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ब्लॉग

विचाराधीन कैदियों की रिहाई की आस

कानून की विफलता का इससे बड़ा सबूत क्या होगा जब किसी व्यक्ति को अपराध के लिए दोषी ठहराए बिना ही उस अपराध की सजा भुगतनी पड़े. भारत की जेलों में बंद कैदियों में दो तिहाई कैदी इस विडंबना का शिकार हैं.

दुनिया भर में कानून की मान्यता है कि जेल अपराधियों को सुधरने का मौका देने वाली जगह होती है. एक ऐसी जगह जहां व्यक्ति सजा काटते हुए अपनी भूल का अहसास कर सके. यह सोचने के लिए वह विवश हो कि कानून का पालन सामाजिक व्यवस्था के लिए कितना जरुरी है. मगर भारतीय जेलों की तस्वीर इस आदर्शवादी सोच से बिल्कुल उलट है.

अपराधियों के लिए जन्नत बन चुकी भारतीय जेलों में क्षमता से अधिक ठूंसे गए कैदी कारागार को इस आदर्श से निरंतर दूर कर रहे हैं. इसमें सबसे बड़ी बाधा वे विचाराधीन कैदी हैं जो कानून की जटिल और सुस्त प्रक्रिया के कारण जेलों में रहने को अभिशप्त हैं. अच्छे भले लोगों को आपराधिक प्रशिक्षण देने का अड्डा बन चुकी जेलों को सही मायने में सुधार गृह बनाने के लिए सरकार ने विचाराधीन कैदियों की रिहाई का रास्ता बनाना शुरु कर दिया है.

कवायद रिहाई की

कानून और गृह मंत्रालय ने अपने एक अहम फैसले में मामूली अपराधों के आरोपियों की रिहाई का रोडमेप बनाना शुरु कर दिया है. मोदी सरकार की यह पहल न सिर्फ मानवाधिकारों के लिहाज से काफी अहम है, बल्कि कानूनी प्रक्रिया के सुधार को देखते हुए भी निर्णायक साबित हो सकेगी. इसमें कोई शक नहीं है कि यह पहल कई मायनों में सकारात्मक बदलाव की वाहक बन सकती है.

वैसे तो तमाम अवसरों पर गाहे ब गाहे केन्द्र और राज्य सरकारें मामूली मामलों में विचाराधीन कैदियों की रिहाई करती रहती हैं. मगर इस रवायत से इतर मोदी सरकार की इस कवायद के तहत देश भर की जेलों को कैदियों के अतिरिक्त बोझ से मुक्त करने के बहुआयामी असर होंगे. इसके तहत केन्द्र सरकार ने सभी राज्यों से विचाराधीन कैदियों का लेखाजोखा मांगा है. इसमें उन कैदियों की रिहाई का रास्ता साफ हो सकेगा जो ऐसे अपराधों के आरोपी हैं जिनकी सजा उम्र कैद या मृत्युदंड नहीं है और जो नियत सजा की आधी अवधि जेल में काट चुके हों.

राहत के हकदार

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भारत में केन्द्रीय कारागार और राज्य सरकारों की जेलों में कुल 3.81 लाख कैदी बंद हैं. चौंकाने वाली बात तो यह है कि इनमें से 2.54 लाख यानि दो तिहाई से अधिक विचाराधीन कैदी हैं. इतना ही नहीं अपने भाग्य के फैसले के इंतजार में कैद इन लोगों में लगभग 75 फीसदी कैदी छोटे मोटे अपराधों में बंद हैं. ये दोषी ठहराए जाने पर मिलने वाली सजा से अधिक या लगभग आधी से अधिक अवधि का कारावास पूरा कर चुके हैं.

स्पष्ट है कि सरकार की इस सकारात्मक पहल से लगभग डेढ़ से पौने दो लाख विचाराधीन कैदियों के जीवन में नयी उम्मीद का दिया रौशन हो सकता है. यह न सिर्फ निजी तौर पर इन कैदियों के लिए राहत का सबब बनेगा, बल्कि इसका सीधा असर इनके परिजनों के लिए भी परोक्ष तौर पर राहत देने वाला साबित हो सकेगा.

कवायद का मकसद

सरकार की इस पहल के पीछे मंशा विचाराधीन कैदियों के मानवाधिकारों का उल्लंघन रोकना और अपराध की बढ़ती प्रवृत्ति को काबू में करना है. दरअसल सुप्रीम कोर्ट कई बार पुलिस और अदालतों को ताकीद कर चुका है कि किसी भी व्यक्ति को मामले की जांच के सिलसिले में गैरजरुरी तौर पर जेल न भेजा जाए.

इतना ही नहीं सर्वोच्च अदालत के निर्देश पर विधायिका ने दंड प्रक्रिया संहिता में माकूल बदलाव कर मामूली मामलों में आरेापी को जेल भेजने की बाध्यता हटा भी दी है. लेकिन महिला हिंसा, पशु एवं मानव तस्करी सहित तमाम अपराधों का लगातार खतरनाक रूप से बढ़ता ग्राफ अदालतों को आरोपियों के लिए जेल का रास्ता दिखाने पर मजबूर कर देता है.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को जेल भेजने के बाद यथासंभव अतिशीघ्र उसे जमानत देकर रिहा करने के भी निचली अदालतों को बारंबार निर्देश दिए है. इसके पीछे मकसद सिर्फ यही है कि किसी भी अच्छे भले व्यक्ति को जेल में अपराधियों की सोहबत से बचाया जाए जिससे उनकी संगत में उसे आपराधिक प्रशिक्षण न मिल सके.

न्यायिक प्रक्रिया का सुधार

साथ ही इससे समाज को जेल से सौगात में एक नया अपराधी मिलने की तोहमत से बचाया जा सके. इसके दो तात्कालिक लाभ हैं. पहला इससे न्यायिक प्रक्रिया के सुधार में मदद मिलेगी और दूसरा जेलों में क्षमता से ज्यादा भरे पड़े कैदियों का बोझ कम होने से अपराधी की सोच में सुधारात्मक बदलाव का कारागर का मकसद भी पूरा हो सकेगा.

हालांकि इस मुहिम की सबसे बड़ी चुनौती जेल में बंद जन्मजात आपराधिक प्रवृत्ति वालों की जमात से खतरनाक अपराधियों या ऐसे लोगों के छूटने का खतरा रहेगा जो सही मायने में रिहाई के हकदार नहीं हैं. ऐसे में सरकार को नई व्यवस्था लागू करने से पहले इस चुनौती से निपटने का कारगर तरीका खोजना जरुरी होगा. अन्यथा सरकारों की तमाम अच्छी कवायदों की तरह यह भी कामयाबी के फूलप्रूफ इंतजामों के बिना कागजी नूराकुश्ती ही साबित होगी. निसंदेह इसके बेहद खतरनाक अंजामों से सामाजिक व्यवस्था को जूझना पड़ेगा.

ब्लॉगः निर्मल यादव

संपादनः ईशा भाटिया

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