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मंथन

रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट बचाते हैं जान

हमने हॉलीवुड फिल्मों में अक्सर देखा है कि कहीं कोई तबाही मचती है और सेना और वैज्ञानिक फौरन उससे निपटने में लग जाते हैं. बड़ी बड़ी स्क्रीन पर देखते हैं कि कहां क्या चल रहा है. ऐसा सिर्फ फिल्मों में ही नहीं होता..

जनवरी 2013 में इंडोनेशिया में भयानक बाढ़ आई जिसके कारण निचले इलाकों में रह रहे एक लाख लोगों को घर बार छोड़ना पड़ा. दुनिया में जब कहीं भी बाढ़, सूनामी या भूंकप जैसी प्राकृतिक आपदा आती है तो कुछ वैज्ञानिक सीधे तौर पर उससे जुड़ जाते हैं. म्यूनिख में सैटेलाइट के आधार पर आपदा की सूचना जमा करने वाले केंद्र के वैज्ञानिक इन्हीं में शामिल हैं. स्टेला हुबर्ट बताती हैं कि उनकी टीम पूरी दुनिया में काम कर रही है, "इस वजह से हम इधर उधर घूमते भी रहते हैं. हमारे यूजर सबसे अहम हैं. हम ऐसे टूल्स बनाने की कोशिश करते हैं, जिससे यहां हमारा काम आसान हो. क्योंकि हमारे पास वक्त रहते काम पूरा करने की चुनौती होती है."

इसके लिए विस्तृत इमरजेंसी नक्शे बनाए जाते हैं. रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट इसके लिए आंकड़े मुहैया कराती है. सैटेलाइट की तस्वीरों से खतरे का बेहतर अंदाजा लगता है. पता चलता है कि कौन सी गली में क्या हो रहा है और कहां राहतकर्मी नहीं जा पाएंगे. आंकड़ों का विश्लेषण पूरी टीम करती है. इमरजेंसी आते ही सबको पता रहता है कि कौन क्या करेगा.

Japan Erdbeben Tsunami Vorher Nachher Vergleich

सूनामी के पहले और बाद जापान के सैटेलाइट चित्र.

स्टेला हुबेर्ट इस टीम को कॉर्डिनेट करती हैं. घटनास्थल पर मौजूद इंचार्ज लोगों से भी वही बातचीत करती रहती हैं. वह बताती हैं कि जोखिम की समीक्षा के अलग अलग मानक होते हैं, "सबसे पहले देखना होता है कि खतरा कितना बड़ा है. दूसरा नुकसान का पैमाना, यानी क्या वहां ऐसी चीजें हैं, जिन पर असर पड़ रहा है. अगर ऐसी जगह है, जहां कोई रहता भी नहीं और इमारत भी नहीं, तो वहां आपदा के वक्त ज्यादा तबाही नहीं मचेगी."

उनका कहना है कि अगर टीम घटनास्थल पर होती तो सैटेलाइट डाटा को हकीकत से मिला पाती. डाटा की बेहतर समझ के लिए वह कभी कभार ऐसा करती भी हैं, "मेरे पास पश्चिमी अफ्रीका प्रोजेक्ट है. पिछले साल मैं फरवरी और मार्च में दो हफ्ते बुर्किना फासो में थी. आप हमेशा चाहते हैं कि घटनास्थल पर रह कर चीजों को देख सकें. नहीं तो सैटेलाइट तस्वीरों से चीजों का सही सही अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल होता है."

हर दिन, चौबीसों घंटे, दुनिया भर से इस सेंटर में टेलीफोन आते हैं. टीम अपनी पहचान मुसीबत के बाद मदद करने वालों के तौर पर नहीं करना चाहती. यह ऐसे प्रोजेक्ट पर काम कर रही है जिससे प्राकृतिक आपदाओं का भरोसेमंद अनुमान लगाया जा सके. भविष्य में सैटेलाइट तस्वीरें जंगल की आग, बाढ़ और भूंकप जैसी आपदाओं में जान माल का नुकसान कम करने में और मददगार साबित होंगी.

रिपोर्टः थॉमस राडलर/ओंकार सिंह जनौटी

संपादनः ईशा भाटिया

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