1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

विदेशी छात्रों के लिए छीनाझपटी

जर्मनी के विश्वविद्यालय और ज्यादा विदेशी छात्रों को आकर्षित करना चाहते हैं. इसके लिए उन्हें विदेशी छात्रों की देखभाल में सुधार लाने की जरूरत है. हर देश आज बेहतरीन प्रतिभाओं को पाने की कोशिश कर रहा है.

जर्मनी में पढ़ने वाले छात्र बताते हैं कि यूनिवर्सिटी में गुजारे दिन मजे के थे, लेकिन वे पढ़ाई के आखिरी दिनों में बेहतर देखभाल, बर्ताव और मदद की उम्मीद जताते हैं. जर्मनी में पढ़ाई करने के बाद अब बॉन में काम कर रही है एक यूक्रेनी महिला कहती हैं, "अच्छा होता कि विदेशी छात्रों को भी यह भावना दी जाती कि उनका विशेषज्ञ के रूप में स्वागत है." जर्मनी को विशेषज्ञ कामगारों की जरूरत भी है. अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, लेकिन खास काम करने वाले कुशल कामगारों की कमी है, चाहे वे इंजीनियर हों या आईटी एक्सपर्ट. बीमारों और वृद्धों की देखभाल करने वाले प्रशिक्षित नर्सों की भी भी कमी है और कार्यस्थान खाली पड़े हैं.

स्थिति को बदलने के लिए जर्मन एकैडेमिक एक्सचेंज प्रोग्राम (डीएएडी) और ज्यादा छात्रों को जर्मनी लाना चाहता है. 2020 तक 350,000 विदेशी छात्रों को जर्मन विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिए आकर्षित करने का लक्ष्य है. इस समय करीब ढ़ाई लाख विदेशी छात्र जर्मनी में पढ़ते हैं. विदेश और शिक्षा मंत्रालयों के वित्तीय समर्थन से चलने वाला डीएएडी जर्मनों को विदेश में पढ़ने के लिए स्कॉलरशिप देता है और विदेशी छात्रों को जर्मनी में उच्च शिक्षा पाने के लिए. 2012 में डीएएडी ने 45,000 विदेशी छात्रों को और 30,000 जर्मन छात्रों को सहायता दी.

स्वागत की संस्कृति

नए छात्रों को जर्मनी आने के लिए बढ़ावा देने के लिए डीएएडी को ज्यादा संसाधन मिलेंगे या नहीं, यह बहुत कुछ सरकार की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करेगा. एक्सचेंज प्रोग्राम की प्रमुख मार्गरेट विंटरमांटेल कहती हैं कि वे इसके लिए सभी पक्षों से बात करेंगी. डीएएडी और ज्यादा जर्मन छात्रों को विदेशों में भी भेजना चाहती हैं. उनका वश चले तो जर्मनी के आधे छात्रों को लेकिन यह महंगा है. यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले जर्मन छात्रों की तादाद बढ़ती जा रही है.

विदेशी छात्रों को आकर्षित करने के लिए जर्मनी में बाधाओं को दूर करना जरूरी है. मसलन जर्मन जानने की बाधा को दूर करने के लिए अंग्रेजी में ज्यादा कोर्स ऑफर करना होगा. दाखिले और विदेशी डिग्रियों को मान्यता देने में भी बेहतरी की जरूरत है.पूरे यूरोप में बैचलर और मास्टर्स कोर्स लागू किए जाने के बाद से यूरोपीय डिग्रियों की मान्यता आसान हो गई है, लेकिन गैर यूरोपीय डिग्रियों के मामले में हालत जटिल है. पाकिस्तान या अफगानिस्तान के मास्टर्स डिग्री को जर्मनी में मान्यता नहीं है और पीएचडी करने से पहले जर्मनी में इसकी पढ़ाई दोहरानी पड़ सकती है.

डीएएडी प्रमुख विंटरमांटेल इस बात की भी शिकायत करती हैं कि अक्सर विदेशी छात्रों का पर्याप्त स्वागत नहीं होता. उन्होंने ध्यान दिया है कि विदेशी छात्रों को ज्यादा समर्थन की जरूरत होती है. वे बेहतर देखभाल और निर्देश चाहते हैं. इसलिए वे जर्मन विश्वविद्यालयों में बेहतर "स्वागत संस्कृति" की मांग करती हैं. लेकिन विश्वविद्यालयों में छात्रों की मदद की संस्कृति आ रही है. बर्लिन के फ्री यूनिवर्सिटी का कहना है कि पढ़ाई और परीक्षा के अलावा नौकरी के लिए आवेदन देने या लाइसेंसिंग के क्षेत्र में विदेशी छात्रों के लिए विशेष सेमिनार आयोजित किए जाते हैं. छात्र संघ भी इसमें मदद देते हैं.

सहयोग का विस्तार

विदेशी छात्रों को आकर्षित करने के लिए अभियान चलाने के साथ ही डीएएडी विदेशी विश्वविद्यालयों के साथ सहयोग भी बढ़ाना चाहता है. इस समय कजाकिस्तान और मिस्र में इस तरह की परियोजना चल रही है. डीएएडी विदेशी कॉलेजों में जर्मन भाषा की शिक्षा को भी प्रोत्साहन देगा. अंतरराष्ट्रीय प्रतिभाओं को प्रशिक्षित करने में पश्चिमी देशों की प्रतिस्पर्धा कड़ी होती जा रही है. ब्राजील या कोरिया के अलावा भारत जैसे देश भी अपने विश्वविद्यालयों में भारी निवेश कर रहे हैं. विंटरमांटेल कहती हैं, "हमें ध्यान देना होगा कि हमारे दरवाजे खुले रहें," ताकि जर्मनी विश्वविद्यालयों की प्रतिस्पर्धी क्षमता बनी रहे.

जर्मनी ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय महत्व का मुद्दा बना दिया है. सिर्फ देश के विश्वविद्यालय या छात्रों को भेजने बुलाने वाली संस्था ही नहीं बल्कि जर्मन सरकार के लिए भी विदेशी छात्रों का मुद्दा बड़े महत्व का मुद्दा बन गया है. इसी महीने भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के जर्मनी दौरे पर दोनों देशों ने शिक्षा और शोध के क्षेत्र में पारस्परिक सहयोग बढ़ाने पर जोर तो दिया ही है, भारत के 1000 स्कूलों में जर्मन भाषा की पढ़ाई को प्रोत्साहन देने में सहयोग करना भी तय किया है. जर्मन चांसलर ने साफ तौर पर कहा कि जर्मनी भारतीय छात्रों का स्वागत करता है.

अभी भी जर्मनी ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस के साथ विदेशी छात्रों के लोकप्रिय लक्ष्यों में चौथे या पांचवे नंबर पर है. अमेरिका और ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी सबसे लोकप्रिय हैं. जर्मनी विदेशी छात्रों का त्याग नहीं करना चाहता. वे सिर्फ भविष्य के कुशल कामगार ही नहीं हैं, वे विश्वविद्यालयों में नए विचार और शोध के नए दृष्टिकोण लेकर आते हैं और उन्हें आधुनिक बनाते हैं. जर्मनी इसे गंवाना नहीं चाहता.

रिपोर्टः नाओमी कोनराड/ एमजे

संपादनः निखिल रंजन