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खेल

विदेशी कोच के पीछे हॉकी टीमें

साल 2006 मे दोहा एशियन गेम्स मे बुरे प्रदर्शन के बाद भारतीय हॉकी टीम पहली बार ओलंपिक के लिए क्वालिफाई नहीं कर सकी. ध्यानचंद और रूप सिंह के देश को इससे धक्का लगना लाजमी है.

दोहा के हश्र के बाद खिलाड़ियों और अधिकारियों ने भारतीय हॉकी को सुधारने के लिए न जाने कितने वादे किए थे. उन पर ज्यादा कुछ अमल तो नहीं हुआ, हां किसी तरह भारत ने लंदन ओलंपिक में खेलने के लिए क्वालिफाई जरूर कर लिया. लेकिन जो लंदन में हुआ वो बहुत शर्मनाक था. भारतीय खिलाड़ियों को आखिरी स्थान के साथ मुंह लटका कर मैदान से बाहर निकलना पड़ा. और उसके बाद तो हालत पहले से भी ज्यादा खराब हो गई.

आज किसी को विदेशी चीफ कोच चाहिए तो किसी को गोलकीपरों के लिए कोच चाहिए. कहीं डिफेंडर्स यानी रक्षा पंक्ति के लिये विदेशी कोच की मांग उठ रही है तो कहीं कुछ और.

सबसे बड़ा सवाल जो खड़ा हुआ है वो ये की क्या सिर्फ विदेशी कोच ही भारतीय हॉकी को पटरी पर ला सकते हैं. अगर इस बात में दम है तो फिर माइकल नॉब्स को उनका करार खत्म होने से पहले क्यों हटाया गया. जबकि नॉब्स की कोचिंग में भारत लंदन ओलंपिक के लिए क्वालिफाई कर पाया था.

भारतीय टीम का सितारा खिलाड़ी रह चुके धनराज पिल्लै ने खुद को कोच के तौर पर आगे बढ़ाया है. उन्होंने दावा किया है कि अगर उन्हें राष्ट्रीय हॉकी टीम का कोच बनाया जाता है, तो वह साल भर के अंदर इसका नतीजा दे सकते हैं. पिल्लै का कहना है कि भारत ने पिछले आठ साल में विदेशी कोचों को आजमा कर देख लिया है, जिसका कोई फायदा नहीं हुआ. "यहां प्रतिभा की कमी नहीं है. मुझे कमान दीजिए और स्वतंत्र रूप से काम करने का वादा कीजिए, मैं साल भर में इसका नतीजा दे सकता हूं."

कई ओलंपिक में भारतीय हॉकी का प्रतिनिधित्व कर चुके पिल्लै का कहना है कि भारतीय हॉकी के खिलाड़ी विदेशी कोचों की बातों को सही ढंग से समझा नहीं पाते. क्योंकि उन्हें उस तरह की इंग्लिश नहीं आती. "हमने दुनिया को हॉकी खेलना सिखाया और अब हमें विदेशी कोचों की जरूरत पड़ रही है."

 ऐसा नहीं की विदेशी कोच के हाथ में कोई जादू की छड़ी होगी जिसे घुमाते ही भारतीय हॉकी की किस्मत पलट जायेगी. किस्मत बदलने के लिए जरूरी चीज है अच्छे खिलाड़ी, जिन्हें कोच विजेताओं मे बदल सकें. लंदन में खिलाड़ियों में कोई तालमेल नहीं था. साफ दिख रहा था की वो एक टीम की तरह खेलना ही नहीं चाहते थे. ऐसे मे नॉब्स क्या, कोई भी कोच होता, टीम नहीं जीत सकती थी.

पिछले दो तीन साल में हॉकी महासंघ, खेल मंत्रालय और भारतीय ओलंपिक महासंघ ने जमकर राजनीति की है. इस सब में अगर कुछ नहीं हो पाया है तो वह है हॉकी को सुधारने की कोशिश.

