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ब्लॉग

वोट की चोट पर कानूनी सवाल

भारत के चुनावों में मतदान से जुड़ी विसंगतियों के सवाल भी उठ रहे हैं. एक ओर जेल से ही चुनाव लड़ने पर पाबंदी की बात है तो दूसरी ओर प्रवासी नागरिकों को वोट डालने की सुविधा का सवाल है. जवाब अदालत के मार्फत खोजा जा रहा है.

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव सुधार की कवायद नई बात नहीं है. राजनीति का अपराधीकरण और मताधिकार से जुड़ी विसंगतियों पर सरकार से निराश लोगों को अदालत में दस्तक देनी पड़ रही है. अजीब बात है कि जेल में बंद किसी व्यक्ति को वोट डालने का हक नहीं है लेकिन वह जेल से चुनाव लड़ सकता है. खुद अपने लिए ही वोट डालने के अधिकार से वंचित तमाम आपराधिक छवि वाले लोग अब तक संसद की शोभा बढ़ा चुके हैं.

चुनाव सुधार की दिशा में कई कारगर कदम उठाने वाले सुप्रीम कोर्ट ने बीते साल इस विसंगति को दूर करते हुए जेल से चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी. लेकिन बाद में केन्द्र सरकार ने कानून में बदलाव कर अदालत के इस फैसले को असरहीन कर दिया. एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में इस बदलाव को चुनौती दी गई है. जबकि दूसरी विसंगति उन लाखों प्रवासी भारतीयों से जुड़ी हुई है जिनके पास मताधिकार तो है लेकिन आज के तकनीकी युग में भी उन्हें शारीरिक उपस्थिति के सवाल पर मताधिकार से वंचित रहना पड़ता है.

Hungama im Parlament

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जेल से चुनाव लड़ने का हक क्यों

अधिवक्ता मनोहर लाल शर्मा ने बीते सप्ताह शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर जेल से चुनाव लड़ने का अधिकार देने वाले प्रावधान को चुनौती दी है. संसद से हाल ही में जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन कर यह अधिकार दिया गया था. जस्टिस एचएल दत्तू की पीठ ने केन्द्र सरकार से इस प्रावधान की वैधता को साबित करने के लिए नोटिस जारी किया है. यह तो तय है कि सरकार अपने जवाब में दिल्ली हाईकोर्ट के गत 6 फरवरी के फैसले को आधार बनाएगी जिसमें अदालत ने जेल से चुनाव लड़ने का अधिकार देने वाले संशोधन को सही ठहराया था. लेकिन इस बार कानूनी विमर्श का मुद्दा वह प्रावधान बनेगा जो जेल में बंद किसी कैदी को मताधिकार से वंचित करता है.

दरअसल संविधान की मूल भावना के मुताबिक सजायाफ्ता या हिरासत में रखे गए किसी भी व्यक्ति का मताधिकार स्वतः निलंबित हो जाता है. जबकि जनप्रतिनिधित्व कानून प्रत्येक मतदाता को चुनाव लड़ने का पात्र बनाता है. कानून में हालिया संशोधन कर सरकार ने प्रावधान कर दिया कि हिरासत में रखे गए व्यक्ति का मताधिकार जमानत पर निर्भर होता है इसलिए जमानत मिलने की हर समय संभावना बरकरार रहने के कारण उसे चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता.

अब देखने वाली बात यह होगी कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसले में दी गई उस व्यवस्था को कैसे गलत साबित करेगी जिसमें कहा गया था कि मताधिकार से वंचित कोई व्यक्ति किसी भी निकाय का चुनाव नहीं लड़ सकता है.

प्रवासियों का मताधिकार

Wahlen in Indien 2014

निर्वाचन आयोग के जवाब का इंतजार

सबसे बड़े लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़ी दूसरी विसंगति विदेशों में रह रहे लाखों भारतीयों से जुड़ी है. निर्वाचन नियमों के मुताबिक मताधिकार का इस्तेमाल करने के लिए प्रत्येक नागरिक की उस मतदान केन्द्र पर शारीरिक मौजूदगी अनिवार्य है जहां वह मतदाता के रुप में पंजीकृत है. छह दशक पुराने इस प्रावधान को मौजूदा तकनीकी सहूलियतें भी निष्तेज नहीं कर पा रही हैं. जबकि इस बाध्यता से भारतीय दूतावासों और उच्चायोगों में तैनात भारतीय नागरिक मुक्त रखे गए हैं. एक एनआरआई डॉ. शमशीर ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर सुझाव दिया है कि उच्चायोग और दूतावासों में भारतीय कर्मियों के लिए मतदान की व्यवस्था की जाती है. इसमें प्रवासी नागरिकों को भी शामिल किया जा सकता है. जस्टिस केएस राधाकृष्णन और एनवी रमन्ना की खंडपीठ ने केन्द्र सरकार और चुनाव आयोग से इस सुझाव के बारे में जवाब देने को कहा है. हालांकि केन्द्र सरकार ने इस सुझाव को मानने योग्य बताया है सिर्फ चुनाव आयोग के रुख का अदालत को इंतजार है.

उम्मीद कायम है

याचिकाकर्ता ने अदालत से इसी चुनाव में प्रवासी भारतीयों को मताधिकार मुहैया कराने का आदेश जारी करने की मांग की है. उसका सुझाव है कि सभी दूतावासों में यह इंतजाम किया जाता है और प्रवासी भारतीयों के मताधिकार के इस्तेमाल के लिए महज एक आदेश जारी करने की औपचारिकता की जरूरत है. हालांकि आयोग के वकील ने अदालत को बताया है कि प्रवासी नागरिकों को इंटरनेट के जरिए मतदान करने के विकल्प पर विचार किया जा रहा है. इसके लिए आयोग द्वारा गठित कमेटी की रिपोर्ट का इंतजार है. सरकार, आयोग और अदालत के रुख को देखते हुए याचिकाकर्ता पक्ष की वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने उम्मीद जताई है कि इसी चुनाव में विदेशों में रह रहे भारतीय संबद्ध दूतावासों में अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकेंगे.

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव के इस महापर्व पर सियासी नजरिए से दुनिया भर की नजरें टिकी हैं. ऐसे में चुनाव सुधार की दिशा में की गई ये दोनों पहल उम्मीद तो जगाती ही हैं साथ ही संसद सें दागियों को दूर करने और बेहतर सरकार के गठन में सभी भारतीयों भागीदारी सुनिश्चित करने की राह आसान करती है.

ब्लॉग: निर्मल यादव, नई दिल्ली

संपादन: ओंकार सिंह जनौटी

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