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ब्लॉग

वीरान भारत में हरित क्रांति

दूषित आबोहवा के लिए भारत के दर्जनों शहर दुनिया भर में बदनाम हैं. लेकिन इसके बावजूद देश में चुपचाप एक हरित क्रांति भी हो रही है.

दुर्भाग्य भी कभी कभी देर सबेर सौभाग्य सा लगने लगता है. भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु जब 1962 में देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम की नींव रख रहे थे तो तमाम लोग उनका मजाक उड़ा रहे थे. वे तंज कस रहे थे कि देश में भुखमरी व कंगाली है और प्रधानमंत्री अंतरिक्ष के सपने देख रहे हैं. लेकिन नेहरु विचलित नहीं हुए. वे आगे बढ़े. आज छह दशकों के बाद कोई भारत के अंतरिक्ष अभियान का मजाक नहीं उड़ाता.

वनों के मामले में भी भारत में कुछ ऐसी ही सुगबुगाहट है. प्रशासन की अनदेखी कहें या गांवों की तुच्छ भीतरी राजनीति, भारत में बीते 60 साल में गांवों से व्यापक पलायन हुआ. छोटे से कस्बे शहर बन गए और शहर महानगरो में बदल गए. विकास, सुविधाओं और रोजगार की दौड़ में पीछे छूटे गांव वीरान पड़ गए.

Deutsche Welle Hindi Onkar Singh Janoti

ओंकार सिंह जनौटी

उनकी तरफ ज्यादातर लोगों ने ध्यान देने की जरूरत नहीं समझी. लेकिन इसी दौरान वहां चुपचाप एक प्राकृतिक क्रांति घटने लगी. जंगल फिर से खड़े होने लगे. देहातों तक बिजली और गैस पहुंचने के साथ ही लोगों की लकड़ी पर निर्भरता भी कम हुई. इसके चलते हजारों गांवों में जंगल फिर से लहलहाते दिखने लगे हैं. पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, केरल और उत्तराखंड और पूर्वोत्तर राज्य इसके गवाह हैं. 2011 के मुकाबले 2013 में भारत में वन क्षेत्र करीब 6000 वर्ग किलोमीटर फैला.

जिन राज्यों में वन विभाग ठीक ठाक काम कर रहा है, वहां से अच्छे संकेत आ रहे हैं. हालांकि कई राज्यों में राजनैतिक या बाहुबली जड़ों वाले खनन माफिया अब भी बड़ी समस्या बने हुए हैं. कानूनी पट्टा हो या न हो, वे गैरकानूनी मात्रा में प्राकृतिक संसाधन निकालते हैं, साथ ही पेड़ भी काटते हैं. इन पर लगाम कसनी जरूरी है.

भारत ने संयुक्त राष्ट्र के सामने अगले 15 साल में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में 35 फीसदी कटौती का एलान किया है. पर्यावरण एवं वन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने जो वादा किया है, उसे निभाने के लिए राज्य, जिला और पंचायत स्तर पर व्यापक बदलाव करने होंगे. वन्य कानूनों को अमल में लाने के साथ साथ सड़कों से सभी पुराने खटारा वाहन हटाने होंगे. कर्मचारियों और दफ्तरों को एक दूसरे के करीब लाना होगा. स्वच्छ और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना होगा. आधुनिक एयर फिल्टरों के बिना चल रही फैक्ट्रियां बदलनी होंगी. रिसाइक्लिंग कारोबार को बेहतर बनाना होगा.

ये सब नए इलाके हैं, जिन्हें विकसित करना होगा. ऊर्जा के लिहाज से स्वच्छ और किफायती मशीनें अगली सदी का आर्थिक भविष्य तय करेंगी. अगर भारत खुद इन्हें विकसित करे तो वह वैश्विक बाजार में एक बड़ा खिलाड़ी बन सकता है.

लेकिन अगर यह वादा सिर्फ अंतरराष्ट्रीय दबाव को कम करने के इरादे से छोड़ा गया शिगूफा भर है तो त्राहिमाम मचेगा. भारत सरकार यह बात खुद मानती है कि देश में पाई जाने वाली 60-70 फीसदी बीमारियां गंदगी की देन हैं. प्रदूषण और बढ़ा तो इनके मरीजों की संख्या भी बढ़ेगी. दूसरी तरफ जलवायु परिवर्तन की मार खेती और रिहाइशी इलाकों पर भी पड़ेगी. तब उससे बचने के बहुत कम विकल्प होंगे, इसीलिए बेहतर है कि कमर अभी से कसी जाए.

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