और लगता है कि मैं वहां पहुंच रहा हूं. मैंने अपनी बेटी से वादा किया है कि मैं उसके साथ नाचूंगा, लेकिन इसमें थोड़ा वक्त लगेगा."

व्हीलचेयर में बैठा डॉक्टर

मिरको आख को भी शरीर के निचले हिस्से का पक्षाघात है. वे बोखुम के क्लीनिक में इस समय एक्सोस्केलेटन पर यूरोप की एकमात्र स्टडी को सुपरवाइज कर रहे हैं. उन्होंने इसका सबसे पहले टेस्ट किया था, वह भी अपने ऊपर. वह बताते हैं, "लकवे के शिकार लोगों पर हुई स्टडी का नतीजा यह है कि लकवे की गंभीर क्रोनिक हालत में भी जिसमें आमतौर पर कोई सुधार नहीं होता है, इस ट्रेनिंग की मदद से बेहतरी हासिल की जा सकती है."

मिरको आख खुद सर्जन हैं. ऑपरेशन थिएटर में उनका काम दूसरे साथियों से कतई अलग नहीं होता. उनके मरीज उनकी ही तरह पैरालिसिस के शिकार हैं. लेकिन लकवे वाले सर्जन को देखकर मरीजों की प्रतिक्रिया अलग अलग होती है. डॉक्टर आख बताते हैं, "जो मरीज हाल फिलहाल में इस स्थिति में आए हैं, उन्हें यह देखकर सदमा लगता है कि व्हीलचेयर उनकी जिंदगी में स्थायी रूप से रहने वाला है. ऐसे में हो सकता है कि एक ओर मरीजों को अच्छा लगे कि व्हीलचेयर में बैठा डॉक्टर उनकी भविष्य के लिए हिम्मत बढ़ाएगा. लेकिन दूसरी ओर कुछ लोग निराश भी हो सकते हैं क्योंकि वे ऐसा भविष्य नहीं चाहते हैं."

एक विशेष व्हीलचेयर की मदद से डॉक्टर आख बिना किसी मुश्किल के कठिन ऑपरेशन कर सकते हैं. उनके लिए इसका मतलब है सामान्य जिंदगी. लेकिन रीढ़ की हड्डी को दुरस्त करने का उपाय अब तक नहीं मिला है. मरीज को पूरी तरह स्वस्थ करना अभी तक संभव नहीं है. पूरी दुनिया में वैज्ञानिक इस समस्या पर काम कर रहे हैं. फिलहाल एक्सोस्केलेटन की मदद से व्हीलचेयर में बंधे लोग अपनी जंदगी में छोटा सा चमत्कार ला सकते हैं.

एमजे/आईबी

वीडियो देखें 04:26

बेहतर होते मशीनी अंग

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