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मंथन

लीद से फाइव स्टार कॉफी

हम चाय या कॉफी पी कर तरोताजा महसूस करते हैं. इनकी क्वॉलिटी जितनी अच्छी, दाम उतने ही ज्यादा. लेकिन दुनिया की सबसे महंगी कॉफी बनती है हाथी की लीद से.

खाने पीने में साफ सफाई का सब ध्यान रखते हैं. चाय कॉफी बनाते समय भी हम इस बात का ख्याल रखते हैं कि बर्तन साफ हो, कप गंदा ना हो. तो भला लीद से निकली कॉफी कैसे पी जाती है? हाथी के लीद से बनी कॉफी को लोग बहुत शौक से पी ही नहीं रहे हैं, बल्कि इसके एक प्याले के लिए 50 डॉलर यानी करीब 2,500 रुपये तक खर्च रहे हैं.

यह खास तरह की कॉफी बन रही है थाईलैंड में. चिआंग सेन के गोल्डन ट्राएंगल अभयारण्य में 20 हाथियों को इस काम के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. इन सब को उत्तरी थाईलैंड से बचा कर यहां लाया गया है, जहां इनका शोषण हो रहा था. हर रोज चारे के साथ इन्हें कॉफी के फल भी खिलाए जाते हैं. लाल रंग के ये फल देखने में चैरी जैसे होते हैं और यही पक कर कॉफी बीन की शक्ल लेते हैं.

ब्लैक आइवरी कॉफी

इस अभयारण्य में ये फल अब पेड़ों पर नहीं, बल्कि हाथियों के पेट में पक रहे हैं. पक कर जब वे लीद के साथ निकलते हैं तो उन्हें इकट्ठा कर के रोस्ट होने के लिए बैंकॉक भेजा जाता है. हाथियों के शरीर में कॉफी पकाने का यह अनोखा विचार आया कनाडा के ब्लेक डिनकिन को. डॉयचे वेले से बातचीत में उन्होंने बताया, "जब हाथी खाना पचाते हैं तो एंजाइम की प्रतिक्रिया के कारण प्रोटीन टूट जाते हैं. प्रोटीन कॉफी की कड़वाहट की एक वजह है. कम प्रोटीन यानी कम कड़वाहट वाली कॉफी".

Thailand Elefanten Kaffee

"जब हाथी खाना पचाते हैं तो एंजाइम की प्रतिक्रिया के कारण प्रोटीन टूट जाते हैं.

ब्लेक ने इसे 'ब्लैक आइवरी कॉफी' का नाम दिया है. उन्होंने बताया कि हाथी शाकाहारी होते हैं, इसलिए उनके पेट 'नेचरल फर्मेन्टेशन टैंक' की तरह काम करते है और इस से कॉफी का फल बीज बन कर तैयार हो जाता है. ब्लेक का कहना है कि वह पिछले 10 साल से इस पर काम कर रहे हैं और अब चार लाख डॉलर खर्च करने के बाद उत्पादन शुरू हो पाया है.

बिल्ली के पेट में भी

हालांकि यह पहली बार नहीं है कि जानवरों को इस काम के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. अब तक इंडोनेशिया में ऐसा पाम सिवेट नाम की बिल्ली की प्रजाति के साथ किया जाता रहा है. और यही अब तक की दुनिया की सबसे महंगी कॉफी भी थी. हाल के सालों में इस कॉफी के उत्पादक विवादों के घेरे में रहे हैं.

पशुओं के लिए काम कर रही संस्थाओं का आरोप है कि इन बिल्लियों को पिंजरों में कैद कर के रखा जाता है और उन्हें जबरन कॉफी के फल खिलाए जाते हैं. साथ ही मल में निकली 60 फीसदी कॉफी बेकार होती है. वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) के पेच मनोपवित्र ने डॉयचे वेले से बातचीत में कहा, "हमें इस बात की चिंता है कि इस कॉफी की वजह से दुनिया भर में सेवित बिल्लियां शिकार बन रही हैं. सेवित इंडोनेशिया की एक ऐसी प्रजाति है जो संरक्षित नहीं है, इसलिए लोगों को इस कॉफी के इस्तेमाल से बचना चाहिए".

Symbolbild Koffein

थाईलैंड, दुबई और मालदीव के पांच सितारा होटलों में इस कॉफी का इस्तेमाल किया जा रहा है.

दिन में 250 किलो खाना

पर साथ हीक मनोपवित्र यह भी कहते हैं कि हाथियों की मदद से तैयार की जा रही कॉफी के साथ ऐसा नहीं है और वह इसे देख कर खुश हैं कि हाथियों का पूरा ध्यान रखा जा रहा है. ब्लेक बताते हैं कि वह मुनाफे का आठ फीसदी हिस्सा इस बात को सुनिश्चित करने के लिए खर्चते हैं कि हाथियों का शोषण नहीं किया जा रहा है, "हाथियों के लिए कॉफी सिर्फ एक स्नैक (नाश्ते) जैसी है, यह उनके आहार की जगह नहीं ले सकती. हाथी एक दिन में करीब 250 किलो खाना खाते हैं और उसका एक छोटा सा हिस्सा कॉफी का होता है".

जिन लोगों को इस बात की चिंता सता रही है कि कॉफी में कहीं लीद के अवशेष या फिर गंध ना रह जाए, उनकी चिंता भी ब्लेक यह कह कर शांत करते हैं कि कॉफी को अच्छी तरह धोने के बाद ही रोस्ट करने के लिए आगे भेजा जाता है. कंपनी अब तक 70 किलो कॉफी बेच चुकी है. थाईलैंड, दुबई और मालदीव के पांच सितारा होटलों में इसका इस्तेमाल किया जा रहा है. ब्लेक अब उत्पादन को छह गुना करना चाहते हैं.

मनोपवित्र का मानना है कि जब तक जानवरों के साथ अत्याचार ना हो, तब तक नई चीजें बनाने या उन्हें आजमाने में कोई हर्ज नहीं है. लेकिन इस चिंता को खारिज नहीं किया जा सकता कि यदि उत्पादन औद्योगिक स्तर पर होने लगा तो ध्यान पशु कल्याण में कम और मुनाफे में ज्यादा होगा.

रिपोर्ट: निक मार्टिन/ ईशा भाटिया

संपादन: आभा मोंढे

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