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ब्लॉग

विफल हुई ओबामा की आईएस रणनीति

तुर्की की सीमा पर स्थिति सीरियाई शहर कोबानी में इस्लामिक स्टेट आईएस के लड़ाकों की सफलता आसन्न त्रासदी की ओर इशारा करती है. डॉयचे वेले के ग्रैहम लूकस का कहना है कि इससे राष्ट्रपति बराक ओबामा की रणनीति विफल होती लग रही है.

सैनिक विशेषज्ञों को इन विचारों की पुष्टि होती लग रही है कि आईएस को आगे बढ़ने से रोकने की पश्चिमी रणनीति का विफल होना तय है, यदि वे सिर्फ हवाई हमलों और इराकी सेना और कुर्द सेना को प्रशिक्षण देने के लिए सलाहकारों को भेजने पर भरोसा करते हैं. हवाई हमलों ने आईएस के लड़ाकों के आगे बढ़ने को धीमा कर दिया है, लेकिन उन्हें रोक नहीं पाया है. ताजा रिपोर्टें बताती हैं कि आईएस के लड़ाके इराक की राजधानी के बाहर तक पहुंच गए हैं.

वॉशिंगटन में आईएस के लड़ाकों को सिर्फ हवाई हमलों की मदद से कमजोर करने की ओबामा की रणनीति का विरोध बढ़ रहा है. राष्ट्रपति आईएस के नेताओं को लक्ष्य बनाने के लिए विशेष टुकड़ियां भेजने की योजना बना रहे हैं, लेकिन इससे कंजरवेटिव रिपब्लिकन संतुष्ट नहीं होंगे जो थल सेना भेजने की मांग कर रहे हैं. फिलहाल जनमत ओबामा की संयम की नीति का समर्थन कर रहा है.

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ओबामा की सावधानी समझ में आती है. उन्हें विदेशी लड़ाई में अमेरिका की भागीदारी को समाप्त करने के लिए चुना गया. इराक पर अमेरिका के नेतृत्व में हुए हमले और उसके बाद हुई खूनी घटनाओं को बहुत से विशेषज्ञ इराक के पतन का मुख्य कारण मानते हैं. उसकी वजह से इराक में आंतरिक धार्मिक कलह शुरू हुआ जिसका नतीजा सीरिया के गृहयुद्ध के रूप में सामने आया है. इस तरह अमेरिकी नीतियों ने आईएस के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इससे यह सवाल उठता है कि क्या अमेरिकी सेना को वहां भेजने का कोई राजनीतिक अर्थ है.

इस पृष्ठभूमि में यह संभव नहीं लगता कि ब्रिटेन और फ्रांस जैसे नाटो के सदस्य आईएस से लड़ने के लिए अपने सैनिक भेजेंगे. पश्चिमी देशों को आईएस से पहुंचने वाले खतरे के बावजूद मध्यपूर्व में सैनिक हस्तक्षेप की कोई भूख नहीं दिखती. विवाद की सीमा पर स्थित नाटो का सदस्य तुर्की कुछ भी नहीं कर रहा. अंकारा को कुर्द अलगाववादियों द्वारा पेश खतरे के फिर से उभरने का डर है. वह आईएस के खिलाफ अमेरिका को अपने सैनिक अड्डों का इस्तेमाल भी नहीं करने दे रहा.

लेकिन इस विवाद के एक और पहलू पर भी नजर डालने की जरूरत है. थल सैनिकों के जरिए पश्चिमी देशों का सैन्य हस्तक्षेप वह चीज है जिसकी उम्मीद इस्लामिक स्टेट भी कर रहा है. तब वह काफिरों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई का वास्ता देकर अपने समर्थकों को लामबंद कर पाएगा. आईएस के नजरिए से यह संस्कृतियों की लड़ाई होगी. हमें इस झांसे में नहीं आना चाहिए.

वहां लड़ सकने वाले अकेले देश अरब देश हैं जिनके नागरिकों ने इस्लामिक स्टेट के उदय में वित्तीय मदद दी है. अब उन्हें भी उससे डर है. लेकिन कुछ हवाई हमलों को छोड़कर यह भी संभव नहीं दिखता. ऐसे में सारी दुनिया देखती रहेगी और कोबानी की जनता का भविष्य आईएस के हाथों होगा. यह एक त्रासदी है , लेकिन इस्लामिक स्टेट को हराने से पहले और बहुत सी त्रासदियों की आशंका है.

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