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ब्लॉग

लौह महिला के आंदोलन पर वैधता की मुहर

दिल्ली की एक अदालत के फैसले ने मणिपुर की आयरन लेडी के नाम से मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता ईरोम शर्मिला के डेढ़ दशक से भी लंबे आंदोलन को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है.

मणिपुर में लागू आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट (एएफएसपीए) यानी सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम को खत्म करने की मांग में वर्ष 2006 में दिल्ली के जंतर-मंतर में उनकी भूख हड़ताल के बाद उन पर आत्महत्या की कोशिश का मामला दर्ज हुआ था. लेकिन इस मामले में उनको बरी कर अदालत ने एक तरह से ईरोम के आंदोलन पर कानूनी मुहर लगा दी है. शर्मिला लंबे अरसे से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करने की इच्छा जता रही हैं. लेकिन मोदी ने अब तक उनसे मुलाकात नहीं की है.

शुरूआत

मणिपुर में इस कानून के खिलाफ उन्होंने वर्ष 2000 में अपना अनशन शुरू किया था. इस कानून के तहत सुरक्षा बलों को संदेह के आधार पर किसी को भी गिरफ्तार करने और उसे गोली मारने जैसे असीमित अधिकार हासिल हैं. लेकिन अक्सर इसके दुरुपयोग के मामले ही सुर्खियां बटोरते रहे हैं. नवंबर 2000 में इसी कानून की आड़ में असम राइफल्स के जवानों ने उग्रवादियों से कथित मुठभेड़ के दौरान 10 बेकसूर लोगों को मौत के घाट उतार दिया था. उस घटना के विरोध में ही ईरोम ने अनशन शुरू किया था. सोलह साल लंबी उनकी भूख हड़ताल दुनिया में शायद अपने किस्म की सबसे लंबी हड़ताल है. लेकिन यह आंदोलन एक छोटी-सी मांग भी पूरी नहीं कर सका है.

इस बीच केंद्र से लेकर राज्य में ना जाने कितनी सरकारें बदल गईं और लोहित किनारे वाले ब्रह्मपुत्र में न जाने कितना पानी बह गया, न तो इस आयरन लेडी शर्मिला ईरोम की मांग पूरी हुई और न ही उन्होंने अपना अनशन तोड़ा. इस सप्ताह भी उन्होंने दिल्ली की पटियाला हाउस अदालत में दो-टूक शब्दों में कह दिया कि उक्त अधिनियम वापस लेते ही वे अपनी भूख हड़ताल खत्म कर देंगी. शर्मिला कहती हैं, "मुझे अपने जीवन से बेहद प्यार है. मैं अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए भूख हड़ताल को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रही हूं, जो कोई गुनाह नहीं है." इस लंबी हड़ताल के दौरान उनको दर्जनों बार गिरफ्तार व रिहा किया जा चुका है. लेकिन वे अपनी मांग से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं. इसके लिए उन्होंने अपनी जिंदगी और खुशियों तक को दांव पर लगा दिया है.

सुप्रीम कोर्ट की लताड़

इस साल के शुरू में सुप्रीम कोर्ट ने भी उक्त अधिनियम पर सवाल उठाते हुए पूछा था कि क्या यह अनंतकाल तक लागू रहेगा? क्या 35 साल में इसका कोई असर नहीं हुआ है? सुप्रीम कोर्ट की एक खंडपीठ ने मणिपुर सरकार से कहा था कि यह अधिनियम अस्थायी उपाय के तौर पर लागू किया गया था. लेकिन यह 35 वर्षों से लागू है. तब राज्य सरकार के वकील ने अदालत में दलील दी थी कि राज्य में कानून व व्यवस्था बहाल रखने के लिए यह कानून अब भी जरूरी है.

सरकार का कहना है कि 35 साल पहले जब यह कानून लागू किया गया था तब राज्य में चार प्रमुख उग्रवादी गुट थे. लेकिन अब उनकी तादाद बढ़ कर एक दर्जन से ज्यादा हो चुकी है. हालांकि सरकार ने भी माना है कि इस कानून की आड़ में होने वाली कथित ज्यादतियों के मामले में राज्य में ज्यादा पुलिस रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई है. अदालत ने हैरत जताते हुए पूछा था कि जब इतने लंबे अरसे से सुरक्षा बलों और सेना की मौजूदगी के बावजूद हालात में कोई सुधार नहीं आया है तो इस कानून की जरूरत क्या है.

पूर्वोत्तर के इस उग्रवाद प्रभावित राज्य में सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम हमेशा एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बनता रहा है. चुनावों के समय लगभग हर राजनीतिक दल मणिपुर से इस अधिनियम को हटाने का वादा करता है. लेकिन सत्ता में आने के बाद वह कानून व व्यवस्था की आड़ में असम राइफल्स को बनाए रखने की दलील देने लगता है. ईरोम के सोलह बरस लंबे आंदोलन के बावजूद अब तक किसी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी है. लेकिन यह लौह महिला भी अपना लक्ष्य हासिल करने के प्रति कृतसंकल्प है. इसकी कीमत चाहे उनको अपनी जान देकर ही क्यों न चुकानी पड़े.

ब्लॉगः प्रभाकर

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