विरोधों में दबा नेपाल का चुनाव | दुनिया | DW | 19.11.2013
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दुनिया

विरोधों में दबा नेपाल का चुनाव

नेपाल में संविधान सभा के चुनाव के लिए मंगलवार को मतदान होना है लेकिन विपक्षी पार्टी के समर्थकों ने हिंसक विरोध प्रदर्शनों से मुश्किल खड़ी कर दी हैं. देश में स्थिर लोकतंत्र के लिए चुनाव अहम हैं.

चुनाव के विरोध में 33 विपक्षी पार्टियों के गठबंधन ने नेपाल में चक्का जाम का एलान किया. उनकी मांग है कि वर्तमान अंतरिम प्रशासन भंग कर नई बहुदलीय सरकार बनाई जाए, जिसके देख रेख में चुनाव हों. विपक्षी धड़े का आरोप है कि 19 नवंबर का मतदान मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में निष्पक्ष नहीं हो सकेगा. लेकिन विपक्ष दलों का ये विरोध हर किसी के गले नहीं उतर रहा है. देशभर में कई ट्रांसपोर्टरों ने हड़ताल स्वीकार नहीं की, इसके बाद विपक्षी दलों के समर्थक हिंसा पर उतर आए. काठमांडू में कुछ कारों में आग लगा दी और जबरदस्ती दुकानों को बंद करने की कोशिश की. देश के अधिकतर हिस्से इस कारण ठप पड़ गए.

यह राजनीतिक उठापटक की सबसे ताजा घटना है और यह दिखाती है कि दुनिया के सबसे युवा लोकतंत्र में कितना गहरा ध्रुवीकरण है. अमेरिका के ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूट में वरिष्ठ फेलो फांडा फेलबाब ब्राउन कहती हैं, "बंद या हड़ताल वो उपाय हैं, जो नेपाल में इस्तेमाल किए जाते हैं ताकि रुकी आर्थिक गतिविधियों के दबाव में दूसरी पार्टियां रियायत देने को मजबूर हो जाएं. हर बार जब भी फैसले की घड़ी आती है, नेपाल के नेता बंद बुला लेते हैं." डीडबल्यू से बातचीत में उन्होंने कहा कि यह सिलसिला पिछले कई साल से इस्तेमाल किया जा रहा है, खासकर मई 2012 के बाद से, जब नया संविधान बनाने की सीमा चौथी बार खत्म हो रही थी.

Nepal Soldaten Generalstreik 11.11.2013

नेपाल में हड़ताल

सहमति नहीं

तीन करोड़ की जनसंख्या वाले नेपाल में सत्ता के लिए संघर्ष का बीज 20 साल पुराना है. नेपाल में सदियों से राजशाही रही है. लेकिन 1990 में हालात बदलने शुरू हुए जब लोकतंत्र समर्थक दलों ने राजा पर दबाव डालना शुरू किया और उन्हें संवैधानिक राजशाही बनाने पर सहमत किया.

सामाजिक अस्थिरता और पार्टियों में झगड़े के कारण एक दशक तक गृहयुद्ध की स्थिति रही, जिसमें 1,60,000 लोगों की जान गई. मई 2006 में विवाद खत्म हुआ जब सरकार माओवादियों के साथ समझौते पर पहुंची. इसके बाद राजशाही पूरी तरह खत्म हो गई और दो साल बाद देश गणतंत्र घोषित हुआ.

2006 की शांति वार्ता के बाद वैसे तो नया दौर शुरू होने वाला था. लेकिन 2008 में बनी संविधान सभा चार साल में भंग कर दी गई क्योंकि वह प्रस्तावों पर सहमत नहीं हो पाई. 2013 की शुरुआत में तय किया गया कि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार गृह युद्ध के खत्म होने के बाद देश का दूसरा चुनाव करवाएगी.

भारी असहमति

देश के एक लाख बीस हजार मतदाता 601 सदस्य चुनेंगे जो नया संविधान बनाएंगे. तीन मुख्य पार्टियों यूनिफाइड मार्क्सिस्ट लेनिनिस्ट, नेपाली कांग्रेस और माओवादी के साथ 100 पार्टियां चुनाव में शामिल हैं. साफ नहीं है कि क्या पार्टियां आपसी मतभेद खत्म कर पाएंगी.

एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल जैसी कुछ पार्टियां अमेरिकी राष्ट्रपति प्रणाली चाहती हैं तो मार्क्सिस्ट लेनिनिस्ट फ्रांसीसी लोकतंत्र की पैरवी करती हैं. वहीं मधेसी जैसी पार्टियां भी हैं जो कमजोर केंद्रीय सरकार और मजबूत क्षेत्रीय स्वायत्तता की समर्थन हैं.

चुनावी प्रक्रिया को पटरी से उतारने की कोशिशें बढ़ रही हैं, जबकि देश के लिए यह चुनाव अहम है. जिस तरह का राजनीतिक ध्रुवीकरण नेपाल में है, विश्लेषकों को आशंका है कि नई सभा इस बार भी अपना लक्ष्य शायद ही पूरा कर पाए.

रिपोर्टः श्रीनिवास मुजुमदारु/एएम

संपादनः ओंकार सिंह जनौटी

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