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दुनिया

वजूद बचाने के लिए हिंसा की राह पर गोरखा मोर्चा

पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में बांग्ला भाषा अनिवार्य करने के राज्य सरकार के फैसले पर हिंसा भड़क उठी है. गोरखा जनमुक्ति मोर्चा अपने दशकों पुराने अलग गोरखालैंड बनाने के नारे के साथ एक बार फिर सक्रिय हुआ.

पश्चिम बंगाल का दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र लंबे अरसे के बाद पीक टूरिस्ट सीजन के दौरान एक बार फिर जलने लगा है. वैसे, इसकी सुगबुगाहट तो कुछ महीने से चल रही थी. लेकिन बांग्ला भाषा को अनिवार्य करने के राज्य सरकार के फैसले ने इस आग में घी डालने का काम किया है. करीब 45 साल बाद बृहस्पतिवार को दार्जिलिंग में हुई कैबिनेट की बैठक के दौरान गोरखा जनमुक्ति मोर्चा समर्थकों ने बड़े पैमाने पर हिंसा मचायी. उन्होंने दर्जनों बसों और कारों में आग लगा दी और पथराव किया. पुलिस वालों ने जवाब में हवाई फायरिंग की और आंसू गैस के गोले छोड़े. टूरिस्ट सीजन होने की वजह से पहाड़ियों पर फंसे 10 हजार लोगों को मैदानी इलाकों में पहुंचाया जा रहा है. पुलिस के कथित अत्याचार के विरोध में गोरखा मोर्चा ने शुक्रवार को पर्वतीय क्षेत्र में 12 घंटे का बंद बुलाया है. लेकिन वहां मौजूद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे गैरकानूनी करार देते हुए आंदोलनकारियों से कड़ाई से निपटने की चेतावनी दी है. हालात बिगड़ने के बाद बृहस्पतिवार को देर रात इलाके में सेना उतारनी पड़ी.

विवाद किस पर

वैसे, मोर्चा के विरोध को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सोमवार को ही कह दिया था कि पर्वतीय क्षेत्र में बांग्ला की पढ़ाई ऐच्छिक होगी, अनिवार्य नहीं. लेकिन गोरखा मोर्चा इसके बावजूद सरकार से दो-दो हाथ करने का मन बना रहा है. सरकार के फैसले के विरोध में मोर्चा ने बीते सप्ताह दो दिनों तक इलाके के एक हजार से ज्यादा स्कूलों व कालेजों को बंद रखा था. इससे पहले ममता बनर्जी के मिरिक दौरे के मौके पर मोर्चा ने दार्जिलिंग में एक रैली आयोजित कर ‘ममता गो बैक' के नारे लगाए थे. इसके जवाब में मुख्यमंत्री ने भी मोर्चा की ओर से संचालित गोरखालैंड टेरीटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) के खर्चों का विशेष आडिट कराने की चेतावनी दी थी.

दरअसल, इस विवाद की जड़ें बीते महीने इलाके में हुए नगरपालिका चुनावों में छिपी हैं. ममता की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस ने पहली बार मिरिक नगरपालिका पर कब्जा कर लिया. इससे पहले बीते कोई एक दशक से इलाके की तमाम नगरपालिकाओं पर मोर्चा का एकछत्र राज रहा है. उससे पहले यह कारनामा सुभाष घीसिंग की अगुवाई वाली गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) ने किया था. यह पहला मौका है जब पर्वतीय इलाके में मोर्चा की बादशाहत को चुनौती मिल रही है. इसी वजह से उसका शीर्ष नेतृत्व एक बार फिर गोरखालैंड की अपनी पुरानी मांग की ओर लौटने का प्रयास कर रहा है. अगले महीने जीटीए के चुनाव होने हैं. अपने पैरों तले खिसकती जमीन को बचाने के लिए मोर्चा अपने दशकों पुराने अलग गोरखालैंड बनाने के नारे के साथ एक बार फिर हिंसा की राह पर उतर आया है.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बीते दिनों लगातार इलाके का दौरा करती रही हैं. उन्होंने मिरिक को नगरपालिका का दर्जा देने के साथ ही एक सब-डिवीजन कालिम्पोंग को अलग जिले का दर्जा दे दिया. इससे इलाके में तृणमूल कांग्रेस के पांव मजबूत हो रहे हैं और मोर्चा की बादशाहत को कड़ी चुनौती मिल रही है. कैबिनेट की बैठक के दौरान ही मोर्चा समर्थकों ने अलग-अलग रैलियां निकाली थीं और जम कर हिंसा और आगजनी की. इसमें कई पुलिसवाले भी घायल हो गए. इस हिंसा की वजह से इस पर्वतीय शहर में अफरा-तफरी फैल गयी और पर्यटकों में आतंक मच गया.

