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डीडब्ल्यू अड्डा

लड़कियों की शिक्षा की बड़ी पहल लेकिन राह में कांटे भी

जी20 ने लड़कियों की शिक्षा के लिए ई स्किल का नारा दिया है. सवाल ये है कि भारत में जहां एक तिहाई सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय तक नहीं है, ऐसे में ई स्किल और डिजिटल साक्षरता के मुद्दे कितने प्रासंगिक हैं?

जर्मनी के हैम्बर्ग शहर में हुए इस साल के जी20 के शिखर सम्मेलन में कई बड़े फैसले लिये गये, जिसमें लड़कियों की शिक्षा, तकनीक तक उनकी पहुंच और नौकरियों में उनकी भागीदारी को बढ़ाया जाना प्रमुख मुद्दा रहा. भारत जैसे विकासशील देशों में इंटरनेट के इस्तेमाल में जेंडर गैप के प्रति भी चिंता जताई गयी. इस बात पर भी चर्चा हुई कि विज्ञान-तकनीक के विषय और उन क्षेत्रों में लड़कियों के लिए रोजगार किस तरह उपलब्ध कराये जाएं.

इन सभी मुद्दों पर जी20 देशों ने 2030 तक के लिए लक्ष्य निर्धारित किये हैं, जिसके तहत स्कूली शिक्षा और टेक्नोलॉजी को लड़कियों तक पहुंचाया जाएगा, जिससे वे भविष्य में रोजगार के क्षेत्र में कदम रखने के लिए खुद को और बेहतर रूप से तैयार कर सकें. इसके साथ कोशिश यह भी होगी कि इन क्षेत्रों में महिलाओं और पुरुषों के अंतर को कम किया जा सके.

आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग की लड़कियों की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए अलग से कार्यक्रम शुरू किए जाएंगे, जिससे डिजिटल दुनिया में उनके लिए समान अवसर उपलब्ध हो सकें.

 #eSkills4Girls का नारा

भारत में इस पहल का मकसद देश की शिक्षा व्यवस्था को इस तरह तैयार करना है, जहां डिजिटल साक्षरता पर खास ध्यान दिया जाए. यानी स्कूलों को इतना सक्षम बनाया जाए कि वे लड़कियों को स्कूली शिक्षा के दौरान ही कंप्यूटर, स्मार्टफोन, स्मार्टबोर्ड और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग वगैरह के बारे में बता सकें. 

लड़कियों के लिए ऐसा माहौल तैयार करने पर जोर होगा जहां उन्हें पढ़ाई और काम करने के दौरान लिंग आधारित भेदभाव का सामना न करना पड़े. लिंग आधारित भेदभाव पर बात करने और उसे कम करने के लिए कड़े कदम भी उठाये जाएंगे. इसमें लड़कियों से ऑनलाइन होने वाले उत्पीड़न और लिंग आधारित हिंसा से निपटने पर ध्यान दिया जाएगा. भारत की ऑनलाइन की दुनिया को इस तरह बनाने की कोशिश होगी कि लड़कियां वहां सहजता से पहुंच सकें.

आने वाले वक्त में इंटरनेट की कीमतों को कम करना और छोटे शहरों और गावों तक इसकी पहुंच को बढ़ाने पर भी काम किया जाएगा. 

पहले शौचालय या इंटरनेट

सवाल ये है कि भारत में जहां एक तिहाई सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय तक नहीं है, ऐसे में ई स्किल और डिजिटल लिटरेसी के मुद्दे कितने प्रासंगिक हैं? यह सपना जो दुनिया के अन्य देशों के साथ साथ भारत भी देखना चाह रहा है उसके लिए वह कितना तैयार है?

सैम्पल रजिस्ट्रेशन सिस्टम बेसलाइन सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार भारत के 61 लाख बच्चे अभी प्राइमरी स्कूलों में भी नहीं पहुंच पा रहे हैं, जिसमें लड़कियों की स्थिति तो और भी खराब है. लगभग 22 लाख से भी ज्यादा लड़कियों की शादी कम उम्र में हो जाती है, जिससे उनका स्कूल और आगे की पढ़ाई भी छूट जाती है. 

आवासीय विद्यालयों की स्थिति

आवासीय विद्यालय आदिवासी बच्चों के लिए बनाए गए सबसे बड़े स्कूलों में से हैं. छोटे शहरों या कस्बों में भी स्कूलों की जो भव्य इमारतें हैं वो किसी बड़े प्राइवेट स्कूल जैसी हैं. लेकिन इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के ज्यादातर माता-पिता मजदूरी और खेती-किसानी करने वाले हैं. कई इलाकों में ये बच्चे पहली पीढ़ी के हैं जो बाहर निकलकर पढ़ाई कर रहे हैं.

बहुत से माता पिता के लिए अपने बच्चों को स्कूल भेजना आगे के कुछ सालों तक भोजन और छत का इंतजाम करना है. उनकी स्थिति नहीं कि वे अपने बच्चों की पढ़ाई में मदद कर पाएं, उन्हें कोई सलाह दे पाएं. स्कूलों में बच्चों की काउंसलिंग की भी व्यवस्था नहीं है. स्कूल की बिल्डिंग हैं, चीजों पर पैसा खर्च हो रहा है, लेकिन एक क्लास से मुश्किल से एक बच्चा होता है जो आगे अपना भविष्य बना पाता है.

दूसरी तरफ आवासीय विद्यालयों से लगातार लड़कियों के शोषण की खबरें सामने आती हैं. इस स्थिति में भी लड़कियों के लिए बड़ी मुश्किलें हैं क्योंकि स्कूलों में क्या हो रहा है इस तरह की कोई भी बात माता-पिता तक पहुंच ही नहीं रही है.

बड़ी योजनाओं के लिए है कितनी बड़ी तैयारी?

हालांकि, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है. एक दशक पहले हुए सर्वेक्षण में शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी 55.1 प्रतिशत थी जो अब बढ़ कर 68.4 तक पहुंच गयी है. यानी इस क्षेत्र में 13 फीसदी से अधिक की वृद्धि दर्ज की गयी है.

इन आंकड़ों की एक सच्चाई ये भी है कि भारत में जो भी लड़कियां उच्च शिक्षा या रोगजार के क्षेत्र में पहुंच रही हैं उनमें उनके कड़े संघर्ष शामिल हैं. तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद वे अपनी जगह बना रही हैं और तकनीक और शिक्षा तक पहुंच रही हैं. सबसे बड़ा सवाल यह है वे लाखों करोड़ों लड़कियां, जिनके पास न मौके हैं न सुविधा उन तक तकनीक और शिक्षा सरकार खुद किस तरह पहुंचाएगी?

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