रूस ′नहीं चाहता′, भरभरा कर गिर जाये उत्तर कोरिया | दुनिया | DW | 05.12.2017
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

रूस 'नहीं चाहता', भरभरा कर गिर जाये उत्तर कोरिया

एक तरफ अमेरिका उत्तर कोरिया को होने वाले तेल निर्यात पर ज्यादा से ज्यादा पाबंदियां लगाने की मांग कर रहा है, वहीं रूस शायद नहीं चाहता है कि उत्तर कोरिया में व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो जाए.

रिपोर्टों के मुताबिक उत्तर कोरिया में पिछले महीने डीजल और गैसोलीन के दामों में बड़ी कमी देखने को मिली. बताया जाता है कि उत्तर कोरिया में किम जोंग उन की सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग थलग करने की कोशिशों के बावजूद रूस उसे दी जाने वाली अपनी सहायता बढ़ा रहा है. अंतरराष्ट्रीय समुदाय चाहता है कि उत्तर कोरिया अपने परमाणु हथियार और लंबी दूरी की मिसाइलें बनाने के कार्यक्रम को छोड़े.

जापान पहुंचती "भूतिया नावें"

अमेरिका ने कहा, जर्मनी तोड़े उत्तर कोरिया से रिश्ते

जापान के ओसाका में स्थित एशिया प्रेस इंटरनेशनल (एपीआई) के लिए उत्तर कोरिया के भीतर होने वाली गतिविधियों पर खबरें भेजने वाले "सिटिजन जर्नलिस्ट्स" का कहना है कि महीनों के उतार चढ़ाव के बाद नवंबर में दाम गिरने शुरू हो गये. रिपोर्टों में कहा गया है कि एक किलोग्राम डीजल के दाम उत्तर कोरिया में अब 0.82 अमेरिकी डॉलर हैं जो नवंबर के शुरुआती दामों से 60 फीसदी कम हैं. वहीं गैसोलीन 2 डॉलर प्रति किलो के हिसाब से बेची जा रही है. गैसोलीन के दामों में भी 25 प्रतिशत की गिरावट देखी गयी है.

एपीआई के एक संवाददाता का कहना है कि रूस से लगने वाले उत्तर कोरिया के यांगांग प्रांत में बड़ी मात्रा में ईंधन आ रहा है. टेंपल यूनिवर्सिटी के टोक्यो कैंपस में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के एसोसिएट प्रोफेसर और रूस-उत्तर कोरिया व्यापार के विशेषज्ञ जेम्स ब्राउन कहते हैं, "यह जान पाना बहुत मुश्किल है कि उत्तर कोरिया में कितना ईंधन आ रहा है, लेकिन यह जरूर लगता है कि रूस ने हाल में उत्तर कोरिया को ईंधन सप्लाई किया है."

वीडियो देखें 02:17

उत्तर कोरिया में देशभक्ति सीखना बहुत जरूरी है

वह कहते हैं, "ऐसा लगता है कि रूस के साथ चीन भी अमेरिका के साथ संयंम खोता जा रहा है. उन्हें लगता है कि उत्तर कोरिया पर दबाव डालने के मामले में उन्होंने अपनी तरफ से जितना हो सकता है, किया लेकिन अमेरिका को इस मामले में ज्यादा योगदान करना चाहिए."

ब्राउन कहते हैं कि रूस और चीन ने भी उत्तर कोरिया पर लगे प्रतिबंधों का समर्थन किया था और उत्तर कोरिया ने दो महीनों तक कोई परीक्षण भी नहीं किया. इसके बावजूद अमेरिका ने ऐलान किया कि वह दक्षिण कोरिया के साथ अपना हवाई युद्ध अभ्यास तय समय पर करेगा.

अमेरिका और द. कोरिया का सबसे बड़ा युद्धाभ्यास

ट्रंप ने उत्तर कोरिया के नेता को 'बीमार पिल्ला' कहा

अमेरिका के इस सबसे बड़े युद्धाभ्यास में 230 विमानों ने उत्तर कोरिया के परमाणु प्रतिष्ठानों और मिसाइल ठिकानों पर बमबारी का अभ्यास किया. इससे भड़के उत्तर कोरिया ने मिसाइल परीक्षण फिर शुरू कर दिये. नवंबर में उत्तर कोरिया ने 13 हजार किलोमीटर दूर तक मार करने वाली मिसाइल का सफल परीक्षण करने का दावा किया जो अमेरिका में कहीं भी मार कर सकती है.

ब्राउन कहते हैं, "रूस को शायद लगता होगा कि अमेरिका के भड़काने पर ही उत्तर कोरिया ने यह मिसाइल परीक्षण किया. यह भी साफ नहीं है कि चीन और रूस उत्तर कोरिया को ईंधन सप्लाई रोकने में मदद करेंगे या नहीं. इसका मतलब होगा कि फिर उत्तर कोरिया के पास सिर्फ परमाणु ऊर्जा का विकल्प होगा जो उसे और नुकसान पहुंचाएगा."

ब्राउन के मुताबिक, "और अमेरिका यही चाहता है लेकिन रूस उत्तर कोरियाई व्यवस्था के पूरी तरह ध्वस्त होने के दुष्परिणामों को लेकर चिंतित है." रूस को लगता है कि अगर ऐसा हुआ तो उसकी सुदूर पूर्व सीमा पर संकट पैदा हो सकता है, बड़ी संख्या में शरणार्थी आ सकते हैं या फिर उत्तर कोरिया में गृह युद्ध भड़क सकता है, जिसमें बहुत से सारे पक्ष देश के परमाणु हथियारों को अपने नियंत्रण में लेने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाएंगे.

डेनियल पिंकस्टोन ट्रोय यूनिवर्सिटी के सोल कैंपस में अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रोफेसर हैं. वह इस बात से सहमत है कि ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि रूस उत्तर कोरिया में हालात को स्थिर बनाने की कोशिश कर रहा है, ताकि वहां की व्यवस्था को चरमरा कर गिरने से बचाया जा सके. वहीं कुछ लोगों का यह भी कहना है कि कड़ाके की सर्दी के इस मौसम में अगर उत्तर कोरिया को ईंधन की सप्लाई नहीं की गयी तो इसकी कीमत बहुत से आम लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ेगी.

पिंकस्टोन कहते हैं, "यह भी तर्क किया जाता है कि अगर उत्तर कोरिया के नेतृत्व को महसूस हुआ कि उनके पेंच कुछ ज्यादा ही कसे जा रहे हैं और उनके यहां हालात लगातार बिगड़ रहे हैं और उनमें सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है, तो फिर वे ऐसा कोई गंभीर कदम उठा सकते हैं, जिसके जरिए उनकी नजर में हालात बदल सकते हैं."

DW.COM

इससे जुड़े ऑडियो, वीडियो

संबंधित सामग्री