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मनोरंजन

लेखन एक नशा हैः जावेद अख्तर

कवि, गीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख्तर किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. सलीम के साथ उनकी जोड़ी ने अंदाज से लेकर, यादों की बारात, हाथी मेरे साथी, जंजीर, दीवार और शोले समेत ना जाने कितनी सुपरहिट फिल्मों की पटकथाएं लिखी हैं.

इतनी सारी हिट फिल्मों के लिए पटकथा लिखने के बावजूद जावेद अख्तर का फिल्म निर्देशन में हाथ आजमाने का कोई इरादा नहीं है. वह अब सामाजिक कल्याण से जुड़ी गतिविधियों में भी सक्रिय हैं. इसी सिलसिले में कोलकाता आए जावेद ने अपने अब तक के सफर पर डॉयचे वेले के कुछ सवालों के जवाब दिए.

डॉयचे वेलेः आपने लंबे अरसे से कई हिट फिल्मों के लिए पटकथाएं लिखी हैं. अब पीछे मुड़ कर देखना कैसा लगता है?

जावेद अख्तरः वह एक अलग ही दौर था. सलीम साहब के साथ मिल कर मैंने कई पटकथाएं लिखीं और संयोग से उनमें से ज्यादातर हिट रहीं. उस समय पटकथा लेखन के अलावा मेरे पास कोई दूसरा काम भी नहीं था. इसलिए हम लोग उस पर काफी मेहनत करते थे. वही मेहनत रंग लाई.

एक गीतकार के तौर पर आपका आदर्श कौन रहा है?

शैलेंद्र, साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, राजा मेहदी अली खान, भारत व्यास, अनजान और पिता जान निसार खान के अलावा ससुर कैफी आजमी मेरे आदर्श रहे हैं. इन लोगों से मैंने सीखा कि कठिन गीत लिखना तो कठिन है ही, पारदर्शी भाषा में ऐसे आसान गीत लिखना और कठिन है, जो लोगों की जुबान पर चढ़ सकें. हर चीज का एक दौर होता है. लेकिन पहले के गीतकारों के लिखे गीत दशकों बाद आज भी लोगों की जुबान पर हैं.

नई पीढ़ी के गीतकारों के बारे में क्या सोचते हैं?

देखिए, पिछले तीन दशकों के दौरान समाज की प्राथमिकताओं में आमूलचूल बदलाव आया है. समाज में भाषा सिकुड़ रही है. इसके अलावा नए गीतकार अब लेखन में कविता की कला को ज्यादा महत्व नहीं देते. लेकिन यह कला ही गीत लेखन का विज्ञान है. मुझे लगता है कि अस्सी के दशक में बॉलीवुड में सबसे खराब गीत लिखे गए. लेकिन अब युवा पीढ़ी को यह बात समझ में आ गई है और वे इस दिशा में काम कर रहे हैं.

क्या आपने इन दिनों पटकथा लिखना कम कर दिया है ?

नहीं, ऐसी बात नहीं है. मैंने दो पटकथाएं पूरी कर ली हैं. अब उनके लिए मुझे सही निर्देशक और निर्माता का इंतजार है.

Shabana Azmi

शबाना आजमी, वहीदा रहमान, उषा उत्थुप, शर्मिला टौगोर के साथ जावेद अख्तर

आपकी और गुलजार की कविताओं की अक्सर तुलना की जाती है. आप इस बारे में क्या सोचते हैं ?

मैं गुलजार साहब की काफी इज्जत करता हूं. वह अपने आप में एक संस्था हैं. इसलिए उनकी कविता पर टिप्पणी करना मेरे लिए उचित नहीं होगा. मैं हमेशा यही कोशिश करता हूं कि कला की बिलकुल समझ नहीं रखने वाले व्यक्ति को भी कविता आसानी से समझ में आ जाए. अगर लेखन का अर्थ ही आम आदमी की समझ में नहीं आए, तो फिर उस लिखने का अर्थ क्या है. लेकिन कुछ कवि यह बात नहीं समझते. वे अपनी धुन में कविताएं लिखते रहते हैं. लोगों को समझ में आ रहा है या नहीं, इससे उनको कोई मतलब नहीं होता. अस्पष्टता सामान्य अभिव्यक्ति की राह में सबसे बड़ी बाधा है.

आप कई टीवी शो में जज की भूमिका भी निभा चुके हैं. इनके लिए समय कैसे निकाल लेते हैं?

देखिए मैं कभी भी ज्यादा व्यस्त नहीं रहा. सत्तर के दशक की शुरुआत में पटकथाएं लिखते समय मैं लगभग बेरोजगार था और आज भी वही स्थिति है. मैं एक साथ ज्यादा फिल्में हाथ में नहीं लेता. इसलिए सेमिनारों व सामाजिक कार्यों समेत कई अन्य गतिविधियों के लिए मुझे काफी समय मिल जाता है. मैं खुद पर कभी भी काम का ज्यादा बोझ नहीं लादता. इसका फायदा यह है कि हाथ में लिए गए काम पर ज्यादा ध्यान देता हूं और अपना सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास करता हूं.

आपकी पूर्व पत्नी हनी ईरानी फिर लड़का फरहान अख्तर और लड़की जोया अख्तर भी निर्देशक बन चुके हैं. क्या आपका भी निर्देशन में उतरने का कोई इरादा है ?

लेखन एक नशा है और एक बार यह नशा लग जाए तो दूसरी चीजों पर ध्यान केंद्रित करना बहुत मुश्किल है. इसके अलावा लेखन व्यक्ति को आलसी भी बना देता है और इससे दिलचस्प कोई दूसरा काम नहीं लगता. मैंने भी कई बार दूसरा कुछ काम हाथ में लेने के बारे में सोचा है, लेकिन आखिर में कागज कलम की ओर ही झुक जाता हूं. मैं इतना आलसी हूं कि फिल्में नहीं बना सकता.

इंटरव्यूः प्रभाकर, कोलकाता
संपादनः आभा मोंढे

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