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दुनिया

व्यावहारिक हों यौन अपराधों के कानून

भारत में बच्चों को यौन हिंसा के खतरे से बचाने के लिए बना पॉक्सो कानून बहस के घेरे में है. सार्थक नतीजे के लिए इस बहस में बच्चों की सुरक्षा के लिए बने कानून के पालन में लगे लोगों को शामिल होना चाहिए.

पॉक्सो कानून की खत्म करने की मांग केंद्र सरकार द्वारा पुराने और गैरजरुरी कानूनों को खत्म करने की मुहिम के साथ ही उठने लगी. खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अमेरिका में मेडिसन स्क्वायर पर अपने भाषण में व्यर्थ के कानूनी जंजाल से मुक्ति दिलाने की घोषणा के बाद सोशल मीडिया में यह मांग तेज हो गई. मोदी की तकरीर के बाद दिल्ली में 30 सितंबर को कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने लगभग 1000 अनुपयुक्त कानूनों की पहचान करने का दावा कर सोशल मीडिया पर कानूनों के दुरुपयोग की बहस को और तेज कर दिया.

माइक्रो ब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर पॉक्सो को खत्म करने के लिए पांच अक्टूबर को बाकायदा मुहिम शुरु हो गई. इसको नाम दिया गया मोदी सर स्क्रेप अनफेयर पॉक्सो लॉ. लेकिन इस मुहिम की सदाशयता पर सवालिया निशान तब लगने लगा जब इसे शुरु करने वालों की पहचान यौन हिंसा के तमाम मामलों में कैद आसाराम बापू के अनुयायियों के रुप में हुई. इस मुहिम के लिए सोशल मीडिया पर सक्रिय सैकड़ों लोग सिर्फ आसाराम को निर्दोष बताकर पॉक्सो और रेप कानूनों को गलत बता रहे हैं.

इनसे इतर भी महिला एवं बाल यौन हिंसा निरोधक कानूनों के दुरुपयोग पर देश में पहले से ही बहस जारी है. सुप्रीम कोर्ट में फौजदारी मामलों के वरिष्ठ वकील पवन शर्मा के मुताबिक पॉक्सो कानून को खत्म करने के पीछे सिर्फ दो प्रावधानों को आधार बनाकर इसके दुरुपयोग की दलील दी जा रही है. पहली दलील है कानून में दी गई बच्चे की परिभाषा और दूसरी अपराध की आशंका के आधार पर भी कार्रवाई करने की पुलिस की बाध्यता. वह कहते हैं कि पॉक्सो के तहत 18 साल तक की उम्र वाले हर शख्स को बच्चा मानते हुए उसे इस कानून का संरक्षण प्राप्त है.

इस दलील में दम है कि बच्चों में कम उम्र में ही मानसिक परिपक्वता को देखते हुए कानूनों में वयस्कता की उम्र 18 साल से घटाकर 16 साल करने की बहस हो रही है वहीं पॉक्सो में 18 साल तक के किशोरों को कानूनी संरक्षण देना कहां तक जायज है. पिछले कुछ सालों में 15 से 18 साल तक के किशोर अपराधियों की संख्या में इजाफे को देखते हुए पॉक्सो के दुरुपयोग की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है.

साथ ही पॉक्सो में अपराध की आशंका के आधार पर भी पुलिस को एफआईआर करने की बाध्यता इसके दुरुपयोग के खतरे को बढ़ा देता है. इतना ही नहीं बच्चे के खिलाफ यौन हिंसा की आशंका उसके अभिभावकों द्वारा जताना भी कार्रवाई के लिए पुख्ता आधार है. ऐसे में पॉक्सो और एंटीरेप कानूनों के दुरुपयोग के मामलों में बढ़ोतरी की हकीकत से इंकार नहीं किया जा सकता है. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में पेश आंकड़ों के मुताबिक साल 2012 में बलात्कार के 42 फीसदी मामले फर्जी पाए जाने के बाद अगले साल यह स्तर 75 फीसदी तक जा पहुंचा है.

दरअसल किसी भी कानून की अहमियत उसके उपयोग और दुरुपयोग की कसौटी से ही तय नहीं हो सकती है. उपयोग और दुरुपयोग उसके प्रावधानों की व्यवहारिकता पर निर्भर करते हैं. बच्चों और महिलाओं को यौन अपराधों के खतरे से निकालने के लिए कानून सख्त हों मगर अव्यवहारिक नहीं होने चाहिए. साथ ही महज आसाराम या किसी अन्य प्रभावशाली व्यक्ति को नहीं बल्कि 75 फीसदी निर्दोष लोगों को यौन हिंसा के आरोपी बनाने के हवाले से इस बहस को अंजाम तक पहुंचाना लाजिमी होगा. खासकर मजबूत इरादों से आगे बढ़ रही मौजूदा सरकार से कानून की विसंगतियों को दूर करने की उम्मीद करना बेमानी नहीं है.

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