विनाश को न्योता देता विकास | विज्ञान | DW | 27.06.2013
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विज्ञान

विनाश को न्योता देता विकास

उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में कुदरत ने जिस तरह का कहर बरपाया है उसे देखते हुए अब इस राज्य के कुमाऊं क्षेत्र पर भी सवाल उठने लगे हैं.

कुमाऊंनी शहर नैनीताल में पहाड़ियों को काट कर अंधाधुंध बहुमंजिली इमारतें खड़ी की जा रही हैं और शहर के बीचोंबीच बसी नैनी झील पर खतरा मंडरा रहा है. लेकिन जिस सरकारी तंत्र पर इस शहर और झील को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी है, वही लंबी चादर ताने सो रहा है.

प्रदूषित होती झील

नवंबर 1841 में एक अंग्रेज पर्यटक बैरन ने नैनी झील की खोज की. लेकिन अब झील के जल स्तर में साल दर साल गिरावट आ रही है. इसकी वजहों का पता लगाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं. ब्रिटिश सरकार ने पहाड़ियों और झील की सुरक्षा के लिए नैनीताल में नालों का जाल बिछाया था. इन नालों की लंबाई लगभग 53 किलोमीटर थी. सुरक्षा के उपाय सुझाने और उन पर अमल करने के लिए 6 सितंबर 1927 को गठित हिल साइड सेफ्टी व झील विशेषज्ञ समिति की एक दशक से कोई बैठक नहीं हुई है. यह समिति अपने बनाए नियमों को ही तोड़ती रही है.

शेर का डांडा पहाड़ी में वर्ष 1880 में जबरदस्त भूस्खलन में कोई 150 लोग मारे गए थे. उसके बाद राजभवन को वहां से हटाना पड़ा था. इस पहाड़ी पर नए निर्माण पर पाबंदी होने के बावजूद समिति ने वहीं रोपवे बनाने की अनुमति दे दी. राजनीतिक दबावों की वजह से पाबंदी वाले ऐसे कई इलाकों को सुरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया गया ताकि वहां इमारतें खड़ी हो सकें.

तेजी से बढ़ता कंक्रीट जंगल

पिछले दो-तीन दशकों में इलाके में पर्यटकों की तादाद के साथ साथ होटलों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है. वर्ष 1927 में शहर में 396 पक्के मकान थे. लेकिन सदी के आखिर तक यहां 8,000 से ज्यादा पक्के मकान हैं. तमाम नियमों की अनदेखी कर विभिन्न पहाड़ियों पर धड़ल्ले से निर्माण हो रहा है. नियमों के मुताबिक, नैनीताल में कहीं भी दो मंजिलों से ज्यादा और 25 फीट से ऊंची इमारत नहीं बनाई जा सकती. लेकिन यह नियम फाइलों में पड़े धूल फांक रहे हैं.

निर्माण कार्यों से पैदा होने वाला हजारों टन मलबा हर साल झील में समा जाता है. वर्ष 1961 में नैनीताल में महज 20 होटल थे लेकिन अब इनकी तादाद एक हजार पार कर गई है. लोगों ने पर्यटकों से होने वाली कमाई को ध्यान में रखते हुए अपने घरों में ही होटल और गेस्ट हाउस बना लिए हैं. ऐसे होटलों का कहीं कोई हिसाब नहीं है.

बदल गया है शहर

मुंबई से कोई 25 साल नैनीताल घूमने आए सुधीर नायक कहते हैं, "नैनीताल का स्वरूप ही बदल गया है. अस्सी के दशक में यहां महज कुछ होटल थे. लेकिन अब इन होटलों की भीड़ की वजह से माल रोड पर पैदल चलना मुश्किल हो गया है." रोजाना पहाड़ का सीना चीर कर खड़ी होने वाली इमारतों ने झील के चौरों तरफ फैले पहाड़ को लगभग ढक दिया है.

स्थानीय लोगों का कहना है कि नैनीताल की झील के जल स्तर में साल दर साल गिरावट आ रही है. लेकिन इसके वजहों की पड़ताल के लिए कोई कदम नहीं उठाए जा रहे हैं अगर समय रहते इस झील को बचाने की दिशा में ठोस पहल नहीं हुई तो वह दिन दूर नहीं जब पर्यटक इस ओर से मुंह मोड़ लेंगे. वहीं भूवैज्ञानिकों का कहना है कि भूकंप का एक हल्का झटका भी इस खूबसूरत शहर, जो उत्तर प्रदेश के बंटवारे तक उसकी ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करता था, के वजूद को मिटा सकता है.

रिपोर्टः प्रभाकर, नैनीताल

संपादनः मानसी गोपालकृष्णन

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