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दुनिया

ला नीना से आई ऑस्ट्रेलिया में विनाशकारी बाढ़

ब्रिसबेन से 125 किलोमीटर दूर तुवुम्बा घाटी में सुनामी के समान भीषण वेग से आ रही पानी की विनाशकारी लहरों से नागरिको को बचाने के ऑस्ट्रेलिया सरकार हरसंभव प्रयास में जुटी है. लेकिन इस बाढ़ की वजह क्या है.

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हालत यह है कि ब्रिसबेन के लोग कारों, बसों और ट्रेनों में सवार होकर भाग रहे हैं. इसके बावजूद इस बाढ़ की चपेट में आकर चार बच्चों समेत 14 लोगों की मौत हो गई है और 90 लोग लापता हैं, जिनकी खोज में सैन्य हेलिकॉप्टर की सहायता ली जा रही है.

क्वींसलैंड प्रांत में आई भारी बारिश से उत्पन्न बाढ़ ने लोकेयर घाटी को पूरी तरह से चपेट में ले लिया. इसकी वजह से कई पेड़ भी उखड़ गए हैं. इस बाढ़ को पिछले सौ सालों के दौरान आई सर्वाधिक भीषण बाढ़ करार दिया जा रहा है.

शहर के मेयर लार्ड कैम्बेल न्यूमैन ने कहा कि ब्रिसबेन नदी के तट टूट दिए जाने के कारण बाढ़ की स्थिति और भयावह हो गई है और शहर के 6500 घरों को नुकसान होने की आशंका है.

बाढ़ के पानी के तेजी से शहर की ओर बढ़ने का भयावह चित्रण करते हुए उन्होंने कहा कि इस बाढ़ से स्थिति लगातार खराब होती जा रही है, अगर पानी इसी रफ्तार से बढ़ता रहा तो आने वाले 2-3 दिन विनाशकारी हो सकते हैं.

बाढ़ की वजह

इस विनाशकारी बाढ़ की वजह 'ला नीना' को बताया जा रहा है. 'अल नीनो' के उलट 'ला नीना' ऐसी मौसमी परिस्थिति है, जो प्रशांत महासागर के पूर्वी भाग से समुद्र के सतह पर पानी के तापमान कम होने की वजह से बनती है. अल नीनो प्रभाव से मौसम जहां गर्म होता है, वहीं ला नीना मौसम को ठंडा कर देता है. इस ला नीना को 50 वर्षों में आया अब तक का सबसे ताकतवर ला नीना माना जा रहा है.

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ऑस्ट्रेलियाई मौसम विभाग ने उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र के मौसम पर जारी अपनी साप्ताहिक रिपोर्ट में कहा कि वर्तमान में दक्षिणी गोलार्ध में ला नीना प्रणाली बेहद ताकतवर है और आने वाले समय में भी इसकी स्थिति ऐसी ही बनी रहने की संभावना है. अगर ऐसा ही चलता रहा तो दक्षिण गोलार्द्ध में गर्मी का मौसम बेहद मुश्किल हो सकता है.

मुसीबतों का अंबार

पिछले कुछ दिनो से जारी प्रकृति के इस भीषण रूप से ऑस्ट्रेलिया की एक प्रमुख नदी फिट्जरॉय अपने तटबंध तोड़ कर शहरों और कस्बों को अपनी चपेट में ले रही है. जर्मनी और फ्रांस जितने बड़े क्षेत्र में फैली इस बाढ़ से करीब 2 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं. उष्णकटिबन्धीय साइक्लोन ताशा से हुई भयंकर बारिश से उपजी इस बाढ़ ने ऑस्ट्रेलिया में बाढ़ का 60 सालों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है.

ऑस्ट्रेलिया में इस बाढ़ से सबसे ज्यादा नुकसान पशुधन का हुआ है. पशु पालकों के भरे-पूरे फार्म इस बाढ़ की चपेट में आकर तबाह हो गए है. एक अनुमान के मुताबिक लाखों मवेशी मारे गए है. इसके अलावा वन्यजीवन को भी अपूर्णीय क्षति हुई है. कंगारू और कोआला की कई प्रजातियां इस क्षेत्र में रहती है जिनके बारे में अभी कुछ पता नहीं चल पाया है.

बाढ़ के पानी से कुछ शहरों में एक नई मुसीबत आ खड़ी हुई है. पानी से बचने के लिए जहरीले

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सांप घरों में घुस रहे है, क्वींसलैंड के कई कस्बों से लोगों को इन सांपो द्वारा डसे जाने के समाचार मिले है. ऑस्ट्रेलिया में सांपो की सबसे जहरीली प्रजातियां पाई जाती है. क्वींसलैंड के सूखे इलाके में पाए जाने वाले वूल्फ स्नैक को दुनिया का सबसे जहरीला सांप माना जाता है. इसके विष का एंटीवैनम अभी तक तैयार नहीं हुआ है. इसके अलावा खारे पानी में रहने वाले विशालकाय मगरमच्छ भी शहरों की पानी भरी सड़कों पर तैरते देखे गए हैं.

अर्थव्यवस्था पर मार

इस बाढ़ से जबरदस्त तबाही हुई है और अभी तक सिर्फ क्वींसलैंड में ही 5 बिलियन डॉलर से अधिक का नुकसान हो चुका है. सड़कें, रेलमार्ग और अन्य संरचनाओं का तो इतना नुकसान हुआ है कि उससे ठीक करने में ही कई साल लग सकते हैं.

इस बाढ़ ने दुनिया भर के स्टील उद्योग को भी झटका दिया है. ऑस्ट्रेलिया दुनिया भर में फर्नेस में लगने वाले कोकिंग कोल का दो-तिहाई उत्पादन करता है पर इस बाढ़ ने कोयला उत्पादन ठप्प कर दिया है. ऑस्ट्रेलिया के सबसे बड़े कोल पोर्ट डालरिम्पेल में कोयले का स्टॉक चुकने लगा है. बाढ़ का पानी खदानों में भर गया है और ऑस्ट्रेलिया के कोयला उत्पादन का 35 प्रतिशत उत्पादन ठप्प हो गया है. ऑस्ट्रेलिया हर साल 259 मिलियन टन कोयला निर्यात करता है जिसका एक बड़ा भाग क्वींसलैंड से आता है.

रिपोर्टः संदीपसिंह सिसोदिया, वेबदुनिया

संपादनः ए कुमार

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