सोचने वाली बात यह है कि क्या भारत में हॉकी खेलने के लिये सही प्रतिभावान खिलाड़ी सामने आ रहे हैं, जवाब है नहीं. जिस खेल के संघ के अस्तित्व का ही नहीं पता उस खेल में कोई आएगा भी तो कैसे.

स्कूल और राज्य स्तर पर जहां से खिलाड़ी निकलते हैं, वहां किसी का ध्यान ही नहीं है. जो भी खिलाड़ी देश की टीम के लिये खेल रहे हैं उनमें अधिकतर वो हैं जो किसी भी चयन प्रणाली से नहीं बल्कि तुक्के से हॉकी खेलने लगे. ऐसे में टीम कैसे अच्छा खेल सकती है.

पता नहीं बार बार विदेशी कोच की बात क्यों होती है. पिछले कुछ वर्षों में भारत में चार विदेशी कोच आए हैं. मोटी रकम लेने के बावजूद वो भारत को बड़ा खिताब नहीं दिलवा सके. अगर जीत मुमकिन ही नहीं तो फिर उन पर पैसा फेंकने से क्या फायदा.

वर्ल्ड कप जीतने वाली भारतीय टीम के पूर्व कप्तान अजीतपाल सिंह का मानना है की माइकल नॉब्स को बहुत पहले ही निकाल देना चाहिए था. जबकि पूर्व कप्तान जफर इकबाल को नॉब्स से थोड़ी सहानभूति है. उनका कहना है कि जब नॉब्स के पास अच्छे खिलाड़ी ही नहीं थे तो वो क्या कर सकते थे.

मजे की बात यह है कि सिर्फ भारत ही नहीं एशिया के अन्य कई देश भी इस विदेशी कोच की बीमारी की चपेट में हैं. कम से कम हॉकी खेलने वाले चार बड़े देश तो इस बीमारी की शिकार हैं ही.

90 के दशक में मलेशिया ने ऑस्ट्रेलिया के टेरी वॉल्श को बुलाया और उसके बाद वहां कई विदेशी कोच बदलते रहे. आज कल दक्षिणी अफ्रीका के पॉल रेविंगटन वहां कोचिंग कर रहे हैं. कोरिया ने पॉल लिसेक के साथ अपनी किस्मत आजमाई तो पाकिस्तान ने नीदरलैंड्स के हंस जोरीत्समा में भरोसा जताया. उसके बाद मिषेल फान दे हुएवेल को भी पाकिस्तान ने मौका दिया. भारत में 2004 के एथेंस ओलंपिक से पहले जर्मनी के गेरहार्ड राख को रखा. लेकिन इस सबका नतीजा क्या निकला. आने वाले वर्ल्ड कप के लिए एक भी एशियाई टीम क्वालिफाई नहीं कर सकी. सब तरह के विदेशी कोचों के साथ किस्मत  आजमाने के बाद यह हाल उस महाद्वीप का है जिसने कभी दुनिया की हॉकी पर राज किया था. पिछले 20 साल में किसी भी एशियाई टीम ने ओलंपिक, वर्ल्ड कप या चैंपियंस ट्रॉफी जैसे खिताब पर कब्जा नहीं किया है. हां, विदेशी कोचों पर लाखों डॉलर जरूर खर्च किए हैं. अगर यही पैसा गांव देहात में प्रतिभा ढूंढने और उसे भारतीय कोचों से ट्रेन करवाने मे खर्च किया जाता तो शायद बेहतर नतीजा निकलता.

अब जबकि नॉब्स को निकालकर महाराज किशन कौशिक को लाया गया है और रोलेंट ओल्टमान्स तो हैं ही. देखना है भारतीय हॉकी किस ओर जाती है.

रिपोर्टः नॉरिस प्रीतम, नई दिल्ली

संपादनः अनवर जमाल अशरफ

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