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मनोरंजन

विश्वास की खातिर बनाएंगे फिल्में

आम लोगों और अल्पसंख्यकों की जिन्दगी से जुड़े मुद्दों को लेकर फिल्में बनाने वाले सईद अख्तर मिर्जा आजकल फिल्मों से दूर हैं. उनका कहना है कि दुनिया की राजनीतिक स्थिति ने उनके अंदर के कलाकार को लिखने की प्रेरणा दी.

न्यू यॉर्क में अपनी किताब "अम्मी: लैटर टु ए डेमोक्रेटिक मदर" के विमोचन के लिए आए सईद मिर्जा ने डीडब्ल्यू से बात करते हुए बताया कि डेमोक्रेटिक मदर से उनका क्या मतलब है. उनके शब्दों में, " डेमोक्रेसी, मानवाधिकार, आजादी, सभ्यता जैसे शब्दों का इस्तेमाल अक्सर उन खोखले मायनो में किया जाता है जिन पर सवाल लगाए जा सकते हैं. आज इन्ही बेमायने इस्तेमाल के कारण दुनिया में अशांति है."

इसलिए उन्होंने अपनी मां को लोकतांत्रिक मां का खिताब दिया है ताकि उस शब्द की गरिमा और मर्यादा को सही मायने में किसी भी मां के साथ जोड़ा जा सके. सईद मिर्जा मानते हैं कि डेमोक्रेसी के नाम पर अपनी मर्जी दूसरों पर नहीं थोपी जानी चाहिए.

हिन्दी फिल्मों का नया दौर

लोग कहीं के भी हों उनके सम्मान का पालन करना बहुत जरुरी है. अपनी इस किताब के बारे में उनका कहना है," किताब साहित्यिक या राजनीतिक प्रेरणा का रूप है. इसे एक उपन्यास नहीं कहा जा सकता है बल्कि मेरे अनुसार वर्णन, प्रेमकहानी, इतिहास, संस्मरण या राजनीतिक आलेख का समागम है जिसे किसी एक शैली में बांधा नहीं जा सकता है. यह एक संवाद है."

1970 और 1980 के दशक में हिन्दी फिल्मों का एक नया दौर शुरू हुआ था. श्याम बेनेगल, मणि कौल और सईद मिर्जा जैसे फिल्मकारों की फिल्मों को सामानांतर फिल्मों की श्रेणी में रखा जाने लगा. सईद मिर्जा कहते हैं, "वह दौर हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण था. शायद हम सोचते थे कि अपनी फिल्मों के माध्यम से हम दुनिया बदल सकते हैं, बदल तो नहीं सके लेकिन कोशिश अवश्य की. वह दौर ऐसा था जब दुनिया में बहुत कुछ बदल रहा था. हम उस बदलती दुनिया को देख रहे थे, सवाल उठा रहे थे अपनी फिल्मों के माध्यम से. वह फिल्में समाज का आइना थीं."

समाज का ताना बाना

अपनी पहली फीचर फिल्म "अरविन्द देसाई की अजीब दास्तां" से लेकर उनकी सभी फिल्में आम लोगों और अल्पसंख्यकों की जिन्दगी से जुड़े मुद्दों को दर्शाती हैं. अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है, मोहन जोशी हाजिर हो या सलीम लंगड़े पर मत रो, ये सभी फिल्में समाज के ताने-बाने का बहुत यथार्थ चित्रण करती हैं. टीवी धारावाहिक नाटकों की विधा में उनके नाटक नुक्कड़ में भी आम गली और मोहल्ले में रहने वाले लोग थे.

लेकिन धीरे धीरे सईद मिर्जा की सोच बदलने लगी. हालांकि उन्होंने एक बार फिर यथार्थवाद का सहारा लेते हुए एक फिल्म बनाई, नसीम. बाबरी मस्जिद विध्वंस की प्रष्ठ्भूमि में बनी इस फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरूस्कार से सम्मानित सईद मिर्जा का कहना है कि जब जिन्दगी से कविता निकल गयी तो वह दौर भी चला गया और उन्हें लगा कि वे फिल्म और नहीं बनायेंगे.

बाबरी मस्जिद कांड

उनका कहना हे कि बाबरी मस्जिद गिराए जाने की घटना ने उन्हें झकझोर दिया, उनके विश्वास को डगमगा दिया. उस विश्वास को फिर से पाने के लिए उन्होंने भारत का दौरा किया. आम आदमी के रोजमर्रा के विचारों को जानने के लिए, उनके जिद्दोजहद का जायजा लेने के लिए और कुछ हद तक आत्ममंथन के लिए मिर्जा ने जगह जगह जा कर उन लोगों की कहानी कैमरे में उतारी और डॉक्यूमेंट्री बनाई.

उनका कहना है, "अपने विश्वास की खातिर, अपने विचरों की अभिव्यक्ति के लिए मैने सिनेमा से लेखन की ओर रुख कर लिया जो मुझे अधिक संतुष्टि देता है." तो क्या वे फिल्में नहीं बनायेंगे? सईद अख्तर मिर्जा का उतर, "अगर मैं वापस आता हूं तो टीवी के माध्यम से अपनी दूसरी पारी शुरू करना चाहूंगा. ऐसा नहीं है कि फिल्म बनाऊंगा ही नहीं, लेकिन वह फिल्म बनाऊंगा जिसमे मुझे पूरा विश्वास हो."

रिपोर्टः अंबालिका मिश्रा

संपादनः मानसी गोपालकृष्णन

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