1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

विवादों के बीच शार्ली एब्दो पर हमले की वर्षगांठ

फ्रांस की पत्रिका शार्ली एब्दो एक बार फिर सुर्खियों में है. ठीक एक साल पहले पेरिस में पत्रिका के दफ्तर पर आतंकी हमला हुआ था. अब इस हमले की पहली बरसी पर पत्रिका ने फिर एक ऐसा कार्टून छापा है जिस पर नाराजगी जताई जा रही है.

शार्ली एब्दो ने पत्रिका का स्पेशल एडिशन निकाला है. काले और सफेद रंग के कवर पेज पर जो कार्टून बना है वह कथित रूप से भगवान का बताया जा रहा है. कार्टून में दाढ़ी मूंछ वाला एक बूढ़ा व्यक्ति बना है, जिसकी कमर पर एके47 बंधी है, पैरों में चप्पलें हैं और कपड़ों पर लहू लगा है. वह पीछे देख कर भागता हुआ नजर आ रहा है और ऊपर शीर्षक है, "एक साल बाद, कातिल अब भी हाथ नहीं लगा है." इस एडिशन की दस लाख प्रतियां छापी गयी हैं और हजारों को विदेशों में भी भेजा जा रहा है.

वैटिकन ने इस कार्टून की निंदा करते हुए लिखा है, "हठीले धर्मनिरपेक्षवाद का मायावी झंडा लिए फ्रांस की यह पत्रिका एक बार फिर भूल रही है कि हर धर्म के नेता बार बार यह दोहराते रहे हैं कि धर्म के नाम पर हिंसा गलत है, जैसा कि पोप फ्रांसिस ने भी कई बार जोर दे कर कहा है, नफरत को सही ठहराने के लिए भगवान का इस्तेमाल करना सही मायनों में ईशनिंदा है." वैटिकन ने अपने अखबार में आगे लिखा है, "शार्ली एब्दो का फैसला एक दुखद विरोधाभास है, वह भी एक ऐसी दुनिया में, जहां राजनीतिक रूप से सही होने को बेहूदगी की हद तक अहमियत दी जाती है, लेकिन फिर भी वह लोगों की भगवान में आस्था को ना ही स्वीकारना चाहता है और ना ही उस विश्वास की इज्जत करना चाहता है, फिर चाहे मानने वाले किसी भी धर्म के क्यों ना हों."

फ्रांस में आयोजन

इस बीच फ्रांस में आतंकी हमलों की बरसी पर एक हफ्ते तक आयोजन चल रहे हैं. मारे गए लोगों के परिवार की उपस्थिति में फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांसोआ ओलांद ने मंगलवार को शार्दी एब्दों के पुराने दफ्तर पर एक स्मारक पट्टिका का उद्घाटन किया जिस पर मारे गए लोगों के नाम लिखे थे. 10 जनवरी को पेरिस के रिपब्लिक प्लाजा पर एक और समारोह होगा. पेरिस के मेयर ने घोषणा की है कि इस समारोह के दौरान "यादगार का एक पेड़" लगाया जाएगा. मारे गए लोगों को फ्रांस की सबसे बड़ी उपाधि "लीजन ऑफ ऑनर" भी दिया गया है.

7 से 9 जनवरी तक हुए हमलों में पिछले साल 17 जानें गयीं थीं. इसके बाद से " जे सुई शार्ली" के नारे के साथ दुनिया भर में अभिव्यक्ति की आजादी के लिए एकजुटता दिखाई दी. ये हमले व्यंग्य पत्रिका के पत्रकारों के अलावा यहूदियों पर केंद्रित थे. पेरिस में रहने वाले यहूदियों का कहना है कि वे आज भी खुद को शहर में सुरक्षित महसूस नहीं करते हैं. हमले से बच कर निकलने वाली एक निवासी ने बताया, "मैं यहां बिलकुल भी सुरक्षित महसूस नहीं करती हूं. यहूदी होने के कारण हमें बार बार निशाना बनाया जाता है. और यह देश तो वैसे भी जिहादियों के निशाने पर है." 13 नवंबर 2015 को एक बार फिर पेरिस में आतंकी हमले हुए, जिसके बाद फ्रांस ने इस्लामिक स्टेट के खिलाफ युद्ध की घोषणा की.

आईबी/एमजे (एएफपी, रॉयटर्स)

DW.COM