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दुनिया

विवादों में भारत का नया बाल मजदूरी कानून

राज्यसभा के बाद लोकसभा ने भी बाल मजदूरी कानून 1986 में संशोधन करने वाले विधेयक को पारित कर दिया है, लेकिन ये संशोधन विवादों में है. संयुक्त राष्ट्र संस्था यूनिसेफ ने भी संशोधनों की आलोचना की है.

अब संशोधित कानून को लागू होने के लिए केवल राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की मंजूरी की प्रतीक्षा है. यह मंजूरी मिलने में कोई अड़चन नजर नहीं आती और शीघ्र ही यह कानून देश भर में लागू हो जाएगा. सरकार की दलील है कि भारतीय सामाजिक-आर्थिक यथार्थ और बाल कल्याण के बीच संतुलन बिठाने के लिए उसे 1986 के कानून में संशोधन करना पड़ा है. नए कानून में यह छूट दी गई है कि 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चे भी पारिवारिक व्यवसाय में काम कर सकते हैं. इसके अलावा जहां पहले 83 क्षेत्रों को खतरनाक घोषित किया गया था, वहीं अब केवल तीन क्षेत्र ही खतरनाक माने गए हैं. यानी अब इनमें भी बाल श्रम का इस्तेमाल किया जा सकेगा.

भारत में कितने बाल श्रमिक हैं, इसके बारे में बहुत प्रामाणिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. इनकी संख्या 43 लाख से लेकर एक करोड़ तक बताई जाती है. जो भी हो, इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत में बहुत बड़े पैमाने पर बच्चों से काम लिया जाता है. छोटे खेतिहर किसान और मजदूर से लेकर कारीगर तक अपने बच्चों को बहुत कम उम्र से ही काम पर लगा देते हैं और इस तरह से वे परिवार पर आर्थिक बोझ होने के बजाय पारिवारिक आय बढ़ाने वाले बन जाते हैं. उन्हें या तो स्कूल भेजा ही नहीं जाता या फिर वे जल्दी ही स्कूल जाना छोड़ देते हैं. ऐसे बच्चों के अलावा एक बहुत बड़ी तादाद ऐसे बच्चों की है जिन्हें बंधुआ मजदूर की तरह जबरदस्ती काम पर लगा दिया जाता है. ईंट के भट्टे हों या ढाबे, आतिशबाजी का सामान बनाने का उद्योग हो या जरी बनाने और शॉल पर कढ़ाई करने का, कूड़ा-कचरा बीनना और साफ करना हो या फिर घरेलू नौकर की तरह काम करना, जीवन का कोई भी क्षेत्र बाल श्रम की भयावह उपस्थिति से बचा नहीं है. बाल श्रम के खिलाफ अपने अभियान के लिए नोबल पुरस्कार पाने वाले कैलाश सत्यार्थी संसद द्वारा पारित नए कानून को बच्चों के हितों के खिलाफ मानते हैं.

लेकिन सरकार का कहना है कि पुराना कानून बना तो दिया गया था, लेकिन उस पर अमल नहीं हो पा रहा था क्योंकि उस पर अमल किया जाना व्यावहारिक दृष्टि से संभव ही नहीं था. लेकिन अब जो कानून बना है, उस पर अमल हो सकेगा. यथार्थवादी दृष्टि से देखें तो इस दलील में दम नजर आता है क्योंकि पुराना कानून भले ही बहुत अच्छा था, लेकिन उस पर अमल भी बहुत कम हो पा रहा था. पर आदर्शवादी दृष्टि से देखने पर लगता है कि घड़ी की सुई को पीछे घुमाया जा रहा है और सरकार बाल कल्याण के लिए अपने संवैधानिक प्रतिबद्धता से पीछे हट रही है. सरकार का दायित्व नागरिकों से कानून पर अमल करवाना है और जो ऐसा करने से इंकार कर दे, उसे कानून के मुताबिक सजा दिलाना है. तर्क दिया जा सकता है कि हत्या और बलात्कार जैसे अपराधों के खिलाफ कानून होने के बावजूद ये अपराध रुक नहीं रहे हैं. यानी इन कानूनों पर अमल नहीं हो पा रहा है, और इसलिए इन्हें भी बदला जाए. अगर ऐसा होने लगा तो फिर कानून के शासन का क्या अर्थ रह जाएगा? यथार्थ के अनुसार कानून बदलने के बजाय यदि सरकार कानून के अनुसार यथार्थ को बदलने पर ध्यान दे, तो बेहतर होगा. यह वर्तमान सरकार का ही नहीं, सभी सरकारों का दायित्व है.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

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