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ब्लॉग

वेशभूषा के कारण नहीं होता बलात्कार

बलात्कार का सीधा संबंध सत्ताविमर्श से है, महिला की पोशाक से नहीं. लेकिन फिर भी अपराध के लिए अपराधी को नहीं, उस अपराध का शिकार होने वाले व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराया जाता है.

नारीवादी कही जाने वाली और नरेंद्र मोदी की स्तुति में मोदीनामा लिखकर लोकसभा चुनाव में मोदी का जमकर प्रचार करने वाली मधु किश्वर ने एक ट्वीट में विचार व्यक्त किया है कि सलवार कमीज महिलाओं के लिए सबसे सुरक्षित पहनावा है. इसका अर्थ है कि अन्य पहनावों में महिलाएं कम सुरक्षित हैं, यानि पहनावे का सीधा सीधा संबंध महिलाओं की सुरक्षा से है. यह वही तर्क है जो खाप पंचायतों से लेकर सभी धर्मों के झंडाबरदार कमोबेश देते रहते हैं और जिसे कुछ राजनीतिक नेता भी कई बार बिना समझे और अक्सर खूब समझ बूझ कर दुहराते हैं.

गांव से लेकर बड़े शहरों तक के कॉलेजों में छात्राओं के लिए समय समय पर ड्रेस कोड लागू होता रहता है और उन पर अक्सर पश्चिमी वेशभूषा न पहनने का प्रतिबंध लगाया जाता है. लोगों की सोच यह है कि यदि कोई लड़की जींस शर्ट या किसी और किस्म के पश्चिमी कपड़ों को पहन कर घर से बाहर निकलती है, तो वह परोक्ष रूप से पुरुषों को अपनी ओर आकृष्ट करना चाहती है और उन्हें छेड़खानी करने के लिए उकसा रही है. इसलिए यदि उसके साथ किसी किस्म का यौन दुर्व्यवहार होता है, यहां तक कि यदि वह बलात्कार की शिकार भी होती है, तब भी इसके लिए वही जिम्मेदार है. यानि अपराध के लिए अपराधी नहीं, उस अपराध का शिकार होने वाला व्यक्ति जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है.

लेकिन क्या यह सही है? भारत में हर वर्ष अब लगभग 25,000 बलात्कार दर्ज हो रहे हैं. सभी जानते हैं कि बलात्कार की शिकार अनेक महिलाएं पुलिस तक जाने और शिकायत दर्ज कराने की हिम्मत नहीं कर पातीं. इसलिए हकीकत में जितनी घटनाएं होती हैं, उनसे बहुत कम की रिपोर्ट हो पाती है. लेकिन 25,000 का आंकड़ा भी कोई कम नहीं है. इससे स्थिति की भयावहता का पता चलता है. और जब कभी बलात्कार का शिकार बनने वाली पीड़िता शिकायत करने का साहस दिखाती है, तो अक्सर पुलिस उसकी रिपोर्ट ही दर्ज नहीं करती.

पिछली 23 मार्च को दिल्ली से केवल 170 किलोमीटर दूर हरियाणा के हिसार जिले के भगाणा गांव में पिछड़ी धानुक जाति की चार लड़कियों को वहां के कुछ लोगों ने अगवा करके उनका बलात्कार किया. इनमें से सबसे छोटी लड़की की आयु 13 वर्ष और सबसे बड़ी की 18 वर्ष है. पिछली 18 अप्रैल से ये चारों राजधानी के जंतर मंतर पर इस मांग को लेकर धरने पर बैठी हैं कि पुलिस इनकी शिकायत दर्ज करे. लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही. बल्कि 4 जून को पुलिस ने उन्हें वहां से भी जबरन हटा दिया.

क्या इन लड़कियों का बलात्कार इसलिए किया गया क्योंकि इन्होंने उत्तेजक कपड़े पहन रखे थे? बदायूं में जिन दो नाबालिग लड़कियों को बलात्कार के बाद जीवित ही पेड़ से लटका कर मार दिया गया, वे क्या पश्चिमी वेशभूषा में थीं? पेड़ पर लटके उनके शवों के अखबारों में छपे दिल दहला देने वाले फोटो को देखने से पता चलता है कि उन्होंने वैसे ही कपड़े पहने हुए थे जिन्हें मधु किश्वार 'सुरक्षित' समझती हैं.

बलात्कार का संबंध सत्ता और वर्चस्व से है. बलात्कारी का उद्देश्य अपने शिकार के शरीर पर जबर्दस्ती कब्जा करके उस पर अपनी सत्ता और वर्चस्व कायम करना है, उसकी अस्मिता को अपमानित करके उसके व्यक्तित्व को कुचलना है, और इस तरह बलपूर्वक अपनी श्रेष्ठता को स्थापित करना है. इसका संबंध न पश्चिमी वस्त्रों से है और न ही भारतीय वस्त्रों से. इसका संबंध उस पुरातनपंथी दकियानूसी पितृसत्तात्मक मानसिकता से है जो स्त्री को पुरुष के सामने दीन हीन, बेबस और लाचार ही देखना चाहती है. जिसके लिए स्त्री का स्वतंत्र अस्तित्व ही उसके दुश्चरित्र होने यानि हरेक के लिए सुलभ होने का सुबूत है. बदायूं बलात्कार कांड के कुछ ही दिन बाद अलीगढ़ में एक महिला जज के साथ उनके मकान में ही बलात्कार करने की कोशिश की गई. बलात्कार को अक्सर बदला लेने के हथियार के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है.

इसी के साथ वह मानसिकता भी जुड़ी है जो उत्तर प्रदेश की सरकार और सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने प्रदर्शित की है. समाजवादी पार्टी के नेताओं का आरोप है कि राज्य में एक के बाद एक हो रहे बलात्कारों की मीडिया बढ़ा चढ़ा कर खबरें प्रसारित कर रहा है और यह राज्य सरकार के खिलाफ साजिश है. चुनाव प्रचार के दौरान समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव यह कह ही चुके हैं कि बलात्कार के लिए फांसी की सजा गलत है: "लड़कों से गलती हो जाती है, तो क्या इसके लिए उन्हें सूली पर लटका दिया जाएगा?" मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बलात्कार की बढ़ती घटनाओं के बारे में सवाल पूछने वाली एक महिला पत्रकार से ही उल्टे सवाल पूछ डाला: "आप को तो कोई खतरा नहीं है ना..." बलात्कार का सीधा संबंध सत्ताविमर्श से है, महिला की पोशाक से नहीं. इस सच्चाई को जितनी जल्दी स्वीकार कर लिया जाए, उतना ही अच्छा होगा.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

संपादन: ईशा भाटिया

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