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दुनिया

विदेशियों के लिए जापान का स्याह चेहरा

आत्महत्या, भूख हड़ताल और पिछले कुछ महीनों में तीन कैदियों की मौत. पर्यटकों को लुभाने वाले जापान का यह चेहरा विदेशियों के हिस्से में आने वाले अंधेरों की तरफ इशारा करता है.

अदालत में पेशी से पहले अक्सर विदेशी कैदियों को महीनों उशिकू की जेल में बहुत ही बुरे हालात में रखा जाता है. यह जेल खासकर उन कैदियों के लिए है जो वीजा खत्म होने के बाद भी गैर कानूनी तौर पर जापान में रह रहे हैं.

ऐसे ही एक कैदी चंबाला ने इस जेल में कुछ श्रीलंकाई, भारतीय और फिलीपीनी कैदियों के साथ सजा काटी. उन्होंने डॉयचे वेले को बताया दिन के कुछ घंटे ही उन्हें कोठरी से बाहर मैदान में साथियों के साथ फुटबॉल खेलने के लिए समय दिया जाता था, "उशिकू में आपको अपने चारों तरफ सिर्फ ऊंची ऊंची दीवारें और ऊपर आसमान दिखाई देता है." यहां से चंबाला को तंजानिया निर्वासित कर दिया गया जहां वे अपनी अमेरिकी पत्नी अलीशा जेम्स से 2012 में मिले. वह कहते हैं, "ज्यादा से ज्यादा लोग टीवी देख लेते हैं, और सारा दिन बैठे रहते हैं. वे तनाव से थक चुके होते हैं. अपराधी न होते हुए भी उनके पास आजादी नहीं होती. वह ऐसी जगह नहीं है जहां बहुत दिनों तक रहा जा सके, लेकिन कोई नहीं जानता कि रिहाई कब मिलेगी."

ग्लोबल डिटेंशन प्रोजेक्ट की रिपोर्ट के अनुसार जापान ने 2011 में तीन बंदीगृहों इबाकारी, ओसाका और नागासाकी में 23,133 विदेशियों को कैद कर रखा था.

स्याह चेहरा

एक प्रवक्ता ने अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया मार्च में एक ईरानी कैदी की दम घुटने से मौत हो गई और कैमरून का एक व्यक्ति जेल में बेहोश हालत में पाया गया. पिछले साल अक्टूबर में म्यांमार का एक रोहिंग्या कैदी जान से हाथ धो बैठा. कथित रूप से उसे लंच ब्रेक के दौरान चिकित्सकीय मदद मुहैया नहीं कराई जा सकी.

2010 में नारिटा हवाई अड्डे से घाना के एक व्यक्ति को वीजा खत्म होने पर जबरन निर्वासित किया जा रहा था, उस दौरान दम घुटने से उसकी मौत हो गई. टोक्यो की जिला अदालत के फैसले के मुताबिक उसकी मौत अधिकारियों द्वारा गला घोंटे जाने और कानूनी बर्ताव से हुई.

एमनेस्टी इंटरनेशनल और अन्य मानव अधिकार संगठनों ने भी जापान पर कैदियों के साथ अमानवीय बर्ताव करने का आरोप लगाया है. प्रवासियों के मानव अधिकारों के मामलों पर काम करने वाले संयुक्त राष्ट्र के यॉर्ग बुस्टामेंटे ने 2010 में अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार मानकों का पालन करने की अपील जापान से की थी. संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार समिति द्वारा आलोचना झेलने वाले करीब तीस जापानी अधिकारियों ने 2012 में एक ऐसे तंत्र की स्थापना का वादा किया था जो 1951 के प्रवासी नियंत्रण एवं शरणार्थियों की पहचान के कानून का पालन करता हो.

पिछले बीस सालों में जापान में प्रवासियों की संख्या दुगनी हुई है. जापान में इस समय कुल आबादी का करीब 1.7 फीसदी हिस्सा प्रवासियों का है. 1980 और 1990 के दशक में निर्वासन की घटनाएं बहुत कम थीं. उस समय टूरिस्ट वीजा पर आए कई लोग शादी करके वहीं बस गए.

विदेशी कामगारों की मांग

2003 में पुलिस और अप्रवासी मामलों के अधिकारियों ने मिलकर गिरफ्तारी की नई नीति तैयार की. वीजा खत्म होने के बाद टोक्यो में रह रहे सवा लाख लोगों में से कम से कम आधे गिरफ्तार करने की मुहिम छेड़ी गई. तत्कालीन न्याय मंत्री डाइयो नोजावा के अुसार, "वीजा के बगैर रहने वाले लोगों की संख्या बढ़ने से अपराध भी बढ़ रहा है." उनके मुताबिक जापान में जन सुरक्षा के लिए गैर कानूनी तौर पर रह रहे लोगों का मामला सुलझाना बेहद अहम है.

वहीं पूर्व ऑस्ट्रेलियाई राजनयिक और न्याय मंत्रालय में सुधार के लिए गठित कमेटी के सदस्य ग्रेगरी क्लार्क के अनुसार जापान में कामगारों की कमी थी. उस समय जापान ने सख्ती में कमी कर लोगों को आसानी से आने दिया, लेकिन इसके बाद उन्हें वहां बसने में मदद करने के बजाय उनके साथ बदसलूकी की.

जा रही हैं जानें

टोक्यो अप्रवासी ब्यूरो में 2002 से 2005 तक प्रमुख रहे हिडेनोरी साकानाका ने क्षेत्रीय मीडिया से कहा कि विभाग को चाहिए कि इस तरह के लंबे कारावास के बारे में जानकरी आम करे. साकानाका ने कहा, "अप्रवासी ब्यूरो को आत्महत्याओं और भूख हड़तालों पर रोक लगानी होगी."

पूर्व में न्यूजीलैंड में वकील रह चुके माइकल टोड अब अपनी जापानी पत्नी के साथ टोक्यो में रहते हैं. उन्होंने 2012 में ओसाका के यातना गृह में 42 दिन बिताए. बाद में मामला वीजा स्टेटस के बारे में गलतफहमी का निकला. वह कहते हैं, "मुझे नहीं पता था कि जापान में हालत इतनी खराब है. यह तो ऐसा है कि आप अपने हाथ खड़े कर दीजिए और इस देश में घुसते ही अपने सारे मानवाधिकार सौंप दीजिए." उनके मुताबिक जापान में जब तक आप निर्दोष साबित नहीं हो जाते तब तक मुजरिम हैं. पिछले अस्सी साल से ऐसा ही होता चला आ रहा है. टोड बताते हैं कि नाइजीरिया के एक ऐसे व्यक्ति को मुसलमानों के साथ बंद कर दिया गया जिसके पूरे परिवार को मुसलमानों ने मार दिया था. निचली मंजिल पर एशिया की यौनकर्मी महिलाएं थीं. उन्होंने बताया कि तबियत खराब होने पर पैंतालीस घंटे बाद एक डॉक्टर उनका ब्लड प्रेशर चेक करने आया, "मैंने उससे कहा मैं मर सकता था, दिल का दौरा पड़ा है और आप एक आदमी को बाहर निकालने के लिए भी दरवाजा नहीं खोल सकते. लेकिन जापान की जेलों में ऐसे ही जानें जा रही हैं."

रिपोर्ट: क्रिस्टोफर जॉनसन/ एसएफ

संपादन: आभा मोंढे

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