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मनोरंजन

विदेशों में नौकरानी बनी दुल्हनें

शादी के बाद विदेश में रहना भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश की कई महिलाओं के लिए परिकथा जैसी बात है. लेकिन कई मामलों में हाथ की मेंहदी सूखते ही दुल्हन नौकरानी जैसी हो जाती है.

ब्रिटेन, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया, ये वो देश हैं जहां दक्षिण एशिया की कई महिलाएं अपनी जिंदगी बिताना चाहती हैं. उनका मानना है कि वहां उनकी जिंदगी आराम से भरी होगी, वो गरीबी और तंग माहौल से मुक्त हो जाएंगी. विदेश में रहने वाले पुरुष से शादी करना ऐसी महिलाओं का ख्बाव होता है. उन्हें लगता है कि इससे समाज में उनकी इज्जत भी बढ़ेगी, लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता. कुछ मामलों में सच्चाई इसकी बिल्कुल उलट और बड़ी भयानक है. ऐसा ही कुछ पाकिस्तान की 24 साल की सबाह के साथ भी हुआ, वह भी ब्रिटेन में.

एक दुखद कहानी

24 साल की सबाह का एक 14 महीने का बेटा है. पति ने उसे छोड़ दिया है, फिलहाल वह ब्रिटेन में सरकारी मदद पर गुजारा कर रही है. सबाह ने डॉयचे वेले को बताया "मेरे ससुराल के लोगों ने मुझसे लंदन के एक मैरिज ब्यूरो के जरिए संपर्क किया. वह लोग बरसों से ब्रिटेन में रहते थे. वे काफी अच्छे लग रहे थे.

पाकिस्तान में जल्द ही सगाई हुई. छह महीने बाद, मेरे ससुराल वाले एक बार फिर पाकिस्तान आए और शादी हुई. एक महीने के भीतर मैं गर्भवती हो गई." शादी के सात महीने बाद सबाह को ब्रिटेन का वीजा मिला. लंदन पहुंचने के बाद सबाह के ससुराल वालों ने उसे तंग करना शुरू किया. घर के सारे काम अकेले उसे करने पड़ते थे. प्रसव का वक्त बहुत पास था. ससुराल वालों ने फिर ज्यादा दहेज मांगना शुरू किया. वह बताती हैं कि उन्हें घर में एक कैदी की तरह रखा जाता था और उनके सभी फोन कॉल पर नजर रखी जाती थी. सबाह कहती हैं, "मेरे पति तो एक बार भी मेरे साथ अस्पताल नहीं गए. जब हमारा बेटा पैदा हुआ, तब भी वह मेरे साथ नहीं थे."

पत्नी को छोड़ देना

कहानी यहीं नहीं थमी. शादी के बाद उन्हें पाकिस्तान ले जाया गया, यह कहा गया कि बच्चे को वहां रिश्तेदारों ओर दोस्तों को दिखाना हैं. पाकिस्तान पहुंचकर पति ने कहा कि वह बेटे को एक दोस्त को दिखाना चाहते हैं. उसी दिन बेटे का अपहरण हुआ और पति बच्चे को लेकर लंदन वापस आ गया.

सबाह को बहुत देर से इसका पता चला. जानकारी जुटाने की कोशिश के दौरान पता चला कि उनके जैसी सैकड़ों महिलाएं हैं जो हर साल ऐसा ही धोखा खाती हैं. सबाह सक्षम थी, उन्हें करीबियों को का सहयोग मिला. यही वजह है कि उन्होंने लंदन आकर मुकदमा लड़ा.

तलाक के बाद वह लंदन में अब अपने बेटे के साथ एक कमरे की फ्लैट में में रह रही हैं. केस अभी भी चल रहा है. सबाह चाहती हैं कि बच्चे की देखभाल के लिए उन्हें अपने पूर्व पति या उनके परिवार वालों से सहायता मिले. हर साल दक्षिण एशिया की कितनी महिलाएं इस तरह के धोखे का शिकार बनती हैं, यह बताना मुश्किल हैं. रानी बिलखू  ब्रिटेन के महिला संगठन जीना इंटरनेशनल में सबाह जैसी महिलाओं की मदद करतीं हैं. वह बताती हैं, "हम ज्यादा जानकारी और पूरे मामले की पृष्ठभूमि समझने के लिए एक दल के साथ भारत गए थे. ब्रिटेन या कनाडा में बसे भारतीय मूल के कई पुरुष अपनी पत्नियों के साथ धोखा कर रहे हैं, खासकर भारत के पंजाब प्रांत में ऐसे कई मामले हैं और ये बढ़ते जा रहे हैं."

Muslimische Braut

बिलखू यह भी कहती हैं, "ज्यादातर महिलाएं डिपेंडेंट वीजा पर विदेश जातीं हैं यानी वह पूरी तरह अपने पति पर निर्भर होती हैं. जब पति फैसला करता है कि उसको अब इस शादी में नहीं रहना है, तब उन महिलाओं का वीजा वापस ले लिया जाता है जो बहुत आसान है." इसके बाद माहिलाओं को अपने देश लौटना पड़ता है. वहां एक नया संघर्ष इंतजार कर रहा होता है. ऐसी महिलाओं की समाज में इज्जत नहीं रहती और उन्हें अलग थलग कर दिया जाता है. अक्सर पीड़ित महिला पर ही दोष मढ़ा जाता है. बिलखू कहती हैं, "उन पर कलंक लग जाता है और पूरा मामला इज्जत और शर्म की बात बन जाती है. महिलाएं भी इस पर ज्यादा बात करने से डरती हैं. अक्सर महिलाएं ये भी उम्मीद करती रहती हैं कि आखिरकार उनका पति उनके पास लौट आएगा."

दूतावास से मदद

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में काम कर रहा ब्रिटिश दूतावास इन मामलों में मदद कर रहा है. दूतावास उन महिलाओं की मदद मदद करता है जो हक की लड़ाई लड़ने के लिए ब्रिटेन लौटना चाहती हैं. दूतावास के सलाहकार महिलाओं को बताते हैं कि वे ब्रिटेन में कहां शरण ले सकती हैं, किन संस्थानों से मदद मिल सकती है. हालांकि अब भी कई महिलाओं को ऐसी कोशिशों की जानकारी नहीं है. एन-मारी हचिंसन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जानी मानी वकील हैं. उन्होंने इस तरह के मामलों पर बहुत काम किया है. वह कहती हैं कि "ब्रिटेन में, हाई कोर्ट ऑफ जस्टिस पूरे मामले को संजीदगी से ले रहा है और वह महिलाओं की सहायता कर सकता है. समस्या यह है कि कई महिलाएं अपने देशों में होती हैं और व्यावहारिक तौर पर उनकी इच्छा के बावजूद उन तक कानूनी मदद और सहायता पहुंचाना संभव नहीं है. वह अक्सर बहुत ग्रामीण इलाकों में रहती हैं और उनके पास पैसे नहीं होते." हचिंसन के मुताबिक, "महिलाएं पूरी तरह अपने पति और अपने ससुराल वालों पर निर्भर होती हैं. वह अत्याचार भी सहने को तैयार हो जाती हैं क्योंकि उन्हें डर लगता है कि उन्हें अपने देश वापस भेजा जाएगा."

समस्या का जड़

हकीकत यह भी है कि विदेशों में रह रहे पाकिस्तानी, भारतीय या बांग्लादेशी मूल के पुरुषों पर कई बार शादी के लिए परिवार की तरफ से दबाव भी डाला जाता है. मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक, मूल देश लौटने पर अक्सर परिवार वाले उनकी शादी करवा देते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि तथाकथित 'हॉलिडे ग्रूम' पश्चिमी देशों में पले बड़े हैं. वह परिवार वालों के इस फैसले से बहुत खुश नहीं होते कि उन्हें एक ऐसी महिला से शादी करनी है जो एक रूढ़ीवादी समाज में पली बढ़ी है और दुनिया को नहीं जानती. फिर भी युवक मां-बाप के फैसले का विरोध नहीं करते. लेकिन साथ ही वे फैसला कर लेते हैं कि वे अपनी पत्नी को विदेश कभी नहीं ले जाएंगे.

रानी बिलखू के मुताबिक, "इस तरह के व्यवहार की बहुत सारी वजहें हैं. परिवार वाले जबरदस्ती करते हैं या कभी लड़के शारीरिक जरूरतों को पूरा करने या आर्थिक जरूरतों की वजह से ऐसा करते हैं."

पैसा कमाने का माध्यम

ब्रिटेन की सरकार के सामने ऐसे ढेरों मामले हैं जिनसे साफ पता चलता है कि दक्षिणी एशियाई मूल के कई ब्रिटिश नागरिक देश की सामाज कल्याण व्यवस्था का गलत फायदा भी उठा रहे हैं. अपनी पत्नी को छोड़ने या वापस भेजने के बावजूद वह परिवार को मिलने वाली सरकारी सहायता पा रहे हैं. ब्रिटेन की राजनीति में सक्रिय श्रीला फ्लेथर बार बार इस मुद्दे को छेड़ती हैं. वह कहती हैं, "कुछ पुरुष तो कई महिलाओं के साथ रहते हैं. उनकी चालाकी यह है कि उन्होंने अपनी पत्नियों को अलग अलग घरों में रजिस्टर करवाया है. सब के लिए वह सरकारी सहायता मांग रहे हैं." इस बीच भारत में महिलाओं को इस तरह की समस्याओं से बचाने के लिए दो कानून बनाए गए हैं. अनिवार्य विवाह पंजीकरण कानून, एनआरआई लोगों के लिए है. इसके तहत विदेश में रह रहे पुरुष अगर भारत में किसी लड़की से शादी करते हैं, तो उन्हें अपने बारे में विस्तृत सूचना अधिकारियों देनी होगी. पंजाब में भी हाल ही में कबूतरबाजी निरोधक कानून के आधार पर सभी ट्रैवल एजेंटों को खुद का रजिस्ट्रेशन कराने को कहा गया है.

रिपोर्ट: रोमा राजपाल/पीई

संपादन: ओंकार सिंह जनौटी

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