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मनोरंजन

'वयस्कों के लिए' द अटैक्स ऑफ 26/11

रामगोपाल वर्मा का दावा है कि 2008 में हुए मुंबई हमलों को यह फिल्म जस का तस दिखाएगी और इस हादसे में बचे लोगों या इसमें मारे गए लोगों के परिजनों के लिए यह फिल्म देखना निश्चित उस हादसे से दोबारा गुजरने से कम नहीं होगा.

शुक्रवार को यह फिल्म भारत भर में रिलीज होने वाली है. इसमें 26 नवंबर 2008 को हुए आतंकी हमले और सुरक्षाकर्मियों और आतंकियों के बीच 60 घंटे चली मुठभेड़ को दिखाया गया है. निर्देशक राम गोपाल वर्मा गैंगस्टर और हॉरर फिल्मों के लिए मशहूर हैं. उनका कहना है कि उन्होंने फिल्म में इस हादसे के भावनात्मक पक्ष को उभारने की कोशिश की है. रामगोपाल वर्मा कहते हैं, "सभी लोग जानते हैं कि क्या हुआ था, लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि कैसे हुआ था. फिल्म काफी दुखी करने वाली है, इसमें कोई मनोरंजन नहीं है."

मुंबई में इस फिल्म पर लोगों ने मिश्रित प्रतिक्रिया दी है, क्योंकि लोग इन हमलों के बारे में काफी संवेदनशील हैं. ताज होटल, अस्पताल, कैफे, ट्रेन स्टेशन और यहूदी सेंटर पर हुए हमलों को फिल्म के जरिए लोग फिर से याद नहीं करना चाहते. वहीं कुछ लोग तो राम गोपाल वर्मा के इस तरह की फिल्म बनाने पर ही सवाल उठा रहे हैं. अमिताभ बच्चन फिल्म का बिना एडिट किया हुआ हिस्सा देख कर बहुत अभिभूत हैं. उन्होंने ट्वीट किया कि इस फिल्म को देख उनके 'आंसू नहीं थमे' और फिल्म के लिए शोध 'काफी सटीक' किया गया है.

बिना स्टार भी 40 करोड़ की फिल्म

इस फिल्म के शुरुआती सात मिनट नवंबर में यू ट्यूब पर रिलीज किए गए थे. तब से अब तक इसे 10 लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं. फिल्म का बजट शुरुआत में 40 करोड़ रुपये का रखा गया था, लेकिन फाइनल बजट के बारे में वर्मा ने कोई जानकारी नहीं दी है. उन्होंने कहा, "फिल्म असली घटनाओं पर आधारित है. और दिखाया गया है कि लोग कैसे इससे दो चार हुए." खासकर मोहम्मद अजमल कसाब के बारे में "सभी लोगों को पता है कि कसाब को गोली मारी गई थी, लेकिन उसके चेहरे के भाव कैसे थे, यह सबको नहीं पता है."

अजमल कसाब को नवंबर में फांसी दे दी गई थी. राम गोपाल वर्मा कहते हैं कि वह फांसी का इंतजार नहीं कर रहे थे, लेकिन इस कारण उनकी फिल्म को एक अच्छा अंत मिला. कसाब सहित अन्य सभी भूमिकाएं ऐसे कलाकारों ने निभाई हैं जो बॉलीवुड के बड़े नामों में शामिल नहीं हैं. रामगोपाल वर्मा ने सच्चाई के नजदीक बने रहने के लिए किसी स्टार को फिल्म में नहीं लिया.

लियोपोल्ड कैफे में लॉन्च

रामगोपाल वर्मा ने एएफपी समाचार एजेंसी को बताया कि यह फिल्म मुख्य तौर से पुलिस रिपोर्ट और मौके पर मौजूद लोगों के बयान पर आधारित है. इनमें मुंबई के सीएसटी टर्मिनल पर मेवे बेचने वाले नटवरलाल रोटवान भी शामिल हैं, जिन्होंने अपनी बेटी के पैर में गोली लगती देखी. उन्हें जब फिल्म देखने के लिए बुलाया गया तो उन्होंने कहा, "इसमें उन लोगों के लिए सिर्फ दर्द है, जो इस हमले में घायल हुए या फिर जिन्होंने अपने लोगों को खोया."

हमले के कुछ ही दिन बाद रामगोपाल वर्मा के बयान पर काफी बवाल हुआ था कि वह स्थानीय नेता और अपने बेटे के साथ जले हुए ताज होटल के जले हुए हिस्से देखने जा रहे हैं. उन्होंने हमेशा से इस बात का खंडन किया है कि वह तब से फिल्म के बारे में विचार कर रहे हैं. अब वह इस बारे में कोई बहस नहीं करते और कहते हैं कि इस सवाल का जवाब वह कई बार दे चुके हैं.

उन्होंने फिल्म का एल्बम भी उसी लियोपोल्ड कैफे में रिलीज किया था जो हमलों का शिकार हुया थी. वर्मा ने कहा कि लॉन्च कैफे के मालिक के जज्बे को सलाम करने के लिए था. जबकि कई लोग इसे ध्यान खींचने का हथकंडा बताते हैं.

एएम/आईबी (एएफपी)

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