बढ़ताटकराव

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जहां आंदोलनकारियों से कड़ाई से निपटने की बात कही है, वहीं गोरखा मोर्चा के प्रमुख विमल गुरुंग ने भी ममता को खुली चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर उनमें हिम्मत है तो वह इस आंदोलन को दबा दें. गुरुंग कहते हैं, "ममता भले बंगाल की मुख्यमंत्री हैं लेकिन पर्वतीय इलाके का मुख्यमंत्री मैं हूं. गुरुंग ने कहा है कि इलाके में सेना की तैनाती और पुलिसिया अत्याचार के मुद्दे पर वह सीधे केंद्र सरकार से बातचीत करेंगे." उनका आरोप है कि पुलिस ने शांतिपूर्ण तरीके से रैली निकाल रहे निहत्थे लोगों पर लाठी चार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े हैं. गोरखा मोर्चा के नेताओं का कहना है कि अब वह अलग गोरखालैंड राज्य से कम पर कोई समझौता नहीं करेंगे. यह महज संयोग नहीं है कि मोर्चा ने अपना आंदोलन उग्र करने के लिए ठीक वह दिन चुना, जब पूरी सरकार दार्जिलिंग में मौजूद थी. इससे साफ है कि अपने वजूद की रक्षा के लिए मोर्चा अब सरकार के साथ आर-पार की लड़ाई पर उतारू है.

इलाके में फंसे पर्यटकों को निकालने के लिए सरकार ने सिलीगुड़ी से कोलकाता के बीच विशेष बसें चलाई हैं. सरकार कुछ एयरलाइंस कंपनियों से विशेष उड़ानों के मुद्दे पर भी बातचीत कर रही है. ममता कहती हैं, "मोर्चा का बंद अवैध है. प्रशासन आंदोलनकारियों से कड़ाई से निपटेगा." वह कहती हैं कि पर्वतीय क्षेत्र में बिना किसी ठोस वजह के हमेशा उपद्रव नहीं चलने दिया जा सकता. इस बीच, गोरखा मोर्चा की राजनीतिक सहयोगी बीजेपी ने पर्वतीय इलाके में शांति बहाल करने के लिए एक सर्वदलीय समिति बनाने की मांग की है. लेकिन सरकार ने इसे नकार दिया है.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि टूरिस्ट सीजन में एक बार हिंसा की राह अपना कर मोर्चा ने भविष्य का संकेत दे दिया है. इससे जहां इलाके की अर्थव्यवस्था की रीढ़ समझे जाने वाले पर्यटन उद्योग को भारी नुकसान होगा, वहीं चाय उद्योग समेत दूसरे उद्योगों पर भी इसका प्रतिकूल असर होगा. एक राजनीतिक पर्यवेक्षक सुनील प्रधान कहते हैं, "पर्वतीय इलाके में तृणमूल कांग्रेस के बढ़ते असर की काट और अपना वजूद बचाने के लिए ही मोर्चा ने हिंसा की राह अख्तियार की है." जुलाई में होने वाले जीटीए के चुनावों से पहले हालात और बिगड़ने का अंदेशा है. पर्यवेक्षकों का कहना है कि मोर्चा नेतृत्व चाहता है कि जीटीए के चुनाव टल जाएं ताकि उस पर उनका नियंत्रण बना रहे.

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