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खेल

वर्ल्ड कप और नस्ली समस्या

पेले की टीम सांतोस से खेलने वाले ब्राजीली टीम के पूर्व मिडफील्डर अराउका जब कुछ महीने पहले एक टेलीविजन इंटरव्यू कर रहे थे, तो वहां जमा दर्शकों ने "बंदर, बंदर" चिल्लाना शुरू कर दिया.

ताना मार रहे लोगों ने यह भी कहा, "अफ्रीका जाकर कोई टीम चुन लो.. यहां से भागो." इसके बाद राष्ट्रपति डिल्मा रूसेफ ने ट्वीट किया, "इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता कि नाइजीरिया के बाद सबसे ज्यादा अश्वेतों के देश ब्राजील में नस्ली समस्या है." उन्होंने अपील की है, "नस्लवाद के बिना वर्ल्ड कप". लेकिन ब्राजील में यह समस्या अब भी बनी हुई है.

चर्चा नहीं होती

देश में नस्ली भेदभाव पर अलग से कोई कानून नहीं है और इस मुद्दे पर खुल कर बात भी नहीं होती है. रियो द जनेरो में अफ्रो ब्राजीलियाई अध्ययन और रिसर्च इंस्टीट्यूट की एलीसा लारकिन नासिमेंटो कहती हैं, "ब्राजील में जिस तरह का नस्लवाद है, वह श्वेत अश्वेत नस्लवाद से भी खराब है क्योंकि यह छल और धोखे पर आधारित है."

उनका कहना है, "इससे इनकार किया जाता है. सत्ताधारी लोग सहित ज्यादातर लोगों का कहना है कि नस्ली समस्या नहीं है. इसके बाद आपके पास बात करने के लिए कुछ नहीं बचता."

पिछले कुछ दशकों में ब्राजील ने कुछ कार्यक्रम शुरू किए हैं. स्कूलों में अफ्रीकी इतिहास को बारीकी से पढ़ाया जाता है और नस्ली समस्या से निपटने के लिए कैबिनेट स्तर का पद सृजित किया गया है. नस्लवाद पर किताब लिख चुकीं लारकिन नासिमेंटो कहती हैं, "सबसे बड़ी बात यह है कि समाज को नस्लवाद पर बात करने के लिए राजी किया जाए और उन्हें अहसास दिलाया जाए कि यहां यह समस्या है."

गुलाम प्रथा से शुरुआत

ब्राजील कभी पुर्तगाल का उपनिवेश हुआ करता था, जहां 50 लाख गुलामों का आयात किया गया था. यह संख्या अमेरिका में गुलामों की संख्या से दसगुना ज्यादा थी. पुर्तगाल ने 1888 में गुलाम प्रथा खत्म कर दी. यानि अमेरिका से 25 साल बाद.

आम तौर पर ब्राजील में श्वेतों के मुकाबले अश्वेत सिर्फ आधी कमाई करते हैं और मौजूदा मंत्रिमंडल में सिर्फ एक अश्वेत मंत्री है. देश के पहले अश्वेत चीफ जस्टिस योआक्विम बारबोसा हाल में रिटायर हुए हैं और पत्रिकाओं में गाहे बगाहे ही किसी अश्वेत मॉडल की तस्वीर दिखती है. फिल्मों में भी आम तौर पर सिर्फ श्वेत सितारे होते हैं और टेलीविजन के लोकप्रिय धारावाहिकों में भी.

ब्राजील के मौजूदा विश्व कप टीम में 90 फीसदी खिलाड़ी अश्वेत हैं लेकिन स्टेडियम पहुंचने वाले फैन अधिकतर श्वेत हैं. सिर्फ ब्राजील ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के सबसे लोकप्रिय सितारे पेले अगर 20वीं सदी के पहले हाफ में खेलना चाहते, तो उन पर पाबंदी लग जाती क्योंकि उस वक्त अश्वेतों को फुटबॉल खेलने की इजाजत नहीं थी. पेले को "काला हीरा" भी कहा जाता है.

फुटबॉल हमारे लिए नहीं

हालांकि गरीब अश्वेतों के लिए स्थिति अब भी बहुत बेहतर नहीं हुई है. नारंगी बीनने वाले जोएसी डीसिल्वा कहते हैं, "हम जैसा कोई भी वहां नहीं जाता." वह रियो के उस स्टेडियम से सिर्फ 25 मीटर की दूरी पर काम करते हैं, जहां वर्ल्ड कप के मैच हो रहे हैं. उनके बयान में जबरदस्त निराशा है, "मैं यह भी नहीं कह सकता कि मैं गुस्से में हूं. मुझे लगता है कि अमीरों का अलग जीवन है और हमारे जैसों का अलग."

बड़े रेस्तरां, शॉपिंग मॉल और एयरपोर्टों में काली और भूरी चमड़ी वाले लोग कम ही दिखते हैं. वे आम तौर पर आया, क्लीनर या रसोइये होते हैं. पुर्तगाल में गुलामी प्रथा खत्म होने के वक्त वहां की आबादी का 80 फीसदी अश्वेतों का था. लेकिन आबादी में सामंजस्य बनाने के लिए दूसरे देशों से श्वेतों को लाया गया और बसाया गया. इनमें यूरोपीय और जापानी लोग भी शामिल हैं.

कैसे कैसे रंग

ब्राजील की सरकार ने जब कुछ दशक पहले एक सर्वे में लोगों से उनके चमड़ी का रंग पूछा, तो लोगों ने 150 अलग अलग रंग बताए. इनमें बर्फ जैसा सफेद, गुलाबी सफेद, काला भूरा, लाल जैसा, बादाम के रंग का, आधा काला, टोस्ट किया हुआ और गेहूं के रंग का जैसे जवाब शामिल थे.

लारकिन नासिमेंटो पूछती हैं, "काला कौन है?" जवाब भी उनके पास है, "जब आप रेस्तरां में जाते हैं, तो जो वहां नहीं दिखते हैं, वे काले हैं. अगर सड़क पर पुलिस किसी को घेरती है, तो वह काला है."

एजेए/एमजे (एपी)

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