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खेल

राह ही हमारा लक्ष्य: दत्त

जर्मनी लंबे अरसे से फुटबॉल में एक बड़े पदक के लिए तरस रहा है. डॉयचे वेले के साथ इंटरव्यू में जर्मन फुटबॉल संघ के स्पोर्ट डाइरेक्टर रॉबिन दत्त ने इसके लिए धीरज के साथ युवा प्रतिभाओं को बढ़ावा देने की वकालत की है.

भारतीय मूल के रॉबिन दत्त अगस्त 2012 से जर्मन फुटबॉल संघ डीएफबी के स्पोर्ट डाइरेक्टर हैं. इसके पहले वे एससी फ्राइबुर्ग और बायर लेवरकूजेन के ट्रेनर थे. स्पोर्ट डाइरेक्टर के रूप में 48 वर्षीय दत्त युवाओं और प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देने के लिए जिम्मेदार हैं.

डीडब्ल्यू: जर्मनी में प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देने की अपनी योजना के बारे में संक्षेप में बताएंगे?

रॉबिन दत्त: यह मेरी या डीएफबी की अवधारणा नहीं है, बल्कि जर्मनी के फुटबॉल जगत के किरदारों के बीच गहन संवाद और विचार विमर्श का नतीजा है. हम प्रचुर मात्रा में उपलब्ध क्वालिटी का इस्तेमाल करना चाहते हैं, फायदा उठाना चाहते हैं. जर्मनी फीफा की रैंकिंग में स्पेन के बाद दूसरे स्थान पर है और हम नियमित रूप से उन प्रतियोगिताओं में सेमीफाइनल में पहुंचे हैं जिनमें हमने हिस्सा लिया है. हमारा फुटबॉल अच्छी क्वालिटी का है, यह तथ्य है.

क्या यह खिताब का वादा है?

खिताब का वादा नहीं किया जा सकता. हाल ही मैं एक समारोह में मौजूदा विश्व चैंपियन के ट्रेनर विंसेंटे डेल बोस्क से मिला. उन्होंने यह बात बताई कि स्पेन को प्रतिभा प्रोत्साहन के क्षेत्र में अच्छे काम के बावजूद टाइटल के लिए 30 साल का इंतजार करना पड़ा. धीरज रखने की जरूरत है. जो हम कर सकते हैं और करना चाहते हैं, वह सही रास्ते पर चलना है, ताकि खुद को बेहतर बना सकें. एक बात तय है, यदि हम फुटबॉल जगत में अपनी जगह पाना चाहते हैं तो हम शांत नहीं बैठ सकते. दूसरे देश भी हैं जो अपने भविष्य के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं.

आपके दिमाग में खास तौर पर कौन से देश हैं?

बड़े नामों में निश्चित तौर पर स्पेन है, नीदरलैंड्स और फ्रांस हैं, अगर सिर्फ कुछेक नाम लिए जाएं. लेकिन जापान, पैराग्वे या मेक्सिको जैसे दूसरे देश भी हैं जहां बहुत सी युवा प्रतिभाएं हैं. जो बेहतर ढांचे के साथ चोटी के देशों में शामिल हो सकते हैं.

जर्मनी का ढांचा कैसा है?

जर्मनी में हमारा ढांचा अधिकांश देशों से अलग है. अंतरराष्ट्रीय तौर पर केंद्रीकृत ढांचा बहुत लोकप्रिय है जबकि हमारी पसंद विकेंद्रित ढांचा है. हमारे लिए यह मॉडल बहुत सफल साबित हुआ है. यह मानुएल नॉयर, थोमस मुलर, मार्को रॉयस या मारियो गोएत्से जैसे खिलाड़ी साबित करते हैं. हालांकि पिछले दस सालों में प्रतिभाओं के प्रोत्साहन का ढांचा बदला है, लेकिन हम आज बहुत से बेहतरीन युवा खिलाड़ियों का नाम ले सकते हैं. ये खिलाड़ी तकनीकी रूप से बहुत अच्छी तरह प्रशिक्षित हैं. जर्मन फुटबॉल आज हमें सालों तक पहचान देने वाले संघर्ष के जज्बे से ज्यादा कुछ है.

फिर यह चोटी पर क्यों नहीं है?

इस समय स्पेन के पास बेहतर खिलाड़ी हैं, वे यूं ही विश्व और यूरोपीय चैंपियन नहीं हैं. लेकिन कोई नहीं कह सकता कि यह स्थिति भविष्य में भी बनी रहेगी. हमें अपना काम करते रहना होगा, सही राह पर रहना होगा, लगातार बेहतर होना होगा. तब हम देखेंगे कि भविष्य हमारे लिए क्या लाता है.

इसके लिए आप किन साधनों का इस्तेमाल कर रहे हैं?

आधारभूत बात व्यक्तिगत प्रोत्साहन है, टैक्टिकल और टेक्निकल इलाके के अलावा मानवीय विकास में भी. चरित्र और शख्सियत के विकास को शैक्षणिक और मनोवैज्ञानिक समर्थन दिया जाएगा. जर्मनी को सिर्फ अच्छे फुटबॉलरों की ही जरूरत नहीं है, अच्छे इंसानों की भी जरूरत है. हमारे युवा खिलाड़ियों को दोनों होना होगा.

और स्वाभाविक रूप से टाइटल भी जीतना होगा.

हम टाइटल चाहते हैं. और हमें पता है कि इस तरह हमारे पास इसे हासिल करने के ज्यादा मौके आएंगे. लेकिन आखिरकार, भले ही यह बहुत दार्शनिक लगे, राह ही हमारा लक्ष्य है, और सही रास्ता है प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देना.

इंटरव्यू: डानिएल मार्टिनेज/एमजे

संपादन: ओंकार सिंह जनौटी

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