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दुनिया

रूस और पश्चिम को संभालता भारत

क्रीमिया को रूस में मिलाए जाने के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर दबाव बढ़ा दिया है. प्रमुख एशियाई देशों में भारत अकेला था जिसने रूस का समर्थन किया है. अमेरिका से बढ़ती दोस्ती के बावजूद उसके लिए रूस को नाराज करना आसान नहीं.

क्रीमिया के अधिग्रहण के बाद से सारा अंतरराष्ट्रीय ध्यान चीन की प्रतिक्रिया पर था. लेकिन संयुक्त राष्ट्र महासभा और सुरक्षा परिषद में पश्चिमी देशों के प्रस्ताव पर हुए मतदान में चीन ने गैरहाजिरी के बावजूद सभी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का समर्थन किया और रूस का समर्थन करने से बचा. दूसरी ओर चीन का दक्षिणी पड़ोसी भारत अकेला एशियाई देश है जिसने मॉस्को का बचाव किया है. उसके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने यूक्रेन में रूस के "वैध हितों" का हवाला दिया. इसके अलावा महासभा में हुए मतदान में भारत अनुपस्थित रहा और रूस के खिलाफ प्रतिबंध लगाने के पश्चिमी प्रयासों का जमकर विरोध किया.

बंगलोर के सेंटर ऑफ पब्लिक पॉलिसी के सीनियर फेलो रवि नीलकंठन का कहना है कि भारत मॉस्को के हस्तक्षेप से पहले यूक्रेन की घटनाओं को "रूस के सुरक्षा हितों के लिए सीधा खतरा" मानता है. समझा जाता है कि मॉस्को और नई दिल्ली के बीच सोवियत काल से चले आ रहे राजनीतिक और सैनिक रिश्तों के कारण भारत ने रूस का विरोध नहीं किया.

लंबी दोस्ती

राजनीतिक विश्लेषक समीर जाफरी का कहना है कि रूस और भारत लंबे समय से दोस्त ही नहीं हैं, आतंकवाद से लेकर पर्यावरण सुरक्षा पर दोनों देशों के एक जैसे हित भी हैं. जाफरी ने डॉयचे वेले को बताया कि रूस ने सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन कर "वैश्विक मामलों में भारत की बढ़ी हुई भूमिका" का भी समर्थन किया है. वाशिंगटन के ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन की तन्वी मदान का कहना है कि सुरक्षा परिषद में भारतीय हितों के लिए वीटो का इस्तेमाल करने की रूस की तैयारी दोनों देशों के रिश्तों को और मूल्यवान बनाती है.

इस बीच रूस सोवियत काल से ही भारत का सबसे बड़ा हथियार सप्लायर है. स्टॉकहोल्म स्थित शांति शोध संस्थान सिप्री के अनुसार 2009 से 2013 के बीच भारत द्वारा खरीदे जाने वाले हथियारों का 75 फीसदी मॉस्को से आया. अकेले 2013 में उसने रूस से 4.8 अरब डॉलर के हथियार खरीदे. दोनों देशों के सैन्य सहयोग में लड़ाकू विमानों और सुपरसॉनिक ब्रह्मोस मिसाइलों का साझा विकास भी शामिल है. रूस उन दो देशों में शामिल है जिनके साथ भारत की मंत्रिस्तरीय वार्षिक सैन्य बैठक होती है.

बहुआयामी रिश्ते

1950 के दशक से ही भारत और रूस के रिश्तों में रक्षा क्षेत्र की मुख्य भूमिका रही है. राजनीतिक विश्लेषक समीर जाफरी का कहना है कि यह सहयोग धीरे धीरे "विक्रेता ग्राहक रिश्ते से सुरक्षा तकनीकी और उपकरणों के साझा शोध और विकास में बदल गया है." इसके अलावा अंतरिक्ष और ऊर्जा के क्षेत्र में भी दोनों देशों के रिश्तों में निकटता आई है. 2009 में दोनों देशों ने रिएक्टर तकनीकी के ट्रांसफर और यूरेनियम के अबाध सप्लाई के लिए नागरिक परमाणु समझौते पर दस्तखत किए हैं. रूस भारत में नए परमाणु बिजली घर भी लगा रहा है.

ऐसा नहीं है कि सिर्फ रूस ही भारत की मदद कर रहा है. समीर जाफरी के अनुसार रूस परमाणु ऊर्जा और टेलीकम्युनिकेशन के इलाके में भारत में निवेश कर रहा है तो भारतीय कंपनियों ने हाइड्रोकार्बन के क्षेत्र में रूस में भारी निवेश किया है. इसके अलावा वे तेल और गैस की साझा खोज और खनन भी कर रहे हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2011 के अंत में रूस में भारत का निवेश 6.5 अरब डॉलर था. 2012 में पारस्परिक कारोबार 11 अरब डॉलर था, और दोनों देशों ने कजाखस्तान और बेलारूस के साथ मिलकर मुक्त व्यापार समझौते की संभावना तलाशने का फैसला किया है.

संतुलन की कोशिश

समीर जाफरी का कहना है कि इस तरह के बहुपक्षीय रिश्ते की रोशनी में नई दिल्ली के लिए मॉस्को को नाराज करना संभव नहीं है, इसलिए उसने रूस का पक्ष लेना और यूक्रेन में उसके कदमों का समर्थन करने का फैसला किया है. महासभा में रूस के खिलाफ पश्चिमी देशों द्वारा समर्थित प्रस्ताव पर हुए मतदान में गैरहाजिर रहकर उसने रूस और पश्चिम के बीच संतुलन स्थापित करने की कोशिश की है. ऐसा करने वालों में उसके साथ ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसी उभरती सत्ताएं भी थीं, जिन्होंने रूस विरोधी रुख न अपनाकर पुतिन का साथ दिया है.

यूक्रेन मामले में भारत की प्रतिक्रिया पर क्रेमलिन की निगाहें भी गईं और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने नई दिल्ली का उसके "संयमित और वस्तुपरक" रुख के लिए आभार व्यक्त किया. विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिमी देशों के प्रतिबंध की रोशनी में रूस अपने ऊर्जा बाजार को बढ़ाएगा और भारत के साथ उसके रिश्ते और गहरा सकते हैं. पिछले ही हफ्ते रूसी तेल कंपनी रोजनेफ्ट के प्रमुख इगोर सेचीन ने नई दिल्ली में भारत को बड़े पैमाने पर तेल और गैस बेचने की पेशकश की है. उन्होंने कहा, "भारत रूस के लिए महत्वपूर्ण है. हम अपना सहयोग बढ़ाना चाहते हैं."

रिपोर्ट: श्रीनिवास मजुमदारू/एमजे

संपादन: आभा मोंढे

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