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ब्लॉग

लव जिहाद भी काम न आया

उत्तर प्रदेश में हाल में संपन्न हुए पंचायत चुनावों में कई ऐसे प्रत्याशियों की विजय हुई है जो कथित रूप से लव जिहाद के दायरे में आते हैं. ये नतीजे यूपी की राजनीति में नए समीकरणों की ओर इशारा करते हैं.

चाहे वो शहाबुद्दीन से विवाह करनेवाली सोनी हों या फिर लतीफ से शादी करनेवाली शकुंतला हों. इत्तेफाक से ये दलित युवतियों के मुसलमान युवकों से ब्याह के मामले हैं. चुनाव परिणामों के इस आयाम ने लव जिहाद जैसे जुमलों से समाज को बांटने की कोशिशों को तो धता बता ही दिया है, ये परिणाम उत्तर प्रदेश की राजनीति में नये समीकरण उभरने की संभावना की ओर भी इशारा करता है.

उत्तर प्रदेश के कुल मतदाताओं में दलित मतदाताओं का प्रतिशत 21 है और मुस्लिम मतदाता करीब 18.5 प्रतिशत हैं. ये एक ऐसा राज्य है जिसकी चुनावी राजनीति में जाति और धर्म दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण समझे जाते हैं. उत्तर प्रदेश में 2017 के शुरू के महीनों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. फिलहाल तो पंचायत चुनावों के परिणामों को देखते हुए संभावना जताई जा रही है कि त्रिकोणीय मुकाबला एसपी, बीजेपी और बीएसपी में रहेगा. ऐसे में दलित हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अंतर्समुदाय विवाह और उसकी समाज में स्वीकृति के साथ-साथ राजनीतिक विजय भी बीजेपी के लिये मुश्किल खड़ी कर सकते हैं.

बिहार में करारी हार का कड़वा घूंट पीने के बाद ये तय है कि बीजेपी कोई न कोई मुद्दा उठाकर ध्रुवीकरण की राजनीति की कोशिश करेगी. पुराने अनुभव तो कम से कम यही बताते हैं. सत्तारूढ़ बीजेपी चाहे अपने ही एजेंडे की वजह से या फिर आरएसएस के दबाव में लगातार कोई न कोई हिंदूवादी शिगूफा उछालकर बहुसंख्यकवादी राजनीति कर रही है. इसका एक ही उद्देश्य है अल्पसंख्यकों को असुरक्षित बनाए रखना और अपने हित में हिंदूवादी वोट बैंक खड़ा करना और बढ़ाना. लव जिहाद का नारा देकर कई जगहों पर हिंदू मुस्लिम विवाह करनेवालों को घेरा गया और सांप्रदायिक तनाव फैलाया गया. लेकिन जब खुद बीजेपी के ही कई नेता ऐसे वैवाहिक बंधनों में बंधे हुए निकले तो बगलें झांकने लगे. बिहार के चुनावों के ऐन पहले गौ-मांस पर विवाद को तूल दिया गया मगर ये विवाद भी उनकी चुनावी नैया पार नहीं लगा पाया.

क्या ही अच्छा हो कि नेता जितनी जल्दी हो इस बात को समझ लें कि भारतीय समाज अब पिछड़ी हुई रूढ़ियों से निकल रहा है और शहरों और गांवों में आधुनिक मूल्यों को स्वीकृति मिल रही है. भले ही कई इलाकों में इसकी स्वीकार्यता की रफ्तार धीमी है लेकिन मोटे तौर पर दिखता यही है कि अंततः ये मुद्दे उन्माद का तो क्षणिक घेरा बना लेते हैं लेकिन वोट नहीं दिला पाते. आज भी इस देश में जातीय या साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण या संवेदनशील मुद्दों पर गोलबंदी हो जाती हो लेकिन सड़क बिजली पानी रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतों का स्थान ये मुद्दे नहीं ले पाए हैं. आम जन की अपेक्षाएं रोजी रोटी और घर परिवार से जुड़ी हैं और वोट देते हुए लोगों के जेहन में यही बातें प्रमुख रूप से रहती हैं. ऐसे में लव जिहाद और गौ-मांस जैसी पिछड़ी बातों का अब कोई औचित्य ही नहीं रह गया है.

बीजेपी जैसे दलों को लगता है कि ध्रुवीकरण की राजनीति से उसे चुनावी फायदा होता रहा है लेकिन तात्कालिक नतीजों से दूरगामी पॉलिटिक्स का सफर नहीं तय किया जा सकता है. आप जितनी बार जो जो मुद्दे लाते रहेंगे वे मुद्दे आपको कुछ देर का लाभ भले ही दिला दें लेकिन आगे चलकर वे ही आपके लिए अभिशाप बन सकते हैं. यूपी के लोकल चुनावों के नतीजे यही बताते हैं. और आज जो देश में हिंसा और क्रूरता और वंचितों पर हमलों के सिलसिले बढ़ते दिख रहे हैं वे किसी न किसी फ़ायदे से संचालित नजर आते हैं लेकिन इस पैटर्न की राजनीति भारत जैसे वृहद और विविध लोकतंत्र में कारगर नहीं रह सकती है.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

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