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दुनिया

विकासशील देशों में बढ़ता मध्यवर्ग

श्रमिकों को विकासशील देशों में बेहतर नौकरियां मिल रही हैं और वह मध्यवर्ग का हिस्सा बन रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन आईएलओ की नई रिपोर्ट मे ऐसे और कई नए ट्रेंड बताए गए हैं.

आईएलओ के प्रमुख गाय रायडर ने कहा, "विकासशील देश विकसित अर्थव्यवस्थाओं के स्तर पर आ रहे हैं." 1980 और 2011 के बीच सेनेगल, वियतनाम और ट्यूनीशिया में व्यक्तिगत आय हर साल 3.3 प्रतिशत की दर से बढ़ी है, जो विकसित देशों से कहीं ज्यादा है. ऐसे देशों में 10 में से चार श्रमिक विकासशील मध्यवर्ग में गिने जाते हैं. यानि वह हर दिन चार डॉलर से ज्यादा कमाते हैं. दो दशक पहले इनकी आय दो डॉलर प्रति दिन थी.

लेकिन दुनिया भर में आधे से ज्यादा कामगार यानि करीब 1.5 अरब लोगों की हालत नाजुक है. वे बिना औपचारिक समझौते के काम करते हैं. इनके पास किसी तरह की सुरक्षा नहीं होती और वह किसी भी समय गरीबी रेखा के नीचे पहुंच सकते हैं. इनमें से करीब 84 करोड़ लोग दिन में दो डॉलर से कम कमाते हैं. 21वीं सदी की शुरुआत में करीब 50 प्रतिशत मजदूर गरीबी रेखा से नीचे रहते थे.

गरीबी की दवा नौकरी

आईएलओ ने 140 देशों का विश्लेषण किया है. रिपोर्ट के मुताबिक जिन देशों ने गरीबी कम करने की कोशिश की, मजदूरों की हालत को बेहतर बनाया, अच्छी नौकरियां पैदा करने में निवेश किया, ऐसे देश आर्थिक संकट से जूझने में भी सफल रहे. संस्था के प्रमुख रायडर ने कहा, "नागरिक संसाधनों पर निवेश करने से विकास को फायदा हो रहा है. आपको हर उस सोच से दूर होना होगा, जिसमें माना जाता है कि विकास को मजदूर अधिकार कम करके बढ़ाया जा सकता है."

वैश्विक आर्थिक संकट के बाद विकसित और विकासशील देशों के बीच आर्थिक फर्क घट रहा है. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक पिछले साल करीब 20 करोड़ लोग बेरोजगार थे. 2019 तक यह संख्या 21 करोड़ तक जा सकती है. वैश्विक बेरोजगारी दर करीब छह प्रतिशत है और 2017 तक ऐसे ही रहने की संभावना है. पर विकसित देशों को ज्यादा नुकसान हुआ है, जहां बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हुए हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक प्रवासन भी बढ़ रहा है. पिछले साल तक 21 करोड़ से ज्यादा लोग अपने देश से बाहर रह रहे थे. यूरोपीय संघ के देश प्रवासियों में सबसे लोकप्रिय हैं और दुनिया भर के 51 प्रतिशत प्रवासी यूरोपीय संघ के देशों में रहते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक आर्थिक संकट से जूझ रहे विकसित देशों से युवा विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में जाकर काम करने लगे हैं. आईएलओ का कहना है कि नई नौकरियों से और ज्यादा लोग अच्छी जिंदगी जी सकेंगे. अगले पांच साल में 21 करोड़ 30 लाख लोग श्रम बाजार में शामिल होंगे. इनमें से 20 करोड़ केवल विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों जैसे भारत और चीन से होंगे.

भारत में महिला श्रमिक

आईएलओ की वेबसाइट के मुताबिक भारत में काम करने वाली महिलाओं की संख्या कम हुई है. भारत में 80 प्रतिशत पुरुष नौकरी करते हैं या रोजगार ढूंढ रहे होते हैं. महिलाओं के लिए यह संख्या 32 प्रतिशत है. 2004 में यह आंकड़ा 37 प्रतिशत था और 2009 तक यह गिर कर 29 प्रतिशत तक पहुंच गया. इसकी वजह यह भी हो सकती है कि ज्यादा महिलाएं विश्वविद्यालय या कॉलेज में पढ़ने के लिए भर्ती हो रही हैं. अमीर घरानों की महिलाएं कम काम करती हैं और भारत में महिलाएं कुछ ही उद्योगों में काम करती पाई जाती हैं, जैसे हस्तकला, खेती और उत्पादन.

आईएलओ की वेबसाइट में लिखा है कि रोजगार में महिलाओं के खिलाफ भेदभाव कम करने के लिए कानून लागू करने से महिलाएं और काम करने लगेंगी. साथ ही महिलाओं और पुरुषों के वेतन को समान करना होगा. आईएलओ के स्टीवन कापसोस कहते हैं, "महिलाओं को श्रम बाजार से दूर रखना यानि मानव संसाधनों के इस्तेमाल पर रोक लगाना. इससे उत्पादन और आर्थिक विकास को नुकसान होगा."

एमजी/एजेए (एएफपी, एपी)

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