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ब्लॉग

रूस नीति पर पश्चिम की बेबसी

जर्मन अंगेला मैर्केल और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर सहमत नहीं है, लेकिन फिर भी उन्होंने यूक्रेन विवाद में एकजुट होने पर जोर दिया. डीडब्ल्यू के गेरो श्लीस का कहना है कि यह एक मुश्किल सबंध है.

यूक्रेन को हथियार की सप्लाई के मुद्दे पर असहमति के बावजूद चांसलर मैर्केल और राष्ट्रपति ओबामा ने साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में एकता का प्रदर्शन किया और इस बात पर जोर दिया कि रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन के खिलाफ मोर्चा एकजुट है. बौद्धिक बारीकियों पर जोर देने वाली भौतिकशास्त्री मैर्केल को पता होना चाहिए कि दोनों संभव नहीं है. लेकिन राजनीतिज्ञ मैर्केल के पास उस स्थित की तैयारी करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है, यदि राष्ट्रपति यूक्रेन की सेना को जरूरी हथियारों की आपूर्ति करने का फैसला लेते हैं.

ओबामा और मैर्केल को किसी को बेवकूफ बनाने की जरूरत नहीं है. रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने पश्चिमी सहबंध में बारीक दरार को बहुत पहले भांप लिया है और वे इसका इस्तेमाल करना जानते हैं. वे अमेरिका और यूरोप को धीरे धीरे एक दूसरे से दूर ले जाने की कोशिश करेंगे. हालांकि अमेरिका और यूरोप की सहमति पहले से कहीं ज्यादा जरूर है. न सिर्फ रूस के खिलाफ चल रहे विवाद में बल्कि इस्लामी कट्टरपंथी इस्लामी स्टेट के खिलाफ चल रहे संघर्ष, ईरान के साथ परमाणु विवाद में, मध्यपूर्व विवाद में और इफगानिस्तान में शांति लाने के प्रयासों में. दुनिया ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद शायद ही पहले कभी इतने सारे खतरनाक विवाद देखे हैं. और हर कहीं अमेरिकियों और यूरोपीयनों को एक दूसरे की जरूरत है. ऐसे में सहमति और सक्षम संकट प्रबंधन जीवन बीमा की तरह है.

मैर्केल की जिम्मेदारी

लेकिन ओबामा के घरेलू विरोधियों को इसकी चिंता नहीं है. सीनेटर जॉन मैक्केन के नेतृत्व में उन्होंने एक बार फिर राष्ट्रपति को फैसला लेने में कमजोर बताया है, जो सीरिया और इराक के बाद एक और विवाद में अमेरिका के दुश्मनों को बेशर्म हरकतें करने दे रहा है.और वे अंगेला मैर्केल के रूप में एक विदेशी सरकार प्रमुख के साथ रूखा बर्ताव करने से भी पीछे नहीं रहे हैं. हालांकि वे इस बात का जोखिम उठा रहे हैं कि अमेरिकी और यूरोपीय रूस के साथ अलग अलग आवाज में बात करें.

लेकिन जरूरी नहीं कि बात उस हद तक जाए. अंगेला मैर्केल को अमेरिका में ऐसा नेता के रूप में जाना जाता है जिसने यूरोप को रूस विवाद में इकट्ठा रखा है. उन्होंने जर्मनी को फिर से अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मंच पर वापस पहुंचाया है. वे महत्वपूर्ण हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति के पास अब वह टेलिफोन नंबर है जिसकी कमी हेनरी किसिंजर काफी दिनों से महसूस कर रहे थे, जिस पर फोन कर वे यूरोप के सबसे महत्वपूर्ण नेता के साथ बात कर सकते हैं. यह नंबर चांसलर कार्यलय का है. यह अटलांटिक पार के मैर्केल विरोधियों को भी प्रभावित कर सकता है.

वैकल्पिक योजना

लेकिन सारी मजबूती के बावजूद, यूक्रेन विवाद के इस दौर में चांसलर खास तौर पर संवेदनशील हैं. उन्होंने अपनी ताजा कूटनीतिक पहल के साथ एक जोखिम उठाया है. ओबामा ने उसका लिहाज रखा है. मिंस्क में होने वाले चार पक्षीय शिखर भेंट तक यूक्रेन को हथियारों की आपूर्ति को रोकने के फैसले को दूसरी तरह नहीं समझा जा सकता. यदि शिखरभेंट विफल हो जाती है तो हथियारों की सप्लाई पर गंभीरता से विचार किया जाएगा. पहले की तरह इंतजार और प्रतिबंधों की नकेल को थोड़ा और कसने को पुतिन कमजोरी का संकेत समझेंगे. यूक्रेन में पैदा हो रही मानवीय स्थिति में ऐसा करना नैतिक नहीं होगा.

लेकिन चुप रहा जाए या सख्ती दिखाई जाए. आखिरकार यह एक ऐसा फैसला है जो रूस पर नई रणनीति का हिस्सा होना चाहिए. पुतिन का साथ किस तरह पेश आया जाए? एक ऐसे देश के साथ कैसे पेश आया जाए जो युद्ध के बाद की व्यवस्ता की नई व्याख्या करना चाहता है, एक नए राष्ट्वाद से प्रभावित है और आधुनिकीकरण से इंकार कर रहा है? रूस को समझनेवाली मैर्केल ने भी अब समझ लिया है कि उनके पास फिलहाल इसका खोई जवाब नहीं है. इसलिए यूक्रेन को हथियार देने का सवाल भी बेबसी दिखाता है. वह और कुछ नहीं विफलता की स्वीकारोक्ति है, कूटनीति की और विवेक की.

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