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दुनिया

रुक नहीं रही है किसानों की आत्महत्या

सरकारें बदल जाती हैं लेकिन किसानों की समस्याएं ज्यों की त्यों रहती हैं. इस साल के शुरूआती 3 महीने में ही 116 किसानों ने मौत को गले लगा लिया. फसल की बर्बादी और ऋणों का बोझ किसानों को आत्महत्या के दहलीज पर पहुंचा देते हैं.

किसानों की आत्महत्या को देश और समाज के लिए शर्मनाक बताने वाली पार्टियां इस मुद्दे पर कुछ कर पाने में नाकाम रही हैं. पिछली सरकारों में देश के किसानों का जो हाल था उसमें कोई सुधार आता नहीं दिख रहा है. कम से कम किसान आत्महत्या के मामले रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं. केंद्र सरकार के आकड़े बताते हैं कि 2016 के शुरुआती 3 महीने में ही 116 किसानों को आत्महत्या करनी पड़ी है. हालांकि मौत को गले लगाने वाले किसानों की संख्या सरकारी आकड़ों से कहीं ज्यादा है.

क्यों करते हैं किसान आत्महत्या

फसल की बर्बादी और ऋणों का बोझ किसानों को आत्महत्या के दहलीज पर पहुंचा देते हैं. 2015 में जितने किसानों ने आत्महत्या की उनमें से अधिकतर मामलों में कर्ज ना चुका पाना प्रमुख कारण था. मैग्सेसे अवार्ड विजेता पी. साईनाथ का कहना है कि मौसम की मार, ऋणों के बोझ सहित कई अन्य कारणों से देश में किसान आत्महत्या करते हैं. इसी हफ्ते पंजाब के बरनाला में एक किसान ने ऋण ना चुका पाने की बेबसी में अपनी बूढ़ी मां के साथ कथित रूप से आत्महत्या कर ली.

खेती के मामले में समृद्ध राज्य होते हुए भी पंजाब के किसान बड़ी संख्या में आत्महत्या करने को विवश हो रहे हैं. पंजाब में भूजल स्तर के लगातार कम होने से किसानों को सिंचाई के लिए कर्ज लेना पड़ता है. कर्ज ना चुका पाने की परिणति आत्महत्या के रूप में सामने आती है. पंजाब, उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड और महाराष्ट्र के आत्महत्या कर रहे किसानों का असल दर्द फसलों की बर्बादी से उपजी आर्थिक तंगहाली ही है. परिवार की जिम्मेदारी ना उठा पाने की ग्लानि भी उनमें रहती है.

महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा खुदकुशी

सरकारें, आकड़ों में आत्महत्या को कम करके दिखाना चाहती हैं. केंद्र सरकार के अनुसार इस साल के शुरूआती 3 महीनों में कुल 116 किसानों ने आत्महत्या की है. जबकि अकेले महाराष्ट्र में शुरूआती डेढ़ महीने में ही 124 किसानों ने आत्महत्या की है. पी. साईनाथ का कहना है कि सरकारी दस्तावेज में किसानों की आत्महत्या को दर्ज करने की नीति पूरी तरह से दोषपूर्ण है. उनका कहना है कि महिलाओं को किसानों का दर्जा ही नहीं दिया जाता. ऐसे में महिला किसान द्वारा की जाने वाली आत्महत्या किसानों की आत्महत्याओं में शामिल ही नहीं हो रही हैं जबकि देश में महिलाओं की कृषि क्षेत्र में भागीदारी 60 से 70 फीसदी है.

किसानों की आत्महत्या के मामले में महाराष्ट्र सबसे ऊपर है. उसके बाद पंजाब और तेलंगाना का नंबर है. सरकार के अनुसार 2015 में 2997 किसानों की आत्महत्या का मामला सामने आया था. इनमें से सबसे ज्यादा 1,841 मामले महाराष्ट्र से थे. सरकार की तरफ से जो आंकड़ा पेश किया गया उसमें कहा गया कि इस साल 29 फरवरी तक महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या के 57 मामले सामने आए जबकि पंजाब में 11 मार्च तक 56 खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की. महराष्ट्र, तेलंगाना आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में किसानों की आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले दर्ज होते हैं. बीते एक दशक से देशभर में होने वाली किसानों की आत्महत्या में दो तिहाई हिस्सेदारी इन्हीं राज्यों की है.

दोषपूर्ण नीतियां

किसानों की बदहाली और आत्महत्याओं के लिए सरकारों की दोषपूर्ण नीतियां जिम्मेदार हैं. कृषि अर्थव्यवस्था के जानकारों का कहना है कि हालात ऐसे भी बुरे नहीं है कि सरकार इसे नियंत्रित ना कर पाए. लेकिन सरकार में इच्छाशक्ति का अभाव है. खेती छोड़कर अब नौकरी करने वाले अजय जाधव कहते हैं कि सरकारें किसानों के हित की बात तो करती हैं पर उनकी परेशानियों को नहीं समझतीं. किसानों के लिए जो सुविधाएं या सब्सिडी मिलती है वह काफी नहीं है. अक्सर सरकारी सुविधाओं का लाभ सिर्फ बड़े किसानों को मिलता है. समृद्ध किसानों की सब्सिडियों को रोक कर छोटे, मझोले किसानों को मदद देना होगा. ‘बेहतर ऋण व्यवस्था', दोष मुक्त फसल बीमा और ‘सिंचाई प्रणाली में सुधार' लाकर सरकार किसानों की स्थिति में सुधार ला सकती है.

इस साल भी महाराष्ट्र, ओडिशा, तेलंगाना, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, झारखंड और राजस्थान सूखे की समस्या से जूझ रहे हैं. ऐसे में आत्महत्या के बढ़ने की आशंका जताई जा रही है. ऐसा नहीं है कि सरकार कुछ नहीं कर रही है. मोहनभाई कुंदरिया का कहना है, "सरकार ने किसानों को सूखे के असर से बचाने और उनकी आत्महत्या को रोकने के लिए कई कदम उठाए हैं." सूखा प्रभावित 10 राज्यों के लिए सरकार ने लगभग पौने 13 हजार करोड़ रुपये का राहत पैकेज मंजूर किया है. इसके अलावा सरकार ने जो कदम उठाए हैं उसमें डीजल और बीज के लिए सब्सिडी और मनरेगा के तहत 50 अतिरिक्त दिनों का रोजगार देना शामिल है.

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