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ब्लॉग

विकास के लिए नीति नहीं नैतिकता भी चाहिए

सरकार नीति से ही नहीं नैतिकता से भी चलती है. और इस इम्तहान में तो लगता है भारत में सत्तारूढ़ बीजेपी सरकार एक साल में ही चूक गई है. नीति और नैतिकता का ये संकट एक बार फिर विवादास्पद भूमि अधिग्रहण बिल में दिखता है.

भूमि अधिग्रहण बिल पर भारत सरकार घिरी हुई है. कानून के रास्ते में किसानी हकहकूक के ऐसे कई सवाल हैं जिनका जवाब नवगठित नीति आयोग के पास भी नहीं है. कहा तो ये जा रहा है कि बिल में देरी का असर विकास योजनाओं पर पड़ रहा है. चालीस फीसदी प्रोजेक्ट इस देरी से प्रभावित हो रहे हैं लेकिन ऐसे ही प्रोजेक्टों के नाम पर अधिग्रहीत की गई लाखों हेक्टेयर जमीन के खाली और बंजर पड़े रहने का आखिर जवाब क्या है. उन बेकार पड़ी जमीनों के मालिक विस्थापित और बिखरी हुई जिंदगियां लेकर मायूसी में दिन काट रहे हैं. जो सक्षम थे वे अपने लिए शहरों में जगह बना चुके हैं लेकिन निर्बलों के लिए तो ये एक दोहरी मार थी. यूपीए सरकार ने जो कानून भूमि अधिग्रहण को लेकर बनाया था, एक विडंबना ही है कि वो उसकी हार का एक प्रमुख कारण भी था. क्योंकि कॉरपोरेट को वो रास नहीं आया और उस कानून को विकास विरोधी और निवेश विरोधी बताया गया. लेकिन यूपीए सरकार किसानों और आदिवासियों के पक्ष में देर से जागी. वो अपना संदेश पुख्ता तरीके से पहुंचा नहीं पाई जिसका फायदा उठाकर दिल्ली की सत्ता पर आई बीजेपी ने सबसे पहला काम भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव का किया. अब ये बिल इस शक्ल में आ गया है कि कमोबेश अंग्रेजों के 1894 में बनाए कानून की भयावह छाया इसमें नजर आती है.

बिल में पांच ऐसी विशेष श्रेणियां चिंहित की गई हैं जिनके तहत किसानों से बिना सहमति के जमीन ली जा सकती है. इसमें रक्षा, ग्रामीण बुनियादी ढांचा, सस्ती रिहायश, औद्योगिक गलियारे और बुनियादी ढांचे के विकास से जुड़ी परियोजनाएं जिनमें पब्लिक प्राइवेट साझेदारी (पीपीपी) वाली परियोजनाएं भी शामिल हैं. इन पांचों श्रेणियों में पिछले कानून के तहत मिलने वाली राहत को हटा दिया गया है. अब इन श्रेणियों के प्रोजेक्टों की सामाजिक या पर्यावरणीय इम्पैक्ट एसेसमेंट (एसआईए) कराने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. बिल में एक प्रावधान निजी कंपनियों के अधिग्रहण को लेकर है. इसके तहत जहां पहले के कानून में निजी कंपनियों का जिक्र था अब उस शब्दावली की जगह प्राइवेट एंटिटी कर दिया गया है जिसमें कंपिनयों के अलावा, निगम और एनजीओ भी आ जाएंगे.

ऐसे समय में जब किसानों की हालत खराब है और लाखों किसान पिछले कुछ वर्षों में आत्महत्याएं कर चुके हैं और ये सिलसिला थम नहीं रहा है, ये विधेयक तो समावेशी विकास के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा ही नजर आता है. क्योंकि इसमें से किसान, मजदूर, आदिवासी, कुल वंचित समुदाय तो कहीं है नहीं. 12वीं पंचवर्षीय योजना के मुताबिक आज़ादी के बाद से देश के करीब छह करोड़ लोग विकास प्रोजेक्टों के नाम पर बेदखल किए गए हैं. इनमें से 40 फीसदी आदिवासी हैं. देश का 90 फीसदी कोयला आदिवासी इलाकों में हैं. 50 प्रतिशत के करीब प्रमुख खनिजों के स्रोत वहीं हैं और ऊर्जा संभावनाएं भी वहीं बिखरी हुई हैं. रियल एस्टेट और जमीन के कारोबार से जुड़े बड़े बिल्डर्स और बड़े ठेकेदारों की पौ बारह है. निर्माण सेक्टर, ऊर्जा सेक्टर, खनन सेक्टर के कॉरपोरेट धुरंधरों को अपार मुनाफा आएगा, लेकिन निशाने पर सबसे ज्यादा यही समुदाय है जो पूरे देश में बिखरा हुआ है.

आखिर क्या किसी ने इस देश के किसानों के पास जाकर उन्हें पूछा है कि वे क्या चाहते हैं. या आए दिन मन की बात करने वाले प्रधानमंत्री ने किसी किसान से पूछा है कि अपने मन की बात भी बताओ. काश ऐसा होता और अगर किसान ये कह दे कि वो अपनी जमीन किसी भी कीमत पर सरकार को या कंपनी को नहीं देना चाहता है और वहां खेती ही करते रहना चाहता है, तो इसका सरकार, अफसरों और कॉरपोरेट के प्रतिनिधियों के पास क्या जवाब होगा. या फिर वो जबरन कार्रवाई होगी. लगता है, जमीन अधिग्रहण की लालसा हमें ब्रिटिश दिनों के अनुभवों की ओर ले जाएगी. और ऐसा उस देश में होगा जहां 60 फीसदी लोग किसी न किसी रूप में कृषि क्षेत्र से जुड़े हैं.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

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