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ब्लॉग

विकास के लिए खपत और आय जरूरी

संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों ने अगले 15 सालों में गरीबी को उसके हर रूप में समाप्त करने का लक्ष्य तय किया है. सितंबर में महासभा के दौरान इस फैसले पर अंतिम मुहर लग जाएगी लेकिन उन्हें पूरा करना आसान नहीं होगा.

संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों ने सतत विकास के जो 17 लक्ष्य तय किए गए हैं उनमें लैंगिक बराबरी, भूखमरी की समाप्ति, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण शामिल है. नए लक्ष्य सहस्राब्दी लक्ष्यों को पूरा करने में मिले अनुभवों के आधार पर तय किए हैं. पिछले 15 सालों में बहुत से देशों ने गरीबी कम करने और लोगों को स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण सफलता पाई है लेकिन मेक्सिको का उदाहरण दिखाता है कि संपूर्ण सामाजिक विकास के लिए स्थिर आधार नहीं बना है.

सतत विकास के जो लक्ष्य इस साल तय किए गए हैं, वे तभी पूरे हो सकेंगे जब समाज में संभावनाओं में बराबरी की गारंटी हो. मसलन लैंगिक बराबरी के लिए जरूरी है हर लड़की और हर लड़के को शिक्षा और उसके बाद रोजगार की संभावना मिले. काम से गुजारा करने लायक वेतन और पर्याप्त आय ही भूखमरी खत्म करने और स्वास्थ्य सेवा की गारंटी कर पाएगा. और यह सब होने के बाद ही लोग पर्यावरण संरक्षण को गंभीरता से ले पाएंगे और उस पर जरूरी खर्च भी कर पाएंगे. इस समय यह सब मृगमरीतिका समान है. यदि कुछ देश कुछ कदम उठाते भी हैं तो संभावनाओं के अभाव में उनका लाभ कोई और उठा ले जाता है. या इस तरह के सरकारी कदम मेक्सिको की तरह गलत नतीजे देने लगते हैं.

पिछले पंद्रह वर्षों में सहस्राब्दी कार्यक्रम के तहत 1 अरब से ज्यादा लोग गरीबी के चंगुल से बाहर निकाले गए हैं. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में इसमें चीन और भारत की भूमिका के लिए उनकी सराहना की गई है. यह सही है कि इस कार्यक्रम ने पूरी दुनिया में अत्यंत गरीबों की संख्या घटाने के लिए कुछ करने का उत्साह पैदा किया और इसके लिए एक आंदोलन सा तैयार हुआ. लेकिन स्वाबलंबी विकास के लिए सरकारों को और मेहनत करनी होगी और उसका ठोस ठांचा तैयार करना होगा. बहुत से देश यह कर नहीं पाए हैं, इसके बदले उन्होंने गरीबी की परिभाषा बदलने का सहारा लिया है.

भारत में भी दस या पांच रुपये में पेटभर खाना खा सकने की बहस सबको याद होगी. भारत सरकार के अनुसार 2012 में देश की 30 प्रतिशत आबादी या करीब 36 करोड़ लोग गरीब थे. 2009 के मुकाबले 9 करोड़ से ज्यादा लोगों को गरीबी से बाहर निकाला गया. पिऊ रिसर्च सेंटर के अनुसार पिछले दशक में बहुत से लोग गरीबी से बाहर निकले हैं लेकिन वे निम्न आय वर्ग तक ही पहुंच पाए हैं. 10-20 डॉलर प्रतिदिन की कमाई करने वाले लोगों की संख्या दस वर्षों में एक से बढ़कर सिर्फ 3 प्रतिशत हुई है. ढाई डॉलर प्रतिदिन की आय की गरीबी रेखा पर पौष्टिक खाना और दूसरी जरूरतें पूरी करना असंभव है.

चीन के आर्थिक विकास की वजह से 1990 के बाद से पूर्व एशिया में गरीबों की संख्या 61 प्रतिशत से गिरकर 4 प्रतिशत रह गई है. भारत ने भी अच्छे नतीजे दिए हैं लेकिन अभी बहुत कुछ करना बाकी है. एक बानगी भारत के ताजा सामाजिक आर्थिक और जाति जनगणना से मिलती है. रिपोर्ट के लिए 30 करोड़ लोगों का सर्वे किया गया जिनमें 73 प्रतिशत गांवों में रहते हैं. इनमें से सिर्फ 5 प्रतिशत टैक्स देते हैं सिर्फ ढाई प्रतिशत के पास गाड़ी है और सिर्फ दस प्रतिशत के पास नौकरी है. भारत काम करने वालों को पर्याप्त आय की गारंटी देने के बदले मजदूरी कम रखकर विकास चाहता है. लेकिन विकास के लिए खपत जरूरी है. खपत के लिए आय और आय के लिए रोजगार. सरकार को सब्सिडी का तंत्र चलाकर लोगों को गरीब रखने के बदले उन्हें स्वावलंबी बनाने की नीति को लागू करना होगा. तभी 2030 तक सम्यक विकास का ताजा लक्ष्य पूरा हो पाएगा.

ब्लॉग: महेश झा

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