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ब्लॉग

विपक्ष के नेता के मुद्दे पर टकराव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में मशहूर है कि वे न भूलते हैं, न माफ करते हैं. इसलिए आश्चर्य नहीं कि लोकसभा चुनाव में अपमानजनक पराजय का मुंह देखने के बाद अब कांग्रेस को अपमान के कई और घूंट पीने पड़ रहे हैं.

सत्तारूढ़ दल इस बात पर आमादा है कि कदम-कदम पर वह कांग्रेस को यह याद दिलाता चले कि उसके पास लोकसभा की कुल सदस्य संख्या का दस प्रतिशत भी नहीं है. दरअसल मामला विपक्ष के नेता के पद को लेकर अटका हुआ है. लोकसभा के पहले अध्यक्ष जी वी मावलंकर ने यह व्यवस्था दी थी कि विपक्ष के नेता की मान्यता प्राप्त करने के लिए सदन में उपस्थित सबसे बड़े दल के सदस्यों की संख्या सदन की कुल सदस्य संख्या का कम-से-कम दस प्रतिशत होना अनिवार्य है क्योंकि सदन की बैठक का कोरम पूरा होने के लिए भी यह संख्या जरूरी है.

पहली, दूसरी और तीसरी लोकसभा में कांग्रेस का पूरी तरह से वर्चस्व था और कोई भी मान्यताप्राप्त विपक्ष नहीं था. 1969 में कांग्रेस का विभाजन होने के बाद कांग्रेस (संगठन) के रामसुभग सिंह एक वर्ष तक विपक्ष के नेता रहे. इसके बाद जनता पार्टी की मोरारजी देसाई सरकार और उसके गिरने के बाद चरण सिंह सरकार के कार्यकाल में यशवंतराव चव्हाण, सी एम स्टीफेन और जगजीवन राम विपक्ष के नेता बने. 1980 में इंदिरा गांधी की वापसी के बाद लोकसभा में कोई भी विपक्ष का नेता नहीं था. दिसंबर 1989 में लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की पराजय के बाद राजीव गांधी विपक्ष के नेता बने और एक वर्ष तक इस पद पर रहे. इसके बाद तो पी वी नरसिंह राव, शरद पवार, अटलबिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, सोनिया गांधी और सुषमा स्वराज भी विपक्ष के नेता रह चुके हैं.

लेकिन इस बार की स्थिति पहले से काफी भिन्न है. पहली बार कोई विपक्षी दल पर्याप्त सदस्य संख्या न होने के बावजूद अपने प्रतिनिधि के लिए विपक्ष के नेता के पद की मांग कर रहा है. कांग्रेस इस मांग को जोर-शोर से उठा रही है. उधर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी इस बात पर अड़ी है कि इस मामले में परंपरा और नियमों का पालन होना चाहिए. सरकार ने इसे लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के ऊपर छोड़ दिया है. महाजन भी भाजपा की ही हैं लेकिन लोकसभा अध्यक्ष बन जाने के बाद उनसे उम्मीद की जाती है कि वे निष्पक्ष ढंग से काम करेंगी. उन्होंने एटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी से इस विषय में राय देने को कहा. रोहतगी की राय है कि कांग्रेस के दावे में कोई दम नहीं है क्योंकि उसके पास पर्याप्त सदस्य संख्या नहीं है. सुमित्रा महाजन ने कहा है कि वे दो-तीन दिन में अपना फैसला सुना देंगी, लेकिन साथ ही यह भी जोड़ा है कि इस मामले में लोकसभा अध्यक्ष के पास विवेकाधीन निर्णय करने का अधिकार नहीं है और उसे परंपरा और नियमों का पालन करना होगा. उनकी इस टिप्पणी से स्पष्ट हो गया है कि उनका फैसला क्या होने वाला है.

जब कांग्रेस के पास लोकसभा की कुल सदस्य संख्या का दस प्रतिशत नहीं है, तो फिर वह विपक्ष के नेता पद के लिए अपनी दावेदारी क्यों प्रस्तुत कर रही है? क्या केवल इसके पीछे यही इच्छा है कि उसके एक नेता को केबिनेट मंत्री का दर्जा और सुख-सुविधाएं मिल जाएं? यह इच्छा होगी, इससे इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन इसके साथ ही यह भी सही है कि उसकी मांग नितांत औचित्यरहित भी नहीं है. पिछले कुछ वर्षों में बने क़ानूनों के तहत केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त, मुख्य सूचना आयुक्त, लोकपाल और केन्द्रीय जांच ब्यूरो के निदेशक आदि के चयन के लिए बनी समिति में विपक्ष के नेता का होना जरूरी है.

यह व्यवस्था इसलिए की गई है ताकि लोकतंत्र में सत्तापक्ष और विपक्ष की सहमति से ही इस प्रकार के संवैधानिक पदों पर नियुक्तियां की जाएं ताकि नियुक्त होने वालों की निष्पक्षता पर उंगली न उठाई जा सके. यह सही है कि कुछ क़ानूनों में यह व्यवस्था भी है कि यदि किसी को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता नहीं मिली है, तो सबसे बड़ी पार्टी का नेता चयन समिति में उसकी भूमिका निभा सकता है. लेकिन इसके साथ ही यह भी सही है कि यदि सत्ता पक्ष और सबसे बड़े विपक्षी दल के बीच इस छोटे से मुद्दे पर बदमजगी पैदा होती है, तो आने वाले पांच सालों के दौरान संसद को सुचारू रूप से चलाना अधिक मुश्किल हो जाएगा क्योंकि राज्यसभा में भाजपा और उसके सहयोगी अल्पमत में हैं.

जहां तक कांग्रेस का सवाल है, लोकसभा के उपाध्यक्ष आदि की नियुक्ति के मामले में उसका रिकॉर्ड भी बेदाग नहीं रहा है लेकिन पिछले कुछ दशकों के दौरान उसने विपक्ष को नजरंदाज करने का अपना पुराना रवैया बदला था. यदि भाजपा विपक्ष के नेता के मामले में उदारता दिखाए, तो राजनीतिक माहौल बेहतर हो सकता है. लेकिन संकेत तो यह है कि वह लोकसभा उपाध्यक्ष का पद भी कांग्रेस को न देकर एआईएडीएमके के तंबिदोराई को देना चाहती है लेकिन अभी उसे इसके लिए एआईएडीएमके सुप्रीमो जयललिता की सहमति नहीं मिली है.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

संपादन: महेश झा

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