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दुनिया

वापस लौटते जिहादियों से कैसे निपटे जर्मनी

सीरिया और इराक में जारी संघर्ष में कई जर्मन नागरिक भी इस्लामिक स्टेट के लिए लड़ रहे हैं. सीमा पर सख्ती की कमी के कारण वे तुर्की के रास्ते आसानी से वापस आ जाते हैं, फिलहाल जर्मनी के पास इससे निपटने का कोई तरीका नहीं है.

तुर्क मूल का वह युवा, जर्मन शहर हैम्बर्ग के किसी भी और आम लड़के की तरह था. लेकिन ऐसा सिर्फ तब तक रहा जब तक वह सलाफियों के संपर्क में नहीं आया. सब कुछ ऐसे हुआ कि कभी उसके परिवार को भी नहीं लगा कि बेटा गलत संगत में है. हैम्बर्ग की रीजनीतिज्ञ गुएल्नुर कान ने बताया, "धीरे धीरे उसने अपनी बहनों के पहनावे को टोकना शुरू कर दिया और उन्हें बताने लगा कि किस तरह के कपड़े पहनने चाहिए. वह अपने परिवार को टीवी देखने पर भी टोकने लगा, यह कहते हुए कि दुनिया में कितने मुसलमान मर रहे हैं और वे टीवी देख रहे हैं."

इसी बीच जब पूरा परिवार छुट्टियों पर घूमने गया हुआ था उसने अपना सामान बांधा और मध्यपूर्वी इस्लामी संगठनों के साथ लड़ाई में शामिल होने निकल पड़ा. यह सिर्फ उसी की कहानी नहीं है. अनुमान है कि जर्मनी के करीब 400 युवा मुस्लिम कट्टरपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट के लिए लड़ने के लिए इराक और सीरिया के लिए रवाना हुए. जर्मनी में संविधान संरक्षण के केन्द्रीय कार्यालय के पास ऐसे पांच जिहादियों की जानकारी है जिन्होंने सीरिया और इराक में आत्मघाती हमलों को अंजाम दिया.

लचर सीमा नियंत्रण

तुर्की की सरकार का कहना है कि सीरिया के साथ उसकी सीमा बंद है. लेकिन लोग अक्सर सीमा पार करने में कामयाब हो जाते हैं. हथियार और असलहे भी कथित रूप से सीमा पार जा रहे हैं. करीब 900 किलोमीटर के सीमावर्ती इलाके में कई जोखिम भरे रास्ते भी हैं. रास्ते में पड़ने वाले कई इलाके सीरिया के शरणार्थियों के लिए फायदेमंद जरूर साबित हो रहे हैं, लेकिन इन रास्तों पर सख्ती की कमी के कारण लड़ाके भी आसानी से आने जाने में कामयाब हैं. हालांकि तुर्क सरकार का कहना है कि उसके यहां कट्टरपंथी लड़ाकों के लिए कोई जगह नहीं, लेकिन पश्चिमी देशों का शक बढ़ता जा रहा है.

कान ने इस तुर्क लड़के को ढूंढने की कोशिश में जब अंकारा में जर्मन दूतावास को संपर्क किया तो, "जर्मन राजदूत ने बताया कि सीरियाई सीमा पर नियंत्रण नहीं है, यानि कोई भी आसानी से आ जा सकता है." उन्होंने बताया कि जब उन्हें यह बात पता चली तो वह हैरान रह गईं.

जर्मन अधिकारियों के लिए सीमा पर सख्ती की कमी होना दोहरी परेशानियों का सबब है. इससे युवाओं को लड़ाई में शामिल होने से रोकना मुश्किल होता है. दूसरी बड़ी समस्या है इन्हें वापस आने से रोकना, खासकर तुर्क सीमा के सहारे.

ब्रेमेन के आंत्रिक मामलों के सीनेटर उलरिश माउरेर ने जर्मनी के राष्ट्रीय रेडियो पर बताया, "कोई भी सीरिया से सीधे ब्रेमेन नहीं आता है." उनके मुताबिक लड़ाके तुर्की जाते हैं. लोगों को लगता है कि वे छुट्टी पर जा रहे हैं, लेकिन वहां से वे सीमा पार कर सीरिया चले जाते हैं. वे दूसरे देशों के रास्ते फ्रैंकफर्ट पहुंचते हैं और वहां से ब्रेमेन आते हैं.

जांच के दायरे में

माउरेर के मुताबिक यह पता लगाना बहुत मुश्किल है कि वापस आने वाला शख्स इस्लामी कट्टरपंथी हिंसा में हिस्सा लेकर लौट रहा है या नहीं. ऐसे में जिन पर शक होता है, पुलिस उनकी जांच करती है. उन्होंने कहा इस काम में बहुत सारे लोगों को लगाना पड़ता है लेकिन इसके अलावा कोई और रास्ता भी नहीं.

मध्यपूर्व और इस्लामिक मामलों की विशेषज्ञ मिषाएल ल्यूडर्स के मुताबिक सीरिया से लौट रहे इस्लामी कट्टरपंथी सुरक्षा अधिकारियों के लिए बहुत बड़ी चुनौती हैं, "जो कोई भी वहां से वापस आ रहा है आपको उस पर शक की नजर बनाए रखनी होती है. यह कभी भी परेशानी खड़ी कर सकता है."

पुनर्सुधार कार्यक्रम

इनमें कई ऐसे भी लोग होते हैं जो इस्लामी कट्टरपंथ से मुंह फेरकर लौट रहे होते हैं. माउरेर ने बताया, "हमने कई ऐसे लोग भी देखे हैं जो पुलिस का साथ देना चाहते हैं और युवाओं को जाने से रोकने में मदद करते हैं." ऐसे लोगों के लिए पुनर्सुधार केंद्रों की स्थापना की मांग हो रही है, ताकि वे ऐसी बातों से दोबारा आक्रषित होकर किसी बड़े खतरे के रूप में न खड़े हो जाएं.

कान इस प्रस्ताव का समर्थन करती हैं. लड़ाई से लौटे युवा खुद को एक हीरो के तौर पर नहीं, बल्कि सदमें में पाते हैं. ऐसे में मनोवैज्ञानिक मदद उन्हें रोक सकती है और उनकी जिंदगी दोबारा बना सकती है. हालांकि वापस लौट रहे जिहादियों से निपटने के लिए सरकार के पास अब तक कोई पुख्ता योजना नहीं है.

रिपोर्ट: आने आल्मेलिंग/एसएफ

संपादन: ईशा भाटिया

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