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मंथन

रेत पर हरियाली रोपता मिस्र

रेतीला मिस्र हरियाली की मिसाल पेश करने जा रहा है. वहां गंदे पानी को रिसाइकिल कर रेगिस्तान में छिड़का जा रहा है. योजना है कि रेगिस्तान से 5,000 वर्ग किमी जमीन छीनी जाए और उस पर जंगल लहलहा दिया जाए.

काहिरा से दो घंटे की दूरी पर बसा इस्माइलिया शहर. यहां का तपता रेगिस्तान, जिंदगी के लिए एक दुश्वार जगह है, लेकिन अब रेत के सीने को हरा भरा करने की तैयारी हो रही है. ड्रिप सिंचाईं तकनीक से रेगिस्तान में पेड़ रोपे जा रहे हैं. रिसर्चर चीड़ के पेड़ लगा रहे हैं. ये बहुत कम पानी में भी खड़े हो जाते हैं.

जंगल बसाने का ये प्रोजेक्ट जर्मनी और मिस्र की साझा योजना है. दोनों देशों के छात्र इसमें मदद कर रहे हैं. म्यूनिख तकनीकी यूनिवर्सिटी के छात्र सेबास्टियान रासेल भी इसी सिलसिले में इस्मालिया पहुंचे हैं. उन्हें यहां हरियाली की बेहतर संभावनाएं नजर आती हैं, "जर्मनी के उलट बड़ा फायदा ये है कि यहां पौधे का विकास रोक देने वाली कड़ाके की सर्दी नहीं पड़ती. दूसरा, यहां कुछ ऐसी प्रजातियां है जो बड़ी तेजी से बढ़ती हैं, जैसे यूकेलिप्टस. मुझे लगता है कि कुल मिलाकर यहां जिस तरह पौधे उगते हैं, ये गजब का है."

रेत की प्यास बुझाई

लेकिन वृक्षारोपण अभियान के तहत लगाए जा रहे पौधों को पेड़ में बदलने के लिए पानी जरूरी है. मिस्र में बहुत ही कम बारिश होती है, लिहाजा सिंचाईं का बढ़िया इंतजाम करना अनिवार्य शर्त है.

हानी अल कातेब उन लोगों में से हैं जिन्होंने इस प्रोजेक्ट को खड़ा किया है. मिस्र के इस वन विशेषज्ञ ने म्यूनिख टेक्निकल यूनिवर्सिटी से वन विज्ञान की पढ़ाई की. साल में कई बार कातेन अपने घर का चक्कर लगाते हैं और प्रोजेक्ट पर बारीक नजर बनाए रखते हैं. उन्होंने खास तरह का सिंचाई तंत्र भी विकसित किया है. कातेब कहते हैं, बूंद बूंद करके यहां लगातार "पानी के पाइप से सिंचाई होती हैं. इसके बिना सारे पौधे मर जाएंगे."

बूंद बूंद बहुमूल्य

सिंचाईं के लिए पानी पास के वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट से आता है. प्लांट में इस्माइलिया शहर का गंदा पानी आता है. यहां पानी से धूल, कंकड़, रसायन और कीटाणु साफ किए जाते हैं. इसे पीने लायक साफ करना बहुत महंगा पड़ेगा, लिहाजा यहां पानी में नाइट्रोजन तत्वों को रहने दिया जाता है. नाइट्रेट पौधों के लिए आदर्श खाद का काम करता है.

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सिंचाई के लिए खास तकनीक का इस्तेमाल

फल सब्जियों की खेती के लिए ये पानी पूरी तरह साफ नहीं, लेकिन निर्माण कार्य या लकड़ी की खेती के लिए इससे सिंचाईं करने में कोई हर्ज नहीं है. ऐसा करने से पानी की बर्बादी बचेगी और रेगिस्तान का विस्तार भी थमेगा. ऐसी खेती से रोजगार भी पैदा हो सकेगा. पर्यावरण के लिहाज से तो ये अच्छा है ही.

मिस्र में तेजी से बढ़ती आबादी की वजह से उपजाऊ जमीन कम होती जा रही है. ऊपर से पानी की आपूर्ति एक और बड़ा सिरदर्द है. सरकार भी इससे वाकिफ है. कृषि मंत्री सईद खलीफा को भविष्य की कुछ और चिंताएं परेशान कर रही हैं, "अभी हम बहुत दवाब में हैं. इथियोपिया नील नदी पर एक और बांध बनाने की योजना बना रहा है. हमारे लिए इसका मतलब है कि मिस्र तक आते आते नील का पानी और कम होगा. इस वजह से हमें पानी बचाने या उसे रिसाइकिल करने के नए रास्ते खोजने होंगे. पानी के बार बार इस्तेमाल से क्या किया जा सकता है, ये जंगल इसका बढ़िया सबूत है."

ज्ञान और तकनीक की साझीदारी

इस साझा रिसर्च प्रोजेक्ट के लिए जर्मनी ने 2,60,000 यूरो की मदद दी है. इस रकम से मिस्र और जर्मनी के उन छात्रों की मदद की जाती है जो एक दूसरे के देश में शोध करते हैं.

सेबास्टियान इससे काफी प्रभावित हैं. उन्हें यहां काफी कुछ सीखने को मिला है, "यहां पहले सिर्फ रेगिस्तान था. ये हैरान करने वाला है कि रेगिस्तान में एक जंगल बसाया जा सकता है. विश्व में ऐसे कई इलाके हैं जहां ऐसे ही हालात हैं, सामाजिक और प्राकृतिक लिहाज से. मुझे लगता है कि यहां का ये प्रोजेक्ट दूसरे इलाकों के लिए अहम साबित होगा."

240 हेक्टेयर, यानी फुटबॉल के करीब 300 मैदानों जितनी जमीन. रेगिस्तान से छीनी गई इस जमीन पर आज हरियाली झमझमा रही है. कोशिश है कि आने वाले सालों में पांच लाख हेक्टेयर रेगिस्तान को भी पेड़ों की छांव से ठंडा किया जाए.

मिस्र में हर साल 6.3 अरब घन मीटर पानी सीवेज का हिस्सा बन जाता है. अगर इसे साफ किया जाए तो ये 9 लाख हेक्टेयर पर फैले जंगलों की सिंचाईं के लिए पर्याप्त होगा. जंगल से आबोहवा साफ होगी, जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई भी जारी रहेगी और धीरे धीरे फैलती हरियाली मिस्र के दूसरे प्राकृतिक उपहार भी लाएगी.

रिपोर्ट: फ्लोरियान नुश/ ओंकार सिंह जनौटी

संपादन: मानसी गोपालकृष्णन

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