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दुनिया

लिंग परीक्षण के विज्ञापन दिखाने पर सवाल

भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने गूगल जैसे सर्च इंजनों से भ्रूण लिंग परीक्षण वाले विज्ञापन दिखाकर कानून का उल्लंघन करने के आरोप के खिलाफ जवाब मांगा है. सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश साबू मैथ्यू जॉर्ज की जनहित याचिका के जवाब में दिया.

अपनी जन हित याचिका (पीआईएल) में साबू मैथ्यू जॉर्ज ने कहा था कि ये इंटरनेट कंपनियां अभी भी भारत में लिंग परीक्षण के विज्ञापन दिखाकर कानून और व्यवस्था का उल्लंघन कर रही हैं. न्यायाधीश दीपक मिश्रा और आर भानुमति की बेंच ने कंपनियों को आदेश दिया, "इस बारे में निर्देश लेकर वे दो हफ्ते के अंदर हलफनामा दाखिल करें."

जॉर्ज की ओर से दायर इस मुकदमे की पैरवी कर रहे वकील संजय पारिख ने कहा कि दुनिया भर के देशों में अधिकार क्षेत्र और तकनीकी परेशानियों के मुद्दों के बावजूद सर्च इंजनों को इस बात के निर्देश दिए जाते हैं कि उन देशों में जिस प्रकार की जानकारी या सामग्री पर पाबंदी है, उसे वे ब्लॉक कर दें.

सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका दाखिल करने वाले पक्ष को सुनने के बाद कहा, "अंतरिम कदम के तौर पर, ये निर्देश दिए जाते हैं कि जवाबदेह पक्ष यानि गूगल, याहू और माइक्रोसॉफ्ट किसी ऐसे विज्ञापन को प्रदर्शित या प्रायोजित नहीं करेंगे जो 1994 में तय की गई धारा 22 के पीसी-पीएनडीटी कानून का उल्लंघन करें. अगर इस तरह के कोई विज्ञापन इन सर्च इंजनों पर मौजूद हैं तो उन्हें तुरंत हटाया जाए."

जॉर्ज ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि मार्च में अदालत के आदेश के बावजूद गूगल इंडिया, याहू इंडिया और माइक्रोसॉफ्ट कॉर्पोरेशन प्राइवेट लिमिटेड पर लिंग परीक्षण के विज्ञापनों को ब्लॉक नहीं किया गया था. देश में लगातार घट रही लड़कियों की संख्या और मादा भ्रूण हत्या के मामलों को ध्यान में रखते हुए अदालत जॉर्ज की याचिका पर गौर कर रही है. इससे पहले अदालत ने कई राज्यों को मादा भ्रूण हत्या के मामले ना रोक पाने के कारण देश में लिंग अनुपात में आ रही गिरावट के लिए फटकार लगाई थी.

एसएफ/आरआर (पीटीआई)

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