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दुनिया

विश्व नेताओं का दिल्ली दरबार

अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा आ चुके हैं, और आने वाले दिनों में दुनिया के अन्य नेता भी दिल्ली की यात्रा करने वाले हैं. इनमें शामिल हैं फ्रांस और रूस के राष्ट्रपति और चीन के प्रधानमंत्री.

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शुरुआत ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने की थी. प्रधानमंत्री बनने के बाद जुलाई में तुरंत उन्होंने भारत की यात्रा की और उसी के साथ शुरू हुआ विश्व के महत्वपूर्ण देशों के नेताओं का सिलसिला. अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा की यात्रा के दौरान राजनीतिक सवालों के अलावा अमेरिका के व्यापारिक हितों पर काफी जोर दिया गया.

Indien David Cameron Manmohan Singh

15 अरब डॉलर के व्यापारिक समझौते किए गए, जिसके तहत 4.1 अरब डॉलर के मूल्य में दस भारी ट्रांसपोर्ट विमानों का सौदा भी शामिल था. इसे अब तक रक्षा क्षेत्र में दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा समझौता माना जा रहा है.

फ्रांसीसी राष्ट्रपति निकोला सारकोजी भी पीछे नहीं हैं. दिसंबर के आरंभ में वे भारत आ रहे हैं और मिराज विमानों के आधुनिकीकरण के लिए 2.1 अरब डॉलर का एक सौदा होने वाला है. इसके अलावा भारत में परमाणु रिएक्टर के लिए दोनों देशों के बीच पहला व्यवसायिक समझौता होने वाला है.

रूस भी कतार में है. राष्ट्रपति मेदवेदेव की यात्रा के दौरान पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के सौदे को आगे बढ़ाया जाएगा. भारत इस प्रकार के कुल 250 विमानों की खरीद में दिलचस्पी दिखा रहा है. चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ दिसंबर के मध्य में भारत की यात्रा करेंगे.

यह सच है कि सीमा सहित कई सवालों पर दोनों देशों के बीच तनाव हैं. लेकिन चीन इस बीच भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन चुका है और भारत चीन के साथ व्यापारिक संबंधों को बढ़ाते हुए व्यापार संतुलन के अभाव को घटाना चाहता है.

सवाल सिर्फ व्यापारिक सौदों का नहीं है. भारत का खरबों रुपये का अर्थजगत सभी महत्वपूर्ण देशों के लिए एक आकर्षण है. वहां साढ़े आठ फीसदी आर्थिक वृद्धि देखी जा रही है और विशेषज्ञों के अनुसार अगले बीस सालों में वह सबसे बड़ी आर्थिक ताकतों में से एक होगा.

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पुष्पेश पंत की राय में भारत की विदेश नीति की प्राथमिकताएं बदल रही है. इन चारों नेताओं की यात्राओं के दौरान अलग अलग विषयों पर जोर दिया जाएगा. वैसे इन चारों के बीच एक समानता है. वे सभी ऐसे देशों के नेता हैं, जो सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य हैं. और भारत भी स्थाई सदस्यता की होड़ में है.

रिपोर्ट: मुरली कृष्णन, नई दिल्ली

संपादन: उज्ज्वल भट्टाचार्य

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