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ब्लॉग

लॉबियां रोक रही हैं पर्यावरण संरक्षण

भारत में प्रदूषण विकराल समस्या बनता जा रहा है. केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का कहना है कि कृषि और पर्यावरण पर बुरा असर पड़ रहा है. वायु प्रदूषण से स्वास्थ्य खतरे में है, लेकिन लॉबियों के दबाव के सामने सरकार है मजबूर.

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ताजातरीन रिपोर्ट का कहना है कि यमुना और हिंडन नदियां उत्तर प्रदेश की 13 नदियों में सबसे अधिक प्रदूषित हैं. बोर्ड ने देश भर में 275 नदियों का अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि इस प्रदूषण का कृषि और पर्यावरण पर बेहद बुरा असर पड़ रहा है और इस स्थिति के लिए नदियों में औद्योगिक कचरे और जहरीले रसायनों को लगातार छोड़ा जाना और पानी को शुद्ध करने के संयंत्रों का पर्याप्त संख्या में उपलब्ध न होना है. यमुना दिल्ली से होकर उत्तर प्रदेश जाती है और हिंडन दिल्ली से सटे गाजियाबाद से होकर बहती है.

देश की राजधानी दिल्ली में स्थिति इससे बेहतर नहीं, बदतर ही है. यहां की वायु इतनी अधिक प्रदूषित है कि राजधानी में रहने वाले बच्चों का स्वास्थ्य खतरे में है. चार से सत्रह साल तक के बच्चों में फेफड़े से संबंधित दमे जैसी बीमारियों का खतरा देश के अन्य हिस्सों में रहने वाले इसी आयु वर्ग के बच्चों के मुकाबले चार गुना अधिक है. इससे भी अधिक भयावह बात यह है कि इन बच्चों को जो बीमारियां इस उम्र में लग चुकी हैं, वयस्क होने के बाद भी उनका उनसे पीछा छुड़ाना संभव नहीं होगा. लेकिन जिस रिपोर्ट में ये निष्कर्ष सामने लाये गए हैं, उसके बारे में किसी को विशेष जानकारी नहीं है.

अंग्रेजी दैनिक ‘द इंडियन एक्सप्रेस' ने दिल्ली के प्रदूषण पर कई रिपोर्टों की एक श्रृंखला प्रकाशित की है जिससे पता चलता है कि सरकार और उसकी मशीनरी प्रदूषण पर अंकुश लगाने के प्रति कितनी लापरवाह है. पिछले एक दशक से दिल्ली सरकार ने प्रदूषण कम करने के लिए कई कार्य योजनाएं तैयार कीं और उन्हें केंद्र सरकार के पास भेजा, लेकिन अमल किसी पर भी नहीं हुआ. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के कारण ही दिल्ली सरकार बसों और सार्वजनिक परिवहन के वाहनों में सीएनजी का इस्तेमाल अनिवार्य बनाने पर मजबूर हुई थी और उसके कारण कुछ वर्षों तक दिल्ली की हवा की गुणवत्ता में सुधार भी हुआ था. लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि अब स्थिति पहले से भी बदतर हो गई है और सीएनजी के इस्तेमाल से हुआ लाभ मिट्टी में मिल गया है. आज तक सरकार एक ऐसे बाइपास का निर्माण नहीं कर पायी है जिसका इस्तेमाल करके ट्रक बिना दिल्ली में घुसे हुए ही अपने गंतव्य स्थान की ओर निकल जाएं. नतीजतन प्रतिदिन अस्सी हजार ट्रक दिल्ली के बीच से होकर गुजरते हैं. इन ट्रकों में इस्तेमाल होने वाले डीजल में मिट्टी का तेल मिला होता है जिसके कारण इनके इंजन से निकलने वाली गैसें और भी अधिक जहरीली बन जाती हैं.

हाल ही में दिये एक इंटरव्यू में 15 साल तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकी शीला दीक्षित ने बहुत साफ़गोई के साथ स्वीकार किया कि प्रदूषण पर नियंत्रण न हो पाने का एक प्रमुख कारण यह है कि यहां अनेक लॉबियां सक्रिय हैं और इनमें ऑटो निर्माताओं की लॉबी सबसे अधिक प्रभावशाली है. पता चला है कि सरकार द्वारा जारी इस निर्देश का पालन करने में ऑटो निर्माताओं ने असमर्थता जताई है कि 1 अप्रैल से यूरो-4 मानदंडों वाला पेट्रोल मिलना शुरू हो जाएगा क्योंकि उनका कहना है कि वे अभी ऐसे वाहन बाजार में लाने की स्थिति में नहीं हैं जो इन मानदंडों पर खरे उतरते हों.

लॉबियां किस तरह काम करती हैं और कितनी प्रभावशाली हैं, इसका पता इसी बात से चल जाता है कि तंबाकू उत्पादों के बारे में कानूनों पर विचार करने वाली संसदीय समिति के अध्यक्ष और बीजेपी सांसद दिलीप गांधी ने बयान दिया है कि भारत में हुए किसी भी अध्ययन का यह निष्कर्ष नहीं है कि तंबाकू के इस्तेमाल से कैंसर होता है. इस समिति के एक सदस्य इलाहाबाद से बीजेपी सांसद श्यामचरण गुप्ता हैं जिनका कई अरबों का बीड़ी का कारोबार है. तंबाकू उत्पादों के सेवन से न केवल सेवन करने वालों का स्वास्थ्य प्रभावित होता है बल्कि उनके स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है जो बीड़ी-सिगरेट पीने वालों के साथ बैठे हैं, और साथ ही हवा भी प्रदूषित होती है.

यह एक कड़वी सचाई है कि जबानी जमाखर्च के अलावा प्रदूषण कम करने के लिए कुछ नहीं किया जा रहा. विवश होकर अनेक देशों के दूतावासों और उनमें चलने वाले स्कूलों ने वायु को शुद्ध करने वाले संयंत्र लगाने शुरू कर दिये हैं. ऐसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन जिनमें विदेशी काम करते हैं, भी यही एहतियात बरत रहे हैं.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

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