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ब्लॉग

लोकतंत्र और एनजीओ पर बंदिशें

ग्रीनपीस की वरिष्ठ पर्यावरण अभियानकर्ता प्रिया पिल्लै को नई दिल्ली के हवाई अड्डे पर लंदन जाने से रोक दिया गया. कुलदीप कुमार का कहना है कि सरकार की विदेशी निवेश की नीति और विदेशी मदद पाने वाले एनजीओ की नीति में टकराव है.

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और भारतीय प्रेस परिषद के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने एक सप्ताह पहले ही अपने ब्लॉग में कहा था कि उन्हें देश में आंतरिक इमरजेंसी की आहट सुनाई दे रही है. यही नहीं, उन्होंने तो यह भविष्यवाणी भी कर डाली है कि एक साल के भीतर देश में 1975-77 की याद दिलाने वाले इमरजेंसी लग जाएगी और लोकतंत्र, अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों का पूरी तरह से दमन कर दिया जाएगा. जस्टिस काटजू चौंकाने वाली बातें कहने और लिखने के लिए मशहूर हैं, लेकिन उनकी इस आशंका को अतिशयोक्तिपूर्ण तो कहा जा सकता है पर पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता. केंद्र में सत्तारूढ़ नरेंद्र मोदी सरकार के कुछ कदम इस आशंका को पुष्ट करते हैं कि नागरिक अधिकारों और जनांदोलनों के सामने बहुत बड़ा संकट खड़ा होने वाला है.

प्रिया पिल्लै के पास वैध पासपोर्ट और ब्रिटेन का छह माह का वीसा था लेकिन उन्हें तीन घंटे तक इंतजार कराने के बाद बताया गया कि उन्हें विमान में नहीं बैठने दिया जाएगा. प्रिया पिल्लै की लंदन यात्रा का उद्देश्य ब्रिटिश सांसदों के एक समूह को संबोधित करना था और यह जानकारी देना था कि किस तरह भारत में "जंगलों में रहने वाले समुदायों के अधिकारों में कटौती" की जा रही है. एक बयान में पिल्लै ने आरोप लगाया है कि उनके आने-जाने के अधिकार को छीना गया है और उनके साथ ऐसा बर्ताव किया गया मानो वे कोई अपराधी हों.

चार माह पहले ग्रीनपीस के एक ब्रिटिश कर्मचारी को भारत में प्रवेश करने से रोक दिया गया था और उसे वापस लंदन जाने वाले विमान में बिठा दिया गया था. इसके पहले केंद्र सरकार ने जून में ग्रीनपीस को विदेश से मिलने वाले धन पर रोक लगा थी. बाद में एक खुफिया विभाग की रिपोर्ट प्रेस में लीक हो गयी थी जिसके अनुसार ग्रीनपीस भारत में बिजली परियोजनाओं, खनन और जीएम खाद्य के खिलाफ विरोध प्रदर्शन आयोजित करके विकास परियोजनाओं को रोक रही है. एक रिपोर्ट का तो यह भी दावा था कि एनजीओ देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में दो से तीन प्रतिशत गिरावट के लिए जिम्मेदार हैं.

लेकिन इसके साथ ही यह भी सही है कि मोदी सरकार की पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह सरकार का रुख भी एनजीओ क्षेत्र के बारे में कमोबेश ऐसा ही था. जब कुडनकुलम में परमाणु संयंत्र लगाए जाने का भारी विरोध हुआ, तब तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने वर्ष 2012 के आरंभ में आरोप लगाया था कि कुछ एनजीओ विदेशी शह पर भारत को परमाणु ऊर्जा मिलने की राह में रोड़ा अटका रहे हैं. फरवरी 2012 में ततकालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी इसी तरह का बयान दिया था और अगले वर्ष लगभग 4000 गैर-सरकारी संगठनों को विदेश से धन मिलने पर रोक लगा दी गयी थी.

दिलचस्प बात यह है कि स्वयं सरकार का पर्यावरण मंत्रालय गैर-सरकारी संगठनों को अनुदान देने के मामले में भ्रष्टाचार का दोषी पाया गया है. भारत के नियंत्रक-महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने 2010 में अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि मंत्रालय सुनियोजित घोटाले में लिप्त था और उसने बीस वर्षों तक 597 करोड़ रुपये के अनुदान का कोई हिसाब-किताब ही नहीं रखा.

सवाल यह है कि जब रक्षा से लेकर रेल तक हर क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को निमंत्रण दिया जा रहा है, तब केवल एनजीओ क्षेत्र पर ही कैसे यह आरोप लगाया जा सकता है कि वह विदेशी धन से प्रभावित होकर अपनी गतिविधियां चला रहा है. ग्रीनपीस जैसे संगठन जनमत तैयार करने का काम करते हैं. लेकिन विचारों के क्षेत्र में तो शिक्षा और फिल्म भी बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं. तो क्या इनमें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर पाबंदी लगा दी जाए? क्या विदेशी हाथ का हौवा असहमति को दबाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा रहा?

एनजीओ क्षेत्र को विदेश से धन भारतीय रिजर्व बैंक के जरिये आता है. सरकार और उसकी खुफिया एजेंसियों को निश्चय ही उसके स्रोत और इस्तेमाल पर नजर रखनी चाहिए और यदि कोई संगठन अवांछित या देशविरोधी गतिविधि में लिप्त पाया जाए, तो उसके खिलाफ कानून-सम्मत कार्रवाई भी की जानी चाहिए. लेकिन बिना किसी पुख्ता आधार के किसी भी संगठन और उसके कार्यकर्ताओं के कामकाज पर बंदिशें लगाना किसी भी लोकतंत्र में जायज करार नहीं दिया जा सकता.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

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