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ब्लॉग

विकास के विकल्पों पर हो बहस

भारत के गुप्तचर ब्यूरो की एक लीक रिपोर्ट के अनुसार ग्रीनपीस सहित अनेक गैर-सरकारी संगठन विदेशी धन प्राप्त कर जनांदोलनों के जरिये देश के आर्थिक विकास में बाधा पहुंचा रहे हैं. भारत में विकास के विकल्पों पर बहस की जरूरत है.

ब्यूरो का कहना है कि इनके कारण सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में दो से तीन प्रतिशत तक की कमी आई है. गुप्तचर ब्यूरो का आरोप है कि ये संगठन विदेशों से धन प्राप्त करने संबंधी कानून एफसीआरए का उल्लंघन करते हैं और कोयला खनन, कोयले पर आधारित बिजली उत्पादन, परमाणु संयंत्रों एवं बड़े बांधों के खिलाफ आंदोलन करके इन क्षेत्रों की परियोजनाओं को ठप्प करा देते हैं जिनके कारण देश के आर्थिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. यह रिपोर्ट 3 जून को भेजी गई थी और इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आठ वर्ष पुराने भाषण की कुछ बातें लगभग ज्यों-की-त्यों दुहरा दी गई हैं.

हर समस्या का ठीकरा ‘विदेशी हाथ' पर फोड़ना राजनीतिक नेताओं की पुरानी आदत रही है और इस बहाने का सबसे अधिक इस्तेमाल 1970 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था. एफसीआरए भी पहले-पहल इमरजेंसी के दौरान ही बनाया गया था और फिर चार वर्ष पहले इसमें कुछ संशोधन किए गए. खुद पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कुडनकोलम परमाणु संयंत्र के खिलाफ चले आंदोलन के पीछे ‘विदेशी हाथ' देखते थे. इसी तरह उनकी सरकार में कृषि मंत्री शरद पवार को जैविक रूप से संवर्धित (जेनेटिकली मोडीफाइड) फसलों के खिलाफ चले आंदोलन के पीछे भी इसी तरह की साजिश नजर आती थी.

Kudankulam Kernkraftwerk

परमाणु बिजलीघर

दरअसल इसके पीछे बुनियादी बात यह है कि विकास के रास्ते के बारे में लोगों के बीच मतभेद हैं. लोकतंत्र में मतभेद होना न केवल स्वाभाविक है बल्कि जरूरी भी है. साथ ही यह भी जरूरी है कि उन मतभेदों को शांतिपूर्ण, अहिंसक और लोकतांत्रिक ढंग से प्रकट करने और अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करने की आजादी भी हो. विकास का एक रास्ता विशाल बांधों के निर्माण, कोयला-आधारित और परमाणु-आधारित बिजली उत्पादन, वनों की कटाई और खेतों की सफाई करके प्राप्त जमीन पर विशाल नगर बसाने, पर्यावरण की ओर विशेष ध्यान दिये बगैर बड़े उद्योग लगाने आदि पर जोर देता है.

दूसरा वैकल्पिक रास्ता पर्यावरण को बचाए रखकर टिकाऊ विकास की वकालत करता है. यह मानता है कि बड़े बांधों की जगह छोटे-छोटे बांध बनाए जाएं और छोटे पैमाने पर बिजली उत्पादन करने वाले बिजलीघरों का जाल बिछाया जाए, खनन को नियमित करने के लिए उपयुक्त नीति बने और बांध बनने और खनन कार्य के चलने के कारण अपनी जमीन, रोजी-रोटी और घर-बार खो देने वाले विस्थापितों के पुनर्वास की ओर पर्याप्त ध्यान दिया जाए. ऊर्जा उत्पादन के साथ ही पर्यावरण एवं नागरिकों के हितों के संरक्षण को भी तवज्जो दी जाए. आर्थिक विकास इस तरह से किया जाए ताकि उसके लाभ गरीब से गरीब व्यक्ति तक भी पहुंच सकें यानि धन-संपदा पैदा हो तो उसका न्यायोचित वितरण भी हो. वह केवल कुछ कॉर्पोरेट घरानों की मुट्ठी में बंद होकर न रह जाए.

लेकिन पिछले दशकों का इतिहास गवाह है कि सत्ता में आने के बाद सभी पार्टियां विकास के एक ही रास्ते पर चलती आई हैं और इसके कारण बांध बनने, कोई बड़ी औद्योगिक परियोजना के शुरू होने, खानों में खुदाई होने या फिर शहर बसाये जाने की कीमत गरीब किसानों और आदिवासियों को अपना घर-बार खोकर चुकानी पड़ती है. जब उनके बीच काम कर रहे एनजीओ इसके खिलाफ आंदोलन करते हैं या जनचेतना के निर्माण के लिए अभियान छेड़ते हैं, तो उन्हें विकासविरोधी होने के आरोपों का सामना करना पड़ता है.

Greenpeace-Demo in Indien

पर्यावरण का समर्थन

इसमें कोई शक नहीं कि पिछले तीन-चार दशकों के दौरान एनजीओ उद्योग बहुत तेजी के साथ पनपा है. इस समय भारत में दस लाख से भी अधिक एनजीओ विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय हैं. इनमें से काफी बड़ी संख्या में एनजीओ विदेशी वित्तीय सहायता पर निर्भर हैं, लेकिन अनेक ऐसे भी हैं जो केवल स्थानीय सहयोग से ही चलते हैं. एनजीओ सेक्टर में यह भी देखा गया है कि संगठन के पदाधिकारी ऊंची-ऊंची तनख्वाहें पाते हैं, फाइव-स्टार होटलों में अपनी मीटिंगें करते हैं और गैर-सरकारी संगठन होने के बावजूद उनका अधिकांश काम सरकारी विभागों की तरह जमीन पर नहीं बल्कि कागजों पर होता है.

पिछले चार वर्षों में सरकार ने लगभग 4000 एनजीओ की विदेशी धन प्राप्त करने की अनुमति रद्द कर दी थी. उसे ऐसा करने का पूरा अधिकार है, लेकिन यह कहना नितांत अनुचित है कि सभी एनजीओ विदेशी आर्थिक सहायता का दुरुपयोग करते हैं. यदि ग्रीनपीस ऐसा कर रही है, तो सरकार जांच कराकर उस पर अंकुश लगा सकती है. यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि जिन मुद्दों पर ग्रीनपीस या उसके जैसे संगठन भारत में आंदोलन चला रहे हैं, उन्हीं मुद्दों पर अनेक विकसित देशों में भी आंदोलन चले हैं. लेकिन जांच कराने के बजाय गुप्तचर ब्यूरो की रिपोर्ट लीक करवा कर ग्रीनपीस और अन्य संगठनों के खिलाफ संदेह का माहौल तैयार किया जा रहा है. यदि बहुतों को नई सरकार के गठन के बाद मतभेदों के प्रति असहिष्णुता का माहौल पैदा करने की साजिश नजर आ रही है, तो इसे बहुत गलत भी नहीं कहा जा सकता.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

संपादन: महेश झा

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