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'विदेशी भाषा में पढ़ाई से संस्कृति से दूरी'

भारत को विश्व-शक्ति बनाने में युवा अहम भूमिका निभा सकते हैं. लेकिन अगर वे विकास की प्रक्रिया में सहयोग देने लायक ही ना बनाए जाएं, तो देश पर बोझ साबित होंगे. सवाल है कि उनका विदेशी भाषाएं सीखना इसमें कितना मददगार होगा.

भारत में इस पर बहस जारी है कि स्कूलों में बच्चों को कौन सी भाषाएं सिखाई जानी चाहिए. हाल ही में हिंदू संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) ने बीजेपी के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार और पार्टी के शासन वाले राज्यों से अनुरोध किया कि वे छात्रों को उनकी मातृभाषा या फिर संवैधानिक मान्यता प्रदत्त राज्य की भाषा में ही शिक्षा प्रदान करें. आरएसएस का मानना है कि जिन बच्चों को विदेशी भाषा यानि अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा मिलती है, वे अपनी संस्कृति और सभ्यता से "दूर" हो जाते हैं.

आरएसएस की नीति-निर्धारक ईकाई, अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने इस बारे में एक प्रस्ताव पास किया है, जिसमें लिखा है, "जब किसी छात्र को विदेशी भाषा में शिक्षा मिलती है तो वह अपने माहौल, परंपराओं, संस्कृति और जीवन मूल्यों से दूर हो जाता है. इस के साथ साथ वह अपनी पहचान भी खो देता है, और अपने प्राचीन ज्ञान, विज्ञान और साहित्य से भी अनभिज्ञ रह जाता है."

सभा ने दलील दी कि पहले भी राधाकृष्णन आयोग और कोठारी आयोग जैसे कई कमीशन ऐसे सुझाव दे चुके हैं. प्रस्ताव में यह भी साफ लिखा है कि सरकार "भारतीय भाषाओं को शिक्षा, प्रशासन और न्याय व्यवस्था में भी इस्तेमाल करने के लिए पहलकदमी करे." हालांकि, आरएसएस ने साफ किया कि वह विदेशी भाषाओं समेत कई भाषाएं सिखाए जाने के पक्ष में है. जबसे केन्द्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनी है, आरएसएस कई प्रकार से देश की मौजूदा शिक्षा नीति पर प्रभाव डालने के प्रयास कर रही है. इसकी आलोचना करते हुए विपक्षी दलों ने इन कोशिशों को शिक्षा का भगवाकरण करने की मंशा से प्रभावित बताया है.

हाल ही में आईआईटी बॉम्बे के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने वाले प्रसिद्ध न्यूक्लियर साइंटिस्ट अनिल काकोडकर के मामले को लेकर कांग्रेस पार्टी ने केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी की क्षमता पर ही सवालिया निशान लगा दिए हैं. ईरानी पर आरोप है कि उन्होंने उच्च शिक्षा संस्थानों को मिले स्वायत्तता के अधिकार के साथ दखलअंदाजी की है. कांग्रेस के प्रवक्ता राजीव गौड़ा ने कहा, "चाहे यूजीसी हो, आईआईटी, रिसर्चर्स का मुद्दा या फिर केन्द्रीय विद्यालयों में संस्कृत भाषा का मुद्दा, स्मृति ईरानी ने हर बार स्वायत्तता की उस मूल भावना को ही मिटाने की कोशिश की है, जिनसे इन सभी उत्कृष्ट संस्थाओं का उदय हुआ है."

पिछले साल नवंबर में देश के केन्द्रीय विद्यालयों जर्मन भाषा सीखने के विकल्प को यह कहकर हटा लिया गया था कि उसे तीसरी भारतीय भाषा की जगह सिखाया जा रहा था जो गलत था. पहली दोनों भाषाएं हिंदी और अंग्रेजी हैं. अब बात हो रही है कि इस प्रतिस्पर्धी विश्व में शिक्षा व्यवस्था में "विदेशी भाषा को एक अतिरिक्त औजार के रूप में कैसे शामिल किया जाए.” जल्द ही होने वाली राज्य के शिक्षा मंत्रियों और सचिवों की बैठक में तीन भाषा वाले फॉर्मूले और देश की राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर बहस होगी.

आरआर/एमजे (पीटीआई)

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