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दुनिया

विवादों से एएफडी का कितना नुकसान होगा?

जर्मनी की धुर दक्षिणपंथी राजनीतिक पार्टी एएफडी के दो शीर्ष नेता चुनाव से ठीक पहले नस्लभेद के आरोपों में घिर गये हैं लेकिन क्या इस तरह के विवाद वोटरों को उन्हें पहली बार संसद में भेजने से रोक पायेंगे?

जर्मनी के ज्यादातर लोग नस्लभेद के बारे में खुले तौर पर बोलने से बचते हैं लेकिन 76 साल के अलेक्जांडर गाउलंड इनसे अलग हैं. अल्टरनेटिव फॉर डॉयचलैंड यानी एएफडी 24 सितंबर के चुनावों के बाद पहली बार जर्मन संसद में पांव रखने की तैयारी में है. ट्वीड जैकेटों और खास थीम वाली टाइयों में किसी अंग्रेज जेंटलमैन की तरह दिखते गाउलंड ने एक तुर्क जर्मन राजनीतिज्ञ को "अनातोलिया भेजने" की बात कह नस्लभेद भड़काने के आरोपों की संभावित तैयारी कर ली है.

जर्मनी का राजनीतिक तंत्र गाउलंड के उस बयान के लिए उनके पीछे पड़ा है जो उन्होंने जर्मनी में जन्मे सरकारी आयुक्त आयदान ओएजोगुज के लिए कहा था. ओएजोगुज ने मई में एक लेख में कहा था, "भाषा से परे विशेष जर्मन संस्कृति की पहचान नहीं हो सकती." इसी पर प्रतिक्रिया में गाउलंड ने ओएजोगुज को "अनातोलिया भेजने की बात" कही थी.

चांसलर अंगेला मैर्केल आम तौर पर एएफडी के बारे में ज्यादा कुछ नहीं बोलतीं लेकिन इस मामले पर उन्होंने भी गाउलंड के बयान को "नस्लभेदी" कहा. मैर्केल ने कहा, "ये हर बार एक ही तरह के मॉडल को अपना रहे हैं, पहले भड़काते हैं और फिर थोड़ा पीछे हट जाते हैं, इससे अपने आप ही पता चल जाता है कि इस तरह के विवादों को जन्म देने वाले लोगों की मानसिकता क्या है."

गाउलंड का कहना है कि वो अपने बयान पर कायम हैं. वे अपनी पार्टी में अकेले नहीं हैं जो चुनाव से पहले इस तरह के विवादों में फंसे हैं. 38 साल की समलैंगिक एलिस वाइडेल को धुर दक्षिणपंथी पार्टी में उदार चेहरे के रूप में शामिल किया गया था लेकिन वो इन दिनों अपने ऊपर लग रहे नस्लवाद के आरोपों को नकारने में जुटी हैं. एलिस और गाउलंड इस बार के चुनाव में पार्टी की ओर से शीर्ष उम्मीदवार हैं.

जर्मन अखबार डी वेल्ट और बिल्ड में सप्ताहांत में छपे एक लीक ईमेल से पता चलता है कि एएफडी के धुर दक्षिणपंथी धड़े में प्रवासियों के खिलाफ मानसिकता पर व्यापक सहमति है. 24 फरवरी 2013 की तारीख वाले इस ईमेल में वाइडेल ने कथित रूप से आरोप लगाया है कि मैर्केल सरकार जर्मनी में अरब, सिंती और रोमा लोगों को भर कर यहां के नागरिक समाज को खत्म करना चाहती है और जर्मनी को अपनी "जेनेटिक एकता" बनाए रखनी चाहिए."

वाइडेल ने कथित रूप से ईमेल में लिखा है, "ये सूअर (सरकार में शामिल लोग) और कुछ नहीं बस दूसरे विश्व युद्ध के विजेताओं के हाथ की कठपुतली हैं." इसके बाद जर्मनी की राजनीति में हलचल मची है. हालांक वाइडेल के वकील ने तुरंत बयान दिया कि यह ईमेल मनगढ़ंत है.

मैर्केल की बवेरियाई सहयोगी पार्टी क्रिश्चियन सोशल यूनियन के महासचिव आंद्रेयास शॉयर ने कहा, "एएफडी...सचमुच एक झूठों की पार्टी है जो जर्मनी की संवैधानिक व्यवस्था को खारिज करती है और उसे तोड़ने के लिए लड़ रही है."

गाउलंड और दूसरे लोगों का कहना है कि इस मामले के जरिये मीडिया और सरकार मिल कर वाइडेल को चुनाव के पहले बदनाम करना चाहते हैं. हालांकि अखबार डी वेल्ट अपने सूत्र की बातों पर अडिग है और उसका कहना है कि यह ईमेल वाइडेल ने अपने एक पूर्व सहयोगी को भेजा था. अखबार के मुताबिक सूत्र ने इस बात की शपथ ली है कि यह ईमेल वास्तविक है.

थोड़े दिन पहले तक एएफडी लाखों शरणार्थियों को जर्मनी में प्रवेश देने के फैसले से उभरे असंतोष की लहर पर सवार थी. एएफडी को पिछले महीनों में जर्मन राज्यों के करीब दर्जन भर चुनावों में फायदा मिला और यहां तक कि इसने मैर्केल के गृह राज्य में उनकी अनुदारवादी सीडीयू से ज्यादा समर्थन हासिल करने में भी सफलता पाई.

सरकार लगातार इस पार्टी के खिलाफ बोल रही है. न्याय मंत्री हाइको मास ने सोमवार को एक अखबार में वोटरों से एएफडी को वोट ना देने की अपील करते हुए लेख लिखा जिसमें कहा गया है, "जर्मन संविधान से मिले आजादी में निहित नागरिक अधिकारों का एएफडी बहुत कम सम्मान करती है."

एएफडी अपनी नीतियों में जर्मन मुद्रा डॉयचमार्क को वापस लाने, मुसलमान लोगों के चेहरा ढकने पर रोक और देश की सीमाओं को प्रवासियों के लिए बंद करने की बात करती है. ये मुद्दे दक्षिणपंथियों को अब भी लुभाते हैं लेकिन कुछ लोग इसके भ्रम से बाहर भी निकले हैं और उन्हें लग रहा है कि यह उग्र दक्षिणपंथ की ओर बढ़ रही है.

विशेषज्ञों की दलील है कि एएफडी के सदस्यों के विवादों में घिरने भर से वोटर उनसे दूर नहीं जायेंगे क्योंकि एएफडी इस वक्त सभी पार्टियो से जो नाखुश लोगों की पसंद बन रही है. एक ऑनलाइन पत्रिका से बातचीत में विदेश मंत्री जिग्मार गाब्रिएल ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि जिन लोगों का भ्रम टूटा है वे एएफडी की तरफ नहीं जाएंगे, "अन्यथा हम संसद में दूसरे विश्व युद्ध के बाद पहली बार फिर से असली नाजियों को देखेंगे."

एनआर/एमजे (डीपीए)

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