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मनोरंजन

"रोमांचक दौर में हिन्दी सिनेमा"

महज 14 साल की उम्र में मशहूर फिल्मकार सत्यजित रे की फिल्म अपूर संसार से करियर शुरू करने वाली शर्मिला टैगोर ने आगे चल कर कई बेहतरीन किरदार निभाकर हिन्दी फिल्मों में अलग पहचान बनाई. पेश है एक इंटरव्यू.

शक्ति सामंत की फिल्म 'कश्मीर की कली' से हिन्दी फिल्मों में अभिनय की शुरुआत के बाद उन्होंने कभी मुड़ कर नहीं देखा और तब के सुपर स्टार राजेश खन्ना के साथ लगातार आराधना, सफर, अमर प्रेम और दाग जैसी हिट फिल्में दीं. 1960 के दशक में एक फिल्मी पत्रिका के कवर पेज के लिए बिकनी पहन कर फोटो खिंचाने वाली शर्मिला एक कार्यक्रम के सिलसिले में कोलकाता थीं.

डॉयचे वेलेः 14 साल की उम्र में सत्यजित रे जैसे फिल्मकार के साथ फिल्म करते समय कैसा महसूस हुआ?

शर्मिला टैगोरः मैं जरा भी नर्वस नहीं थी. खुद को सत्यजित रे का छात्र मानने की वजह से मैं सामान्य तरीके से वह सब करती रही जो उन्होंने कहा. सेट पर मौजूद अभिनेता सौमित्र चटर्जी ने शूटिंग शुरू होने से पहले पूछा भी था कि क्या मैं नर्वस हूं. मैंने जवाब दिया कि 'एकदम नहीं'. नर्वस क्यों होना है. सत्यजित रे ने उस किरदार के लिए मुझे इसलिए चुना कि मैं उसमें एकदम फिट बैठती थी. मैं एक सीधी सादी युवती के तौर पर सेट पर पहुंचती थी. मुझे पहले से पता नहीं होता था कि क्या करना है.

डॉयचे वेलेः क्या पहली फिल्म के बाद आपने अभिनय को करियर बनाने के बारे में सोचा था?

शर्मिला टैगोरः मैंने कभी अभिनय को करियर बनाने के बारे में नहीं सोचा था. मैं इस फिल्म में काम करने के बाद अपने सामान्य जीवन में लौटना चाहती थी. लेकिन पहली फिल्म में कामकाज का माहौल बेहद अच्छा रहा. उसके पांच साल बाद शक्ति दा की फिल्म में काम करने का मौका मिला और फिर रास्ते खुलते गए.

डॉयचे वेलेः आपने 1960 के दशक में बिकनी पहन कर तहलका मचा दिया था. ऐसा करने वाली आप हिन्दी फिल्मों की पहली हीरोइन थीं. अब सोचने पर कैसा लगता है?

शर्मिला टैगोरः उस समय किसी हीरोइन के लिए पर्दे पर या उससे इतर बिकनी या ऐसे सूट पहनने के बारे में कोई कल्पना तक नहीं कर सकता था. तब समाज की सोच का दायरा काफी संकीर्ण था. मैंने शादी के ठीक पहले वह फोटो शूट किया था. मुझे याद नहीं है कि मैंने बिकनी में फोटो खिंचाने का फैसला क्यों किया. पहले तो मुझे सब कुछ सामान्य लगा. लेकिन बाद में इस पर हंगामा होने पर मुझे झटका लगा. इस मुद्दे की चर्चा संसद में भी हुई थी. वह फोटो बुरी नहीं थी. लोगों की प्रतिक्रयाएं देख कर मैं सावधानी से फिल्मों का चुनाव करने लगी. कुछ वर्षों के भीतर ही लोग मेरे अभिनय को गंभीरता से लेने लगे.

डॉयचे वेलेः सत्यजित रे के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?

शर्मिला टैगोरः सत्यजित रे एक महान फिल्मकार थे. पहली फिल्म में तो मुझे उनका चरित्र समझ में नहीं आया. लेकिन वह एक जीनियस थे और अपने पात्रों से मर्जी के मुताबिक अभिनय कराने में माहिर थे. उनके निर्देशन ने कई कलाकारों की प्रतिभा को निखार दिया. इसी वजह से कई नए कलाकार भी पर्दे पर शानदार अभिनय करते नजर आते थे.

डॉयचे वेलेः बांग्ला और हिन्दी फिल्मों में क्या अंतर महसूस करती हैं?

शर्मिला टैगोरः बांग्ला फिल्में यथार्थ के करीब होती हैं जबकि हिन्दी फिल्मों में कई चीजों का अवास्तिवक चित्रण होता है. मुझे पहली हिन्दी फिल्म कश्मीर की कली में काम करने का अनुभव सत्यजित रे की फिल्म के मुकाबले एकदम अलग था. रे की फिल्म के सेट पर हम घंटों बातचीत करते थे. कहीं कोई हड़बड़ी नहीं होती थी. लेकिन हिन्दी फिल्मों की शूटिंग के समय हमें हर काम जल्दी निपटाने को कहा जाता था. हिन्दी फिल्में वास्तविकता से भले अलग हों, लेकिन उसे वास्तविक दिखाने के लिए अभिनय की प्रतिभा जरूरी है.

डॉयचे वेलेः आपके दौर के मुकाबले अब हिन्दी फिल्मों में महिलाओं के प्रति नजरिया कितना बदला है?

शर्मिला टैगोरः हमारे दौर में ज्यादातर फिल्मों में हीरोइनों का किरदार मिलता जुलता होता था. तब महिलाओं के लिए अभिनय को अच्छे नजरिए से नहीं देखा जाता था. महिलाओं को गृहिणी समझा जाता था और शादी के बाद उनको कोई काम नहीं मिलता था. अब फिल्मों में महिलाओं की भूमिका सजावटी वस्तुओं से ज्यादा अहम हो गई है. अब हीरोइन प्रधान फिल्में बनने लगी हैं. अच्छे घराने की लड़कियां भी अभिनय के पेशे में आ रही हैं. फिल्म उद्योग में यह एक लोकतांत्रिक बदलाव है. अब हीरोइनें सिगरेट व शराब पीती हैं और लिव इन रिलेशन बनाती हैं. पहले इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती थी.

डॉयचे वेलेः आप लंबे अर्से तक फिल्म सेंसर बोर्ड की अध्यक्ष रही हैं. इस दौरान बोर्ड के नजरिए में क्या बदलाव आया है?

शर्मिला टैगोरः मेरे कार्यकाल में फिल्मों की रेटिंग के मामले में बोर्ड का नजरिया कुछ उदार हुआ. उस समय फिल्मों की रेटिंग से पहले कई पहलुओं का ध्यान रखना होता था. अब युवा निर्माता कई ऐसे संवदेनशील मुद्दों पर भी फिल्में बना रहे हैं, जिनको पहले सामाजिक वर्जना के दायरे में रखा जाता था. भारतीय सिनेमा अब अपने सबसे रोमांचक दौर से गुजर रहा है.

डॉयचे वेलेः टाइगर पटौदी के जाने के बाद जीवन में क्या बदलाव आया है?

शर्मिला टैगोरः टाइगर के जाने के बाद जीवन पूरी तरह बदल गया है. हम 47 साल तक साथ थे. इनमें से 43 साल हम पति पत्नी के तौर पर रहे. उनकी कमी तो खलती है, लेकिन मुझे अब भी भरोसा नहीं होता कि वह मुझे छोड़ कर चले गए हैं. जीवन में जब भी मैं अनिर्णय की स्थिति में होती वह चुटकी में उसका समाधान कर देते थे. उनकी कमी हमेशा खलेगी.

डॉयचे वेलेः हिन्दी फिल्मों में उम्रदराज हीरोइनों को मां से आगे की भूमिका क्यों नहीं मिलती?

शर्मिला टैगोरः अब एकाध ही ऐसी फिल्में बनती हैं, जिनमें उम्रदराज हीरोइनों को मुख्य भूमिका में रखा जाता है. इसकी वजह बाजारवाद और लोगों के मन में बनी यह धारणा है कि उम्रदराज हीरोइनें दर्शकों को नहीं लुभा सकतीं. यहां अब भी हीरो को ही फिल्मों की कामयाबी का आधार समझा जाता है. ऐसे में महिलाओं के लिए मां या सास की भूमिका ही बचती है. अंतरराष्ट्रीय निर्देशक इस अवधारणा को तोड़ते हुए ऐसी फिल्में बना रहे है जिनमें महिला किरदारों के लिए प्रभावी जगह होती है. वहां ऐसी फिल्में काफी कामयाब भी हो रही हैं.

इंटरव्यूः प्रभाकर, कोलकाता

संपादनः ए जमाल

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