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ब्लॉग

रैंकिंग की चपेट में उच्च शिक्षा संस्थान

उच्च शिक्षा के उत्थान के लिए 'श्रेष्ठ संस्थान' नाम की योजना प्रस्तावित है. सार्वजनिक और निजी सेक्टर से दस-दस विश्वविद्यालय चुने जाएंगे. लक्ष्य विश्व रैकिंग में लाने का है. टॉप सूची में आ जाना क्या गुणवत्ता की गारंटी है?

कैबिनेट सचिव, उच्च शिक्षा सचिव और यूजीसी के चेयरपर्सन समेत ज्ञान-विज्ञान की 5-6 शख्सियतों की कोर कमेटी बनाई जाएगी. यही कमेटी 'श्रेष्ठ' संस्थानों का चयन करेगी. बिल को संसद की मंजूरी मिलने के बाद, बताया गया है कि अगले साल अप्रैल तक प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी. 'इंस्टीट्यूशंस  ऑफ एमिनेंस' की सर्च कमेटी का गठन होते ही दावेदार संस्थानों से अर्जियां मंगवाई जाएंगी. कुल बीस संस्थान चुने जाएंगें. जिनमें से दस निजी सेक्टर के होंगे. दस सार्वजनिक संस्थान होंगे जिन्हें पांच साल की अवधि में 1000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त ग्रांट भी दी जाएगी. चुने गए संस्थानों को फैकल्टी और विद्यार्थियों के बीच शुरुआती पांच साल में 1:15 का अनुपात रखना होगा, आगे यह 1:10 होगा, 15 वर्षों में 15-20 हजार छात्रों का दाखिला करना होगा. आखिरी लक्ष्य यही है कि चयनित उच्च शैक्षणिक संस्थानों को 10-15 साल में, विश्व के टॉप 100 या टॉप 500 संस्थानों में जगह मिल सके.

स्मार्ट सिटी जैसा प्रोजेक्ट?

उच्च शिक्षा कल्याण का यह इरादा लुभावना है, इसके लिए पर्याप्त होमवर्क भी हुआ होगा - कह नहीं सकते. क्योंकि गुणवत्ता सुधार का यह अभियान कुछ कुछ स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट जैसा लगता है जिसके तहत देश के चुनिंदा शहरों का कायापलट होना है. इससे शैक्षिक संस्थानों में पहले से व्याप्त ढांचागत असमानता और असंतुलन की खाई और बढ़ेगी. श्रेष्ठ बनाने की प्रक्रिया के तहत बेशक कई उपाय होंगे. क्या जेएनयू जैसे संस्थानों की स्वायत्तता बनी रहेगी? नियुक्तियों से लेकर अध्ययन, अध्यापन, शोध कार्य की गुणवत्ता में सुधार के लिए इन चयनित संस्थानों में कौनसा निगरानी सिस्टम काम करेगा? इस देश में जहां उच्च शिक्षा, उपाधियां अर्जित करने का एक आसान जरिया बन गया है, वहां जब श्रेष्ठता चयन की बात आई, तो निजी शैक्षणिक संस्थानों को इसमें जगह दी जा रही है. क्या उनके पास पहले से वे तमाम संसाधन, स्पेस और वे प्रचुर चुस्त मशीनरी नहीं है जिसकी दरकार आज भी सरकारी कॉलेजों और संस्थानों को रहती है? फिर उन्हें श्रेष्ठ बनाने की ऐसी विकलता समझ नहीं आती. शिक्षा कोई निजी मिल्कियत नहीं है, यह सार्वजनिक उन्नति का विचार है. निजी और सार्वजनिक में बराबर बंटवारे की यह अवधारणा, सरकारों की मंशा पर सवाल खड़ा करती है कि आखिर शिक्षा में निजी क्षेत्र का दखल उन्हें कितना स्वीकार्य है.

गिनती के संस्थान ही क्यों?

भारत में इस समय करीब 800 विश्वविद्यालय, 39,000 कॉलेज, 12,000 संस्थान और सालाना करीब साढ़े तीन करोड़ छात्र हैं. अब इस विराट ढांचे में से 20 संस्थान चुनकर, उन पर सारी ऊर्जा खपा देने का औचित्य समझ नहीं आता. ज्यादा ठीक तो यह होता कि एक तय कार्यक्रम के तहत केंद्र और राज्यों के स्तर पर उच्च शिक्षा विभाग के ढांचे में सुधार किया जाता, यूजीसी को अकेली सर्वमान्य और अंतहीन शक्तियों वाली संस्था बनाने के बजाय एक विकेंद्रित, पारदर्शी संस्था बनाने की दिशा में काम होता और विश्वविद्यालयों में भाईभतीजावाद खत्म होता और कुलपतियों की नियुक्तियों में राजनैतिक दखल और दबाव बंद होते. अगर आप कथित रूप से देश को एक सूत्र में पिरोने के लिए आधार कार्ड की अनिवार्यता का ऐड़ी-चोटी जोर लगा सकते हैं, तो क्या उच्च शिक्षा में एक एक यूनिवर्सिटी को लेकर आपके पास संसाधनों और क्षमताओं की कमी पड़ जाती है? क्यों नहीं झोंक देने के स्तर पर काम किया जाता? और क्यों राजनैतिक दल और सरकारें परस्पर आरोपों और हमलों से पूरी कार्य संस्कृति को ही छलनी करते आ रहे हैं?

अपने पैरों पर कुल्हाड़ी

एक बुनियादी बात इस सारी बहस में यह है कि आखिर हम रैकिंग में आने के लिए छटपटा ही क्यों रहे हैं? क्या निवेश ही एकमात्र लक्ष्य है, या प्रतिष्ठा? अगर प्रतिष्ठा की बात है, तो वह किसी रैकिंग में आए बिना भी हासिल की जा सकती है. क्या जो किसी तरह की रैकिंग से बाहर हैं, किसी भी तरह की टॉप कहलाने वाली देसी-विदेशी सूचियों से बाहर हैं, क्या उन्हें बंद हो जाना चाहिए या नहीं रहना चाहिए? असल में ये टॉप या श्रेष्ठता की अवधारणा ही शिक्षा जैसे मानवीय और नागरिक अधिकार को जनता से दूर करने की एक अभिजाती और कुलीन परियोजना, कॉरपोरेट और सत्ता राजनीति की मिलीभगत और विराट मुनाफे के लिए मारकाट करते वैश्विक अर्थतंत्र की उपज है. क्या आप जानते हैं कि दुनिया में टॉप 100 आंके जाने वाले विश्वविद्यालय, कुल उच्च शिक्षा संस्थानों के सिर्फ 0.5 प्रतिशत और कुल छात्र संख्या के 0.4 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं? और यह भी जान लीजिए कि टॉप 100 या 200 में से अधिकांश विश्वविद्यालय, बड़े अमीर देशों में स्थित हैं, खासकर अमेरिका और ब्रिटेन में. तो ऐसे में रैंकिंग की होड़ में पड़ना, अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की तरह लगता है.

जैसे स्वास्थ्य एक मानवीय मूल्य है, वैसा ही शिक्षा भी है. श्रेष्ठता का मूल्यांकन बाजार केंद्रित पैमानों से नहीं होगा. इसमें श्रेष्ठतम की उत्तरजीविता और श्रेष्ठता ग्रंथि की ध्वनि है. शिक्षा, पांच सितारा उद्यम नहीं, बल्कि सभ्य, सुसंस्कृत और समझदार नागरिकों की निर्माण प्रक्रिया का उद्यम है. देश को खुद्दार, शिक्षित और विवेकपूर्ण युवा नागरिक चाहिए, अपनी शैक्षिक उपाधियों और सफलताओं में इठलाता और ज्ञान के अहंकार में भटका हुआ युवा नहीं.

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