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ब्लॉग

लौटा दें लूटी हुई दौलत

हत्या, लूट और बलात्कार - ये तीन कृत्य किसी भी कब्जे का हिस्सा रहे हैं और इस के माध्यम से आज तक लोगों का दमन हो रहा है. ग्रैहम लूकस बता रहे हैं कि इस मामले में इंसान कितना बदला है.

इतिहास की किताब के पन्नों पर नजर डालिए तो आपको रोमन राजाओं, वाइकिंग्स या फिर चंगेज खान जैसे लोगों की कहानियां मिलेंगी जिन्होंने कितने ही लोगों की जमीनें हड़पी हैं, उनके विजय अभियान के दौरान कितनी ही महिलाओं का बलात्कार हुआ है और कितना सारा धन लूटा गया. कई हजार सदियों तक इसे कभी चुनौती नहीं मिली और ना ही इस मामले में न्याय हुआ. आज भी दुनिया में कई जगहों पर ऐसा हो रहा है. किसी तरह का मुआवजा या लूटी हुई वस्तुएं वापस करने के इंतजाम उसके मुकाबले काफी नई बात है.

हाल ही में आई एक अंग्रेजी फिल्म "वुमन इन गोल्ड" में एक ऐसी यहूदी महिला की कहानी है जिसने नाजियों द्वारा लूटी गई परिवार की कीमती पेंटिंग वापस पाने के लिए सालों तक अभियान चलाया. सच्ची घटना पर आधारित इस घटना में लंबे संघर्ष के बाद 2006 में जाकर महिला को उसकी पेंटिंग वापस मिली. इस पेंटिंग को दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद ऑस्ट्रिया के एक म्यूजियम में रखा गया था और अधिकारी उसे देश की राष्ट्रीय धरोहर बता रहे थे.

लूटी हुई चीजें लौटाए जाने का मामला केवल जर्मनी ही नहीं कई यूरोपीय देशों और उनके उपनिवेश रहे देशों से जुड़ा है, जिसमें ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम सभी शामिल हैं. उदाहरण के तौर पर - ब्रिटेन द्वारा 1850 में लूटे गए कोहिनूर हीरे को वापस पाने की भारत की तमाम कोशिशें बेकार साबित हुई हैं. यह 105-कैरट का हीरा ब्रिटेन के लंदन टावर में दूसरे शाही गहनों से साथ प्रदर्शित किया गया है.

ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने भारतीय अनुरोध को ठुकराते हुए कहा था कि ऐसी “वापसी” कोई “ठीक” कदम नहीं होगा. क्या? किसके लिए ठीक? कैमरन ने कहा कि संग्रहालयों की जिम्मेदारी है कि वे इसे जनता के दर्शन के लिए उपलब्ध रखें. कई पूर्वी यूरोपीय देशों ने भी दूसरे देशों से लूटी कलात्मक और पुरातात्विक महत्व की कीमती चीजों को ना लौटाने के पीछे ऐसे ही तर्क दिए हैं.

ब्रिटेन में कोहिनूर से सजा ताज प्रिंस विलियम की पत्नी डचेस ऑफ केमब्रिज कैथरीन को रानी बनने पर पहनाने की योजना है. इन सभी देशों की सोच यही है कि जिन देशों ने ये दौलत लूटी थी केवल वही अब भी उसे संभाल कर रख सकते हैं. आधुनिक समय में ऐसी सोच समझ से परे लगती है. अब वक्त आ चुका है कि पूर्व औपनिवेशिक शक्तियां पुराने वक्त से बाहर निकलें और दौलत को वापस उन्हें ही सौंप दें, जिसकी वह थी. इन सभी बेशकीमती चीजों को असली मालिकों के देश में सार्वजनिक प्रदर्शनियों, संग्रहालयों में रखा जाए और पश्चिमी देशों से पर्यटक वहां जाकर इतिहास की झलकियां देखें. उनका स्वागत ही किया जाएगा.

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