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दुनिया

रूस चीन से करार की कोशिश में भारत

कुडनकुलम के लिए रुस से दो नए रिएक्टर पाने में नागरिक जिम्मेदारियों की बाधा है, तो चीन के साथ सीमा पर सेनाओं के तेवर संभालने के लिए करार में कुछ मुद्दों पर रस्साकशी. इन्हीं मुद्दों पर रूस और चीन के साथ होगी बातचीत...

पांच दिन के दौरे में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पहले रूस पहुंचे हैं. इसके बाद वह चीन जाएंगे. अधिकारी उम्मीदों से भरे हुए हैं और दिन रात मेहनत कर दोनों पक्षों की रजामंदी लायक करार की शर्तें बनाने में जुटे हुए हैं, जिससे कि मनमोहन सिंह की इसी यात्रा के दौरान करार पर दस्तखत भी हो जाएं. आधिकारिक दौरे पर पांचवी बार मॉस्को पहुंचे मनमोहन सिंह सोमवार को रूसी राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन के साथ 14वें भारत रूस सालाना सम्मेलन का उद्घाटन करेंगे.

आधिकारिक सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार भारत यह समझाने की कोशिश कर रहा है कि परमाणु कानून में नागरिक जिम्मेदारियों पर रूस की चिंता दूर करने के लिए कुछ नए प्रस्ताव तैयार किए गए हैं. इनमें दुर्घटना की स्थिति में होने वाले नुकसान की आशंका को देखते हुए बीमा लेने की बात कही गई है. जिसके तहत जिम्मेदारी उपकरणों की सप्लाई करने वाली भारतीय और विदेशी, दोनों कंपनियों पर होगी. यह साफ कर दिया गया है कि जिम्मेदारी असीमित नहीं होगी.

रूस ने कुडनकुलम परमाणु प्रोजेक्ट की तीसरी और चौथी ईकाई के लिए परमाणु जिम्मेदारी कानून लागू करने का विरोध किया है. रूस का कहना है कि यह परियोजना दोनों देशों के समझौते के आधार पर तैयार की गई थी. सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनी जनरल इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन, जीआईसी को रिएक्टर समेत सभी उपकरण देने वाली कंपनियों के लिए दुर्घटना की स्थिति में नुकसान और उसकी भरपाई का आकलन करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है. जीआईसी परमाणु ऊर्जा विभाग के साथ मिल कर यह आकलन कर रही है. अधिकारियों को उम्मीद है कि तीसरी और चौथी ईकाई के लिए परमाणु रिएक्टरों पर मनमोहन सिंह की इस यात्रा के दौरान करार हो जाएगा.

प्रधानमंत्री की इस यात्रा से दोनों देशों के सालों पुराने संबंध और मजबूत होने की भी उम्मीद है. रक्षा, विज्ञान, तकनीक और अंतरिक्ष के क्षेत्र में दोनों देश लंबे समय से एक दूसरे का साथ निभा रहे हैं. भारत रूस के साथ हाईड्रोकार्बन के लिए सहयोग बढ़ाने में दिलचस्पी दिखा रहा है. ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन यानी ओएनजीसी की विदेश शाखा ओवीएल रूस के सुदूर पूर्व और आर्कटिक क्षेत्रों में तेल और गैस की खुदाई के नए मौके तलाश रही है.

चीन में नई सरकार के गठन के बाद भारतीय प्रधानमंत्री पहली बार वहां जाएंगे. एशिया की दो उभरती अर्थव्यवस्थाओं में होड़ के लिए मुद्दों की कमी नहीं लेकिन दोनों अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक दूसरे के लिए बहुत ज्यादा प्रतिद्वंद्विता नहीं देखते. चीन ने लंबे समय के लिए अपने खाने कमाने लायक पर्याप्त बंदोबस्त कर लिया है और उसकी गतिविधियों से कहीं नहीं दिखता कि वह भारत को चुनौती मानता हो. हां सीमा विवादों के कारण आपसी संबंधों की जो खींचतान 1962 की लड़ाई करा गई, वो अब तक बनी हुई है. उसके ना निबटने से एक दूसरे के साथ अक्सर टकराव की स्थिति बन रही है और एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी की भी. प्रधानमंत्री इन्हीं विवादों को सुलझाने के लिए कोई हल ढूंढने की कोशिश में हैं. चीन का नया नेतृत्व भी इस मामले में सकारात्मक रुख दिखा रहा है और दोनों पक्ष उम्मीद से भरे हुए हैं.

रिपोर्ट: निखिल रंजन (पीटीआई)

संपादनः आभा मोंढे

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