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विज्ञान

विज्ञान में भी अमेरिका पर भारी है चीन

आर्थिक ताकत के साथ चीन विज्ञान के क्षेत्र में भी अमेरिका को चुनौती देने की स्थिति में आने लगा है. बजट की दिक्कत के कारण अमेरिकी अनुसंधान धीमे पड़ गए हैं, जबकि चीन और भारत शोध का बजट बढ़ाते जा रहे हैं.

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अमेरिकी विश्लेषकों को चिंता है कि विज्ञान के क्षेत्र में चीन अमेरिका को पीछे छोड़ सकता है. अमेरिकन एसोसिएशन फॉर द एडवांसमेंट ऑफ साइंस के प्रमुख एलन लेशनर कहते हैं कि 2011 और 2012 में अमेरिकी सरकार विज्ञान संबंधी शोध के क्षेत्र में पांच से दस फीसदी खर्च कम करेगी.

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लेशनर कहते हैं, ''देखा जाए तो भारत, चीन और कोरिया जैसे देश विज्ञान, विकास, शिक्षा और इंजीनियरिंग रिसर्च के क्षेत्र में खर्च बढ़ाते जा रहे हैं. वहीं अमेरिका इससे उल्टी दिशा में जा रहा है. हम पर इसके दो तरह से बड़े गहरे प्रभाव पड़ेंगे. इससे नई चीजों की खोज और इस काम में तेजी आएगी. दूसरा, युवा वैज्ञानिकों में यह संदेश जाएगा कि अमेरिका विज्ञान के क्षेत्र में प्रतिबद्ध नहीं रह गया है.''

अमेरिकी राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी का कहना है कि चीन रिसर्च के मामले में पिछले 15 सालों में बड़ी तेजी से आगे आया है. पहले चीन 14वें स्थान पर था, अब वह अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर है. लेशनर के मुताबिक, ''विज्ञान को लेकर चीन की प्रतिबद्धता बहुत साफ है. अब तो कई क्षेत्रों में चीन अमेरिका को चुनौती देने लगा है.''

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गूगल के कार्यकारी अधिकारी एरिक श्मिड्ट भी अमेरिका के वैज्ञानिक भविष्य से चिंतित हैं. वह कहते हैं कि जीपीएस, इंटरनेट और सेमी कंडक्टर जैसी चीजें ईजाद कर अमेरिका ने दुनिया के बाजारों पर कब्जा किया. लेकिन बजट में कटौती के बाद ऐसी बड़ी उपलब्धियां हासिल करने में मुश्किलें पैंदा होंगी. श्मिड्ट कहते हैं, ''तकरीबन सभी रिसर्च कार्यक्रम बजट कटौती का शिकार हो चुके हैं. इन चीजों का एक के बाद एक असर पड़ता है. सामान्य परिस्थितियों में रिसर्च के जरिए अरबों डॉलर के उद्योग खड़े होते हैं लेकिन उनके लिए शुरुआत में निवेश की ज़रूरत होती है. यहां निवेश का मतलब है रिसर्च पर पैसा खर्च करना.''

आईबीएम के पूर्व प्रमुख लोउ गेरस्टनर भी सरकार के इन फैसलों से चिंता में है. वह कहते हैं कि अमेरिका को प्रशिक्षित कामगार चाहिए लेकिन नैनो टैक्नोलॉजी जैसे क्षेत्र को देखें तो हमारे यहां पेशेवर लोग ही नहीं हैं. अमेरिकी चैनल सीएनएन से बातचीत में उन्होंने कहा, "हम प्रशिक्षित कामगार पैदा ही नहीं कर रहे हैं. इसीलिए बाहर के लोगों को हमें ऊंची तनख्वाहें देनी पड़ रही हैं. नौकरी बदलने पर भी उन्हें काफी पैसा मिल रहा है. ऐसा इसलिए हैं क्योंकि हम अपने लोगों को इन कामों के लिए तैयार कर ही नहीं पा रहे हैं.''

रिपोर्ट: एजेंसियां/ओ सिंह

संपादन: एन रंजन